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कोरिया/सूरजपुर@44,300 रूपये का सवालः चंदा समाज का, हिसाब किसका ?

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  • चंदा समाज का, हिसाब किसका? 44,300 रुपये पर घिरा कोरिया साहू समाज
  • दैनिक घटती-घटना का बड़ा असरखबर छपते ही रसीद बुक लेकर सूरजपुर पहुंचे पदाधिकारी
  • 73 वोटर के बाद अब 44,300 रुपये का सवाल, आखिर जवाब देगा कौन?
  • अध्यक्ष का चुनाव अटका, अब चंदे का हिसाब भी लटका
  • माता कर्मा जयंती के नाम पर चंदा वसूला, फिर समाज के खाते में जमा क्यों नहीं हुआ?
  • कार्यक्रम सरकारी था तो चंदा क्यों लिया? चंदा लिया तो जमा क्यों नहीं किया?
  • रसीद बुक लौटी, लेकिन 44 हजार का हिसाब अब भी गायब
  • दैनिक घटती-घटना की खबर के बाद सूरजपुर पहुंचे पदाधिकारी, लेकिन सवाल अब भी बरकरार—पैसा जमा क्यों नहीं हुआ?

-रवि सिंह-
कोरिया/सूरजपुर,17 जून 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिला साहू समाज में पिछले छह महीनों से चल रहा नेतृत्व संकट अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां अध्यक्ष कौन बनेगा,यह सवाल पीछे छूटता दिखाई दे रहा है और उसकी जगह एक नया सवाल समाज के बीच चर्चा का विषय बन गया है—आखिर 44 हजार 300 रुपये गए कहां?
अध्यक्ष चुनाव,73 मतदाताओं की सूची, 25 हजार की आबादी,सदस्यता विवाद,चुनाव स्थगन,प्रदेश नेतृत्व का हस्तक्षेप,नए पर्यवेक्षकों की नियुक्ति और अब रसीद बुक से काटी गई राशि का हिसाब, कोरिया साहू समाज की राजनीति इन दिनों किसी सामाजिक संगठन से ज्यादा किसी चुनावी थ्रिलर फिल्म की पटकथा जैसी दिखाई दे रही है, दैनिक घटती-घटना द्वारा लगातार प्रकाशित खबरों के बाद समाज के भीतर जिस प्रकार की हलचल दिखाई दी, उसने यह संकेत जरूर दे दिया कि सवालों की अनदेखी अब आसान नहीं रह गई है।
73 मतदाता,25 हजार आबादी और अब 44 हजार का हिसाब
कोरिया साहू समाज का चुनाव पहले ही पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन चुका है,लगभग 25 हजार आबादी वाले समाज में केवल 73 मतदाताओं की सूची सामने आने के बाद लगातार सवाल उठे, फिर सदस्यता अभियान की मांग हुई, फिर चुनाव स्थगित हुआ,फिर प्रदेश नेतृत्व को हस्तक्षेप करना पड़ा,फिर नए पर्यवेक्षक नियुक्त हुए और अब आर्थिक पारदर्शिता का प्रश्न सामने आ गया, यानी चुनाव शुरू होने से पहले ही समाज के सामने मतदाता सूची, सदस्यता सूची और अब आय-व्यय सूची तीनों का संकट खड़ा हो गया है।
पर्यवेक्षकों के सामने केवल चुनाव नहीं,विश्वास बचाने की चुनौती
प्रदेश साहू संघ ने नए पर्यवेक्षकों की नियुक्ति कर दी है,लेकिन अब उनके सामने चुनौती केवल अध्यक्ष चुनने की नहीं है, सबसे बड़ी चुनौती यह है कि समाज का विश्वास कैसे बहाल होगा? यदि सदस्यता विवाद बना रहेगा, यदि चंदे का हिसाब स्पष्ट नहीं होगा और यदि समाज के लोगों को जवाब नहीं मिलेगा,तो नया अध्यक्ष चाहे जो बने, विवाद खत्म होने की संभावना कम ही दिखाई देती है।
खबर छपी और रसीद बुक लेकर सूरजपुर पहुंचे पदाधिकारी
15 जून को प्रकाशित खबर में कोरिया साहू समाज के चुनाव,सदस्यता और नेतृत्व संकट को प्रमुखता से उठाया गया था,खबर के प्रकाशन के बाद अचानक संगठन में गतिविधियां तेज हो गईं, जानकारी सामने आई कि कोरिया जिला साहू समाज के पदाधिकारी रसीद पुस्तकों के साथ सूरजपुर पहुंचे और वहां जिला साहू संघ सूरजपुर के पदाधिकारियों से मुलाकात की, यहीं से चर्चा ने नया मोड़ ले लिया, सूरजपुर जिला साहू संघ के महामंत्री द्वारा व्हाट्सऐप समूह में साझा किए गए संदेश में दावा किया गया कि माता कर्मा जयंती महोत्सव के लिए दी गई रसीद पुस्तकों से कुल 44,300 रुपये की राशि काटी गई थी,लेकिन यह राशि जिला साहू संघ सूरजपुर में जमा नहीं हुई, बस फिर क्या था, समाज के भीतर एक नया सवाल जन्म ले चुका था।
चंदा लिया गया था तो गया कहां?
वायरल संदेश के अनुसार बैकुंठपुर क्षेत्र से 11,800, सोनहत क्षेत्र से 7,550, बचरा-पटना क्षेत्र से 24,950 कुल राशि ?44,300 अब सवाल यह है कि यदि समाज के नाम पर चंदा लिया गया था तो उसका अंतिम गंतव्य क्या था? क्या राशि समाज के खाते में जमा हुई? यदि नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई? यदि राशि की जरूरत नहीं थी तो दानदाताओं को वापस क्यों नहीं की गई? यदि राशि किसी अन्य मद में खर्च हुई तो उसका लेखा-जोखा कहां है? ये वे सवाल हैं जिनका उत्तर समाज का हर सदस्य जानना चाहता है।
नई दलील ये है की कार्यक्रम सरकारी था,इसलिए पैसा जमा नहीं किया
विवाद के बीच यह चर्चा भी सामने आई कि कोरिया साहू समाज के कुछ पदाधिकारी यह तर्क दे रहे हैं कि माता कर्मा जयंती का कार्यक्रम सरकारी सहयोग से आयोजित हुआ था,इसलिए चंदे की राशि जमा नहीं की गई, यदि यह तर्क सही है तो इससे विवाद कम नहीं बल्कि और गंभीर हो जाता है, क्योंकि तब अगला सवाल खड़ा होता है यदि कार्यक्रम सरकारी राशि से होना था तो समाज के नाम पर चंदा क्यों काटा गया? यदि कार्यक्रम के लिए धन की आवश्यकता नहीं थी तो रसीद पुस्तकों का वितरण क्यों किया गया? यदि लोगों से सहयोग लिया गया था तो वह सहयोग समाज के खाते में क्यों नहीं पहुंचा? और यदि वह राशि समाज के खाते में नहीं पहुंची तो वह किस खाते में पहुंची?
समाज पूछ रहा है…गलती है,लापरवाही है या नीयत का मामला है?
समाज के वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि कोई भी संगठन केवल भवन,पद या चुनाव से नहीं चलता। संगठन विश्वास से चलता है, जब लोग समाज के नाम पर रसीद कटवाते हैं तो उन्हें भरोसा होता है कि उनका पैसा समाज के विकास, कार्यक्रमों और गतिविधियों में लगेगा, लेकिन जब उसी राशि का हिसाब मांगना पड़े तो स्थिति असहज हो जाती है, आज समाज के भीतर तीन तरह की चर्चाएं चल रही हैं, पहली—क्या यह केवल लेखा-जोखा की चूक है? दूसरी—क्या राशि जमा करने में प्रशासनिक लापरवाही हुई? तीसरी—क्या कहीं न कहीं नीयत पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं? हालांकि बिना जांच किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा, लेकिन सवालों का उठना भी स्वाभाविक है।
अध्यक्ष की कुर्सी या समाज का भरोसा?
समाज के कई वरिष्ठ लोग अब खुलकर कह रहे हैं कि असली लड़ाई अध्यक्ष पद की नहीं है,असली लड़ाई यह तय करने की है कि समाज पारदर्शी तरीके से चलेगा या नहीं,क्योंकि अध्यक्ष बदलते रहते हैं,लेकिन संगठन की साख एक बार चली जाए तो उसे वापस लाने में वर्षों लग जाते हैं, आज कोरिया साहू समाज के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या 44,300 रुपये का पूरा हिसाब सार्वजनिक होगा? क्या दानदाताओं को बताया जाएगा कि उनकी राशि कहां गई? क्या समाज के खाते, आय-व्यय और रसीद पुस्तकों का ऑडिट होगा? और सबसे महत्वपूर्ण क्या नया नेतृत्व इन सवालों का जवाब देगा या फिर यह मामला भी चुनावी नारों और बैठकों के बीच कहीं दब जाएगा? फिलहाल समाज की निगाहें पदाधिकारियों, पर्यवेक्षकों और प्रदेश नेतृत्व पर टिकी हैं,क्योंकि अब मामला केवल चुनाव का नहीं, बल्कि विश्वास,पारदर्शिता और जवाबदेही का बन चुका है। और समाज के लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर चंदा समाज का था, तो हिसाब भी समाज को कब मिलेगा?


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