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अंबिकापुर@बार-बार फरारी…अब हत्या,क्या हादसे का इंतजार कर रहा था सिस्टम?

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  • अंबिकापुर में 7 महीने में तीसरी फरारी…बिलासपुर में चौकीदार की हत्या के बाद बाल संरक्षण व्यवस्था कटघरे में…
  • पहले भागने दो…फिर खोजने निकलो,क्या यही बन गई है व्यवस्था?
  • न्यायालय भेजता है सुधारने…व्यवस्था बना रही ‘फरार गृह’!
  • अंबिकापुर में तीन बार फरारी,बिलासपुर में चौकीदार की हत्या ने बढ़ाई चिंता…
  • 7 महीने में बार-बार भागे अपचारी बालक अब बिलासपुर में चौकीदार की हत्या के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल…
  • अंबिकापुर में तीन बार सुरक्षा ध्वस्त,बिलासपुर की घटना ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा किया…
  • अंबिकापुर की चेतावनी के बीच बिलासपुर की वारदात ने बढ़ाई चिंता, जवाबदेही अब भी तय नहीं…
  • फरारी से हत्या तक…बाल संरक्षण तंत्र की नाकामी की खौफनाक तस्वीर…
  • अंबिकापुर में 7 महीने में तीन बार अपचारी बालक फरार,बिलासपुर में चौकीदार की हत्या के बाद चार बाल अपचारी भी भागे…
  • बिलासपुर में चौकीदार की हत्या के बाद बढ़ी चिंता,क्या अब भी नहीं चेतेगा महिला एवं बाल विकास विभाग?


-संवाददाता-
अंबिकापुर,15 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। न्यायालय जब किसी अपचारी नाबालिग को बाल संप्रेक्षण गृह या प्लेस ऑफ सेफ्टी भेजता है तो उसका उद्देश्य सजा देना नहीं,बल्कि उसे अपराध की दुनिया से निकालकर मुख्यधारा में वापस लाना होता है,वहां उसकी सुरक्षा, निगरानी, काउंसलिंग, शिक्षा और पुनर्वास की जिम्मेदारी राज्य की होती है, लेकिन अंबिकापुर में पिछले सात महीनों के दौरान हुई घटनाओं ने इस पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, फरवरी में प्लेस ऑफ सेफ्टी से 15 अपचारी बालक फरार हुए, जून में बाल संप्रेषण गृह से 11 अपचारी बालक भाग निकले और अब जुलाई में एक बार फिर 13 अपचारी बालकों के फरार होने की घटना सामने आई है,सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बार फरार हुए बच्चों में कुछ ऐसे भी बताए जा रहे हैं जो पहले भी भागने की घटनाओं में शामिल रह चुके थे। यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है तो यह केवल सुरक्षा व्यवस्था की विफलता नहीं बल्कि सुधार प्रणाली की प्रभावशीलता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न होगा, इन घटनाओं के बीच बिलासपुर के बाल संप्रेक्षण गृह में चौकीदार की हत्या और चार अपचारी बालकों के फरार होने की घटना ने पूरे प्रदेश के बाल संरक्षण तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अब सवाल केवल अंबिकापुर का नहीं, बल्कि पूरे राज्य की बाल संरक्षण व्यवस्था का बन गया है।
अंबिकापुर में सात महीनों के भीतर तीन बार अपचारी बालकों का फरार होना और उसी दौरान बिलासपुर के बाल संप्रेक्षण गृह में चौकीदार की हत्या के बाद चार अपचारी बालकों का फरार हो जाना,दोनों घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि प्रदेश के बाल संरक्षण तंत्र की सुरक्षा,निगरानी और पुनर्वास व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की आवश्यकता है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी भी अधिकारी या कर्मचारी की जिम्मेदारी का निर्धारण तथ्यों, विभागीय जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही किया जाए। न्यायालय जिन किशोरों को सुधार के उद्देश्य से इन संस्थानों में भेजता है, उनके लिए सुरक्षित और प्रभावी पुनर्वास व्यवस्था सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है,अब केवल नई जांच समितियों की घोषणा नहीं, बल्कि ठोस सुधारात्मक कदम, पारदर्शिता और जवाबदेही ही इस व्यवस्था पर जनता और न्यायालय का भरोसा बनाए रख सकते हैं।
तीन घटनाएं…एक जैसा तरीका…फिर भी नहीं सुधरी व्यवस्था-यदि फरवरी,जून और जुलाई की तीनों घटनाओं को देखा जाए तो एक समान पैटर्न दिखाई देता है, हर बार अपचारी बालकों ने सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी का फायदा उठाया, हर बार भागने का समय लगभग शाम 6 बजे से रात 9 बजे के बीच का बताया गया,इस बार भी प्रारंभिक जानकारी के अनुसार लाइब्रेरी की खिड़की तोड़कर 13 अपचारी बालक फरार हो गए,सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पहली और दूसरी घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा होनी चाहिए थी,तब आखिर ऐसा क्या किया गया कि तीसरी बार भी वही तरीका अपनाकर बच्चे फरार हो गए? यदि खिड़कियां ही सुरक्षा की सबसे कमजोर कड़ी थीं तो उन्हें मजबूत क्यों नहीं किया गया?
पहले भागने दो… फिर खोजने में पूरा तंत्र लगाओ, क्या यही व्यवस्था बन गई है?- अंबिकापुर में पिछले सात महीनों की घटनाओं ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है,क्या अब बाल संरक्षण तंत्र की कार्यप्रणाली केवल इतनी रह गई है कि पहले अपचारी बालक भाग जाएं और उसके बाद उन्हें खोजने के लिए पुलिस, प्रशासन और पूरा सरकारी अमला सक्रिय हो जाए? हर फरारी के बाद जिले भर में अलर्ट जारी होता है,पुलिस टीमें गठित होती हैं, जगह-जगह दबिश दी जाती है,आसपास के जिलों और राज्यों को सूचना भेजी जाती है,यानी जिस सुरक्षा पर पहले ध्यान दिया जाना चाहिए,वह बाद में खोजबीन पर खर्च होती दिखाई देती है,सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि पहले फरार हुए सभी अपचारी बालक क्या वास्तव में वापस लाए जा चुके हैं? यदि नहीं,तो अब भी कितने बालक फरार हैं? उनकी वर्तमान स्थिति क्या है? क्या वे फिर किसी अपराध में शामिल हुए या नहीं? इन सवालों का स्पष्ट जवाब भी सामने आना चाहिए, यदि हर कुछ महीनों में यही प्रक्रिया दोहराई जाएगी—पहले फरारी,फिर तलाश और उसके बाद जांच—तो क्या इसे प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था कहा जा सकता है?
क्या अब उच्च जोखिम वाले अपचारी बालकों के लिए अलग व्यवस्था की जरूरत है?- बिलासपुर में चौकीदार की हत्या और अंबिकापुर में लगातार तीन फरारी की घटनाओं ने एक नई बहस भी शुरू कर दी है, ऐसे अपचारी,जिन पर हत्या,दुष्कर्म,लूट जैसे गंभीर आरोप हैं या जिनकी हिंसक प्रवृत्ति सामने आ चुकी है,उनके लिए क्या वर्तमान व्यवस्था पर्याप्त है? यह एक नीतिगत प्रश्न है कि क्या ऐसे उच्च जोखिम वाले अपचारी बालकों के लिए अधिक सुरक्षित, विशेष निगरानी वाले अलग संस्थानों या विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल की आवश्यकता है? यह निर्णय कानून और नीति के दायरे में ही लिया जा सकता है, लेकिन हाल की घटनाओं ने इस विषय पर गंभीर चर्चा की जरूरत जरूर पैदा कर दी है।
क्या न्यायालय का भरोसा कमजोर पड़ रहा है?- बाल न्याय प्रणाली इस सिद्धांत पर आधारित है कि नाबालिग अपराधी को सुधार का अवसर मिलना चाहिए, इसी कारण उसे जेल के बजाय बाल संप्रेक्षण गृह भेजा जाता है,लेकिन यदि वही बच्चा वहां से बार-बार भाग रहा है तो इसका सीधा असर न्यायिक व्यवस्था के उद्देश्य पर पड़ता है,आज यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या सुधार गृह वास्तव में सुधार कर पा रहे हैं या फिर केवल औपचारिक संस्थान बनकर रह गए हैं?
क्या नियमित काउंसलिंग हो रही है?- किशोर न्याय व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग की होती है,क्या इन बच्चों की नियमित काउंसलिंग हो रही थी? क्या उनके व्यवहार का मूल्यांकन किया गया? क्या किसी अधिकारी ने यह महसूस किया कि बच्चे सामूहिक रूप से भागने की योजना बना रहे हैं? यदि ऐसे संकेत थे तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यदि संकेत नहीं थे तो क्या काउंसलिंग व्यवस्था प्रभावी थी?
क्या सुरक्षा व्यवस्था केवल कागजों में मजबूत है?- सूत्रों का कहना है कि जिस भवन में बच्चों को रखा गया है वह काफी पुराना है, लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि खिड़की तोड़कर बच्चे आसानी से बाहर निकल जाते हैं तो यह सुरक्षा मानकों पर गंभीर प्रश्न है, क्या भवन का तकनीकी सुरक्षा ऑडिट हुआ था? क्या मजबूत ग्रिल और आधुनिक सुरक्षा उपकरण लगाए गए थे? यदि लगाए गए थे तो वे प्रभावी क्यों नहीं रहे?
क्या दो होमगार्ड इतने संवेदनशील संस्थान के लिए पर्याप्त हैं?- स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि पूरे संस्थान की सुरक्षा सीमित स्टाफ और दो होमगार्ड के भरोसे संचालित होती है,यदि यहां हत्या,दुष्कर्म,लूट जैसे गंभीर अपराधों में निरुद्ध अपचारी बालक रहते हैं तो क्या इतनी कम सुरक्षा पर्याप्त मानी जा सकती है? क्या प्रत्येक शिफ्ट में प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मी तैनात हैं? क्या किसी आकस्मिक स्थिति से निपटने के लिए अलग प्रोटोकॉल है?
हाउस फादर की सूचना पर क्या हुआ?-सूत्रों का दावा है कि संस्थान में पदस्थ हाउस फादर बच्चों की गतिविधियों को लेकर समय-समय पर अपने वरिष्ठ अधिकारियों को अवगत करा रहे थे,यदि यह तथ्य सही है तो क्या उन सूचनाओं पर कोई कार्रवाई हुई? क्या अतिरिक्त निगरानी बढ़ाई गई? क्या जोखिम वाले बच्चों को अलग निगरानी में रखा गया? यह जांच का महत्वपूर्ण विषय होना चाहिए।
पूर्व में प्रकाशित खबरों के बाद भी नहीं जागा विभाग- दैनिक‘घटती-घटना’ ने फरवरी से लगातार इस विषय पर खोजी समाचार प्रकाशित किए, 18 फरवरी को प्लेस ऑफ सेफ्टी से 15 अपचारी बालकों के फरार होने के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए गए, 25 जून को 11 अपचारी बालकों के फरार होने पर सीसीटीवी, सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न उठाए गए, 26 जून को जवाबदेही तय करने की मांग की गई,30 जून को संविदा व्यवस्था,प्रशासनिक लापरवाही और सुरक्षा तंत्र की कमजोरी पर विस्तृत खोजी रिपोर्ट प्रकाशित हुई,इसके बावजूद अब जुलाई में तीसरी बार 13 अपचारी बालकों के फरार होने की घटना सामने आ गई,यह सवाल अब और गंभीर हो गया है कि आखिर विभाग ने इन घटनाओं से क्या सीखा?
क्या पहले फरार हुए सभी बच्चे वापस आ गए थे?-यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि फरवरी में फरार हुए 15 अपचारी बालकों में से कितने वापस लाए गए? जून में भागे 11 बच्चों में से कितनों की बरामदगी हुई? क्या सभी वापस आ चुके हैं? यदि नहीं,तो कितने अब भी फरार हैं? यदि पहले की घटनाओं के सभी अपचारी बालक वापस नहीं आए थे तो सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी क्यों नहीं की गई?
बिलासपुर की घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोरा- अंबिकापुर की तीसरी फरारी के बीच 14 जुलाई 2026 को बिलासपुर के सरकंडा स्थित बाल संप्रेषण गृह में हुई एक सनसनीखेज घटना ने पूरे प्रदेश की बाल संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं,पुलिस के अनुसार चौकीदार नरेंद्र कुमार खांडे (40) की हत्या कर दी गई,प्रारंभिक जांच में आरोप है कि चार अपचारी बालकों ने पहले उनके साथ मारपीट की,फिर हाथ-पैर बांध दिए,गला दबाया और मुंह में गमछा ठूंस दिया, वारदात के बाद चारों बाल अपचारी संप्रेषण गृह से फरार हो गए, मृतक तखतपुर क्षेत्र के अरईबंद गांव का निवासी था और लगभग एक वर्ष से चौकीदार के पद पर कार्यरत था,घटना की सूचना मिलते ही सरकंडा थाना पुलिस और वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे,पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजते हुए फरार अपचारियों की तलाश शुरू कर दी है। सीसीटीवी फुटेज,घटनास्थल से मिले साक्ष्य और अन्य तकनीकी पहलुओं की जांच की जा रही है,बताया जा रहा है कि फरार आरोपियों में से एक की उम्र 20 वर्ष पूरी हो चुकी थी और उसे जेल स्थानांतरित किया जाना था,पुलिस इस पहलू की भी जांच कर रही है, मृतक के परिजनों ने संस्थान के कुछ अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं,हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और पुलिस मामले की जांच कर रही है।
क्या अंबिकापुर में भी ऐसे खतरे की आशंका को नजरअंदाज किया गया?- बिलासपुर की घटना ने यह साबित कर दिया कि बाल संप्रेक्षण गृहों से होने वाली फरारी केवल भागने तक सीमित नहीं रह सकती,यदि उच्च जोखिम वाले अपचारी बालकों की निगरानी मजबूत नहीं होगी तो वे सुरक्षा कर्मियों, कर्मचारियों और आम नागरिकों के लिए भी खतरा बन सकते हैं,यही कारण है कि अंबिकापुर में लगातार हुई तीन फरारी की घटनाओं को अब केवल ‘फरारी’ मानकर नहीं छोड़ा जा सकता।
संविदा व्यवस्था पर फिर उठे सवाल- सार्वजनिक चर्चा में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि संवेदनशील संस्थानों में बड़ी संख्या में संविदा कर्मचारियों के भरोसे व्यवस्था चलाना कितना उचित है,कई लोगों का मानना है कि ऐसे संस्थानों में प्रशिक्षित नियमित अधि कारियों और कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए, हालांकि इस विषय पर अंतिम निर्णय सरकार और विभागीय नीति का विषय है।
सरकार से अब ये अपेक्षाएं,अब समय आ गया है कि- प्रदेश के सभी बाल संप्रेषण गृहों का सुरक्षा ऑडिट कराया जाए, उच्च जोखिम वाले अपचारी बालकों के लिए अलग सुरक्षा प्रोटोकॉल बनाया जाए,नियमित मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग सुनिश्चित की जाए,पर्याप्त प्रशिक्षित सुरक्षा बल तैनात किए जाएं,प्रत्येक फरारी मामले में समयबद्ध जांच कर जवाबदेही तय की जाए,सभी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएं,भवनों की संरचनात्मक सुरक्षा की स्वतंत्र जांच कराई जाए।
जनता पूछ रही है…
– सात महीने में तीसरी बार अपचारी बालक क्यों भागे?
– तीनों घटनाओं का समय लगभग एक जैसा क्यों रहा?
– बार-बार खिड़की ही कैसे टूट रही है?
– पहले फरार हुए सभी बच्चे वापस आ चुके हैं?
– नियमित काउंसलिंग क्यों प्रभावी नहीं दिख रही?
– पूर्व की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं हुई?
– अब तक किस अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई?
– क्या बिलासपुर जैसी घटना से भी विभाग सबक लेगा?

आखिर किशोर अपराध क्यों बढ़ रहे हैं?– यह सवाल केवल सुरक्षा का नहीं,बल्कि समाज का भी है, पिछले कुछ वर्षों में गंभीर अपराधों में नाबालिगों की संलिप्तता को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं,आखिर इसकी वजह क्या है? क्या पारिवारिक वातावरण और परवरिश में बदलाव इसका कारण है? क्या नशे की बढ़ती प्रवृत्ति किशोरों को अपराध की ओर धकेल रही है? क्या स्कूल छोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति भी एक कारण है? क्या सोशल मीडिया,हिंसक वेब सामग्री,मोबाइल गेम और डिजिटल प्लेटफॉर्म का असर बच्चों के व्यवहार पर पड़ रहा है? क्या मानसिक स्वास्थ्य और काउंसलिंग तक पर्याप्त पहुंच नहीं है? या फिर समाज और व्यवस्था, दोनों स्तरों पर कहीं ऐसी कमियां हैं जिन्हें समय रहते दूर नहीं किया गया? इन सभी सवालों का कोई एक उत्तर नहीं है,विशेषज्ञों का मानना है कि किशोर अपराध कई सामाजिक, आर्थिक,पारिवारिक और मनोवैज्ञानिक कारणों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम हो सकते हैं, इसलिए केवल सुरक्षा बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि रोकथाम, परामर्श,पारिवारिक सहयोग और पुनर्वास की व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा।
अब केवल फरार बालकों को पकड़ना ही समाधान नहीं…– अंबिकापुर और बिलासपुर की घटनाएं बताती हैं कि केवल फरार बालकों को वापस लाना ही समाधान नहीं है,वास्तविक चुनौती यह समझने की है कि वे बार-बार भाग क्यों रहे हैं,अपराध की ओर क्यों लौट रहे हैं और सुधार गृह का उद्देश्य क्यों पूरा नहीं हो पा रहा है,जब तक सुरक्षा व्यवस्था, नियमित काउंसलिंग,मनोवैज्ञानिक सहायता,प्रशिक्षित मानव संसाधन,जवाबदेही और प्रभावी पुनर्वास को एक साथ मजबूत नहीं किया जाएगा,तब तक ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना कठिन होगा,अब समय केवल घटनाओं के बाद कार्रवाई का नहीं,बल्कि ऐसी घटनाओं को पहले ही रोकने वाली व्यवस्था विकसित करने का है।


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