मनेन्द्रगढ़,05 जुलाई 2023 (घटती-घटना)। गुरुपूर्णिमा पर्व पर श्री राम मंदिर में गुरु पूजन महोत्सव का आयोजन किया गया. इस अवसर पर सैकड़ों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने अपने गुरु पं. ओम नारायण द्विवेदी की पूजा कर आशीर्वाद ग्रहण किया, इस अवसर पर महंत श्री ओम नारायण द्विवेदी ने बताया कि दीक्षा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘दक्ष’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है कुशल होना। इसका दूसरा स्रोत दीक्ष शब्द है जिसका अर्थ है समर्पण। दीक्षा का सम्पूर्ण अर्थ हुआ स्वयं का विस्तार।
उन्होंने बताया कि दीक्षा द्वारा शिष्य में यह सामर्थ्य उत्पन्न होता है कि गुरु से प्राप्त ऊर्जा द्वारा शिष्य के अंदर आतंरिक ज्योति प्रज्ज्वलित होती है। जिसके प्रकाश में वह अपने अस्तित्व के उद्देश्य को देख पाने में सक्षम होता है। दीक्षा से अपूर्णता का नाश और आत्मा की शुद्धि होती है।उन्होंने कहा कि गुरु का ईश्वर से साक्षात सम्बन्ध होता है। ऐसा गुरु जब अपनी आध्यात्मिक-प्राणिक ऊर्जा का कुछ अंश एक समर्पित शिष्य को हस्तांतरित करता है तो यह प्रक्रिया गुरु दीक्षा कहलाती है। यह आध्यात्मिक यात्रा की सबसे प्रारम्भिक सीढ़ी है। गुरु दीक्षा के उपरान्त गुरु और शिष्य दोनों का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है। गुरु का उत्तरदायित्व समस्त बाधाओं को दूर करते हुए शिष्य को आध्यात्मिकता की चरम सीमा पर पहुंचाना होता है। वहीं शिष्य का उत्तरदायित्व हर परिस्थिति में गुरु द्वारा बताये गए नियमों का पालन करना होता है। गुरु की चेतना ईश्वर से निरंतर संयुक्त रहने के कारण ईश्वर तुल्य होती है। जबकि साधारण मनुष्य की चेतना संसार से जुड़ी रहने के कारण वाह्यमुखी और अधोगामी होती है। चेतना के वाह्य मुखी और अधोगामी होने के कारण ईश्वर से हमारा सम्पर्क टूट जाता है। जिसके कारण अविद्या का प्रभाव बढ़ जाता है। गुरु को प्रकृति और ईश्वर के नियमों का ज्ञान होने के कारण उनमें अज्ञानता के भंवर से निकलने की क्षमता होती है। वह शिष्य को धीरे-धीरे ज्ञान देकर, कर्मों की गति सही करवाकर और सामर्थ्य की वृद्धि करवाकर अज्ञान के इस भंवर से निकाल कर ईश्वर से सम्बन्ध स्थापित करवा देते हैं। इसके पूर्व में मार्केट स्थित श्री राम मंदिर में स्थापित भगवान की मूर्ति की सोमवार प्रातः 8 बजे पूजा आरती करके गुरु पूर्णिमा पर पूजा एवं चातुर्मास अनुष्ठान का शुभारम्भ हुआ। इसके साथ ही जिले के तमाम साधु-सन्यासियों के आश्रमों में गुरू पूर्णिमा पर दूर-दूर से भक्त अपने गुरूजनों का आशीर्वाद लेने पहुंचे।
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