Breaking News

कोरिया@ आईएएस से दोगुना वेतन वाला स्टेनो! 24 साल की ‘मेहरबानी’

Share

  • मत्स्य महासंघ से कलेक्टर कार्यालय तक का सफर,नियमों का चमत्कार,रिश्तों का कमाल या सिस्टम का बेमिसाल खेल?
  • मत्स्य महासंघ से कलेक्टर दरबार तक 24 साल में स्टेनो बना सिस्टम का सबसे ताकतवर किरदार,नियम हुए बेअसर?
  • कुर्सी ऐसी कि सरकारें बदल गईं,स्टेनो नहीं बदला! ग्रेड-3 से ग्रेड-1,डेढ़ लाख वेतन और 24 साल की प्रतिनियुक्ति का अनसुलझा रहस्य…
  • साहब’ बदले,सरकार बदली,लेकिन स्टेनो की कुर्सी नहीं हिली,कोरिया कलेक्टर कार्यालय में 24 साल की मेहरबानी पर उठे बड़े सवाल
  • यह स्टेनो है या प्रशासनिक चमत्कार? मत्स्य महासंघ का कर्मचारी,राजस्व विभाग का वेतन और 24 साल तक सत्ता के गलियारों में जलवा
  • डेढ़ लाख का स्टेनो और 24 साल का राज संविलियन,पदोन्नति,प्रतिनियुक्ति और वेतन निर्धारण पर घिरा घनश्याम मिश्रा प्रकरण
  • ‘कुर्सी मेरी, मर्जी मेरी’ मॉडल का खुलासा? कोरिया में स्टेनो प्रकरण ने खड़े किए प्रशासनिक जवाबदेही के गंभीर सवाल…
  • 24 साल का स्टेनो राज! आईएएस से ज्यादा वेतन,कलेक्टर कार्यालय में स्थायी दबदबा और नियमों पर उठते सवाल…


-रवि सिंह-
कोरिया,16 जून 2026 (घटती-घटना)।
सरकारी दफ्तरों में आम कर्मचारी पूरी नौकरी निकाल देता है, लेकिन उसे यह पता नहीं चल पाता कि उसकी अगली वेतनवृद्धि कब होगी,पदोन्नति कब मिलेगी और उसकी फाइल किस टेबल पर धूल खा रही है, दूसरी तरफ कोरिया जिले में एक ऐसा प्रकरण सामने आया है जिसने सरकारी व्यवस्था, प्रतिनियुक्ति नियमों,पदोन्नति प्रक्रिया और वित्तीय अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला कोरिया कलेक्टर कार्यालय में वर्षों से प्रभावशाली भूमिका में रहे स्टेनो टू कलेक्टर घनश्याम मिश्रा का है,आरोपों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर उठ रहे सवालों का केंद्र केवल उनका वेतन नहीं है,बल्कि वह पूरा प्रशासनिक सफर है जिसने एक सहकारिता/मत्स्य महासंघ से जुड़े कर्मचारी को कथित रूप से 24 वर्षों तक राजस्व विभाग और कलेक्टर कार्यालय की सबसे संवेदनशील कुर्सियों में से एक पर बनाए रखा,चर्चा यह भी है कि उनका मासिक वेतन लगभग 1 लाख 46 हजार रुपये तक पहुंच चुका है,यह राशि कई वरिष्ठ अधिकारियों के वेतन के बराबर या उससे अधिक बताई जा रही है, ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह पूरा घटनाक्रम किन नियमों के तहत हुआ?
साल 2000 से शुरू होती है कहानी…
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 31 अक्टूबर 2000 को मध्यप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के तहत छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के समय मध्यप्रदेश मत्स्य महासंघ सहकारी मर्यादित भोपाल द्वारा घनश्याम मिश्रा को छत्तीसगढ़ में कार्यभार ग्रहण करने के लिए मुक्त किया गया था,आदेश के अनुसार उन्हें छत्तीसगढ़ मत्स्य महासंघ में अपनी सेवाएं देने के लिए भेजा गया था,यहीं से पहला और सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है,यदि कर्मचारी को मत्स्य महासंघ में कार्यभार ग्रहण करना था तो फिर वह कलेक्टर कार्यालय की व्यवस्था का हिस्सा कैसे बना? यदि बना तो किस आदेश से? यदि प्रतिनियुक्ति पर आया तो उसकी अवधि कितनी थी? और यदि संविलियन हुआ तो उसका वैधानिक आदेश कहां है?
सवाल सिर्फ एक स्टेनो का नहीं,पूरे सिस्टम का है…
कोरिया जिले का यह मामला अब एक कर्मचारी की कहानी नहीं रह गया है,यह प्रशासनिक पारदर्शिता,वित्तीय अनुशासन, सेवा नियमों और जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है,आज जिले के कर्मचारी पूछ रहे हैं कि यदि नियम सबके लिए समान हैं तो फिर कुछ लोगों पर नियम लागू क्यों नहीं होते? और यदि नियम लागू होते हैं तो 24 वर्षों तक यह व्यवस्था कैसे चलती रही? कोरिया की जनता अब जवाब चाहती है,क्योंकि सवाल केवल यह नहीं है कि एक स्टेनो डेढ़ लाख रुपये वेतन कैसे पा रहा था,बल्कि यह है कि क्या किसी व्यक्ति से ज्यादा शक्तिशाली वह व्यवस्था है जिसने 24 वर्षों तक किसी भी सवाल को फाइलों के नीचे दबाए रखा? और शायद यही कारण है कि बैकुंठपुर के प्रशासनिक गलियारों में आज सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला प्रश्न यही है यह एक कर्मचारी की असाधारण सफलता की कहानी है,या फिर सिस्टम की असाधारण मेहरबानी की?
जांच हुई तो खुल सकते हैं कई राज…
प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच होती है तो केवल एक कर्मचारी नहीं बल्कि पिछले दो दशकों की प्रशासनिक कार्यप्रणाली भी जांच के दायरे में आएगी,यह जांच बताएगी कि प्रतिनियुक्ति वैध थी या नहीं,संविलियन हुआ या नहीं, वेतन निर्धारण किस आधार पर हुआ, पदोन्नति किस नियम के तहत मिली,और आखिर वह कौन-सी प्रशासनिक आवश्यकता थी जिसके कारण 24 वर्षों तक एक ही व्यवस्था को बनाए रखा गया।
प्रशासन की चुप्पी सबसे बड़ा सवाल…
इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक चर्चा प्रशासन की चुप्पी को लेकर हो रही है,यदि कर्मचारी की नियुक्ति,प्रतिनियुक्ति,वेतन,पदोन्नति और सेवा रिकॉर्ड पूरी तरह वैध हैं तो प्रशासन को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, लेकिन यदि सवालों के बावजूद कोई जवाब नहीं दिया जाता, तो संदेह और गहराते हैं।
प्रतिनियुक्ति का नियम क्या कहता है?
सामान्य प्रशासन विभाग और कार्मिक नियमों के अनुसार प्रतिनियुक्ति किसी कर्मचारी को सीमित अवधि के लिए दूसरे विभाग या संस्था में भेजने की व्यवस्था है,सामान्यतः प्रतिनियुक्ति 3 से 5 वर्ष तक की होती है। विशेष परिस्थितियों में इसका विस्तार हो सकता है,लेकिन अनिश्चितकालीन प्रतिनियुक्ति की अवधारणा नियम पुस्तकों में नहीं मिलती,यही कारण है कि यदि कोई कर्मचारी लगभग 24 वर्षों तक एक ही विभाग में कार्यरत रहा हो तो यह स्वाभाविक रूप से जांच का विषय बन जाता है,व्यंग्य में कर्मचारी कह रहे हैं सरकारी नियमों में प्रतिनियुक्ति पांच साल की होती है,लेकिन कोरिया में शायद नया नियम बना होगा—जब तक कुर्सी खुश रहे, तब तक प्रतिनियुक्ति जारी रहे।
राजस्व विभाग में क्या स्टेनो खत्म हो गए थे?
कोरिया जिले के कर्मचारी संगठन भी इस पूरे मामले को लेकर सवाल उठा रहे हैं,राजस्व विभाग प्रदेश का सबसे बड़ा प्रशासनिक विभाग माना जाता है,यहां स्टेनोग्राफर,सहायक ग्रेड कर्मचारी,अधीक्षक और अनुभवी प्रशासनिक अमला उपलब्ध रहता है,फिर ऐसा क्या हुआ कि एक दूसरे विभाग के कर्मचारी को वर्षों तक कलेक्टर कार्यालय में बनाए रखा गया? क्या राजस्व विभाग के अपने कर्मचारी अयोग्य थे? क्या विभाग के पास कोई योग्य निज सहायक नहीं था? क्या कलेक्टर कार्यालय के लिए केवल वही एक कर्मचारी उपलब्ध था? यदि नहीं,तो अन्य कर्मचारियों के अवसर किस आधार पर रोके गए?
कलेक्टर का निज सहायक छोटी कुर्सी नहीं,बड़ा प्रभाव…
प्रशासनिक व्यवस्था में कलेक्टर का निज सहायक केवल टाइपिंग करने वाला कर्मचारी नहीं माना जाता,यह पद कलेक्टर कार्यालय के सबसे प्रभावशाली पदों में से एक माना जाता है,अधिकारियों,जनप्रतिनिधियों,विभागों और जनता के बीच होने वाले संवाद में इस पद की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, यही कारण है कि इस पद पर बैठा व्यक्ति सीधे प्रशासनिक गतिविधियों के केंद्र में होता है,अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि कोई अर्धसरकारी या सहकारिता क्षेत्र का कर्मचारी वर्षों तक इस कुर्सी पर बैठा रहा तो क्या उसकी भूमिका और अधिकारों की कभी समीक्षा की गई? क्या यह सुनिश्चित किया गया कि पद का दुरुपयोग न हो? या फिर पूरा सिस्टम ही इस व्यवस्था को बनाए रखने में रुचि रखता था?
ग्रेड-3 से ग्रेड-2 और फिर ग्रेड-1 आखिर हुआ कैसे?
प्रकरण का सबसे रहस्यमय हिस्सा पदोन्नति को लेकर है, सूत्रों के अनुसार एक समय निम्न श्रेणी में कार्यरत कर्मचारी बाद में उच्च ग्रेड तक पहुंच गया,अब सवाल उठ रहे हैं ग्रेड-3 से ग्रेड-2 कब बने? ग्रेड-2 से ग्रेड-1 कब पहुंचे? किस विभागीय पदोन्नति समिति ने अनुमोदन दिया? क्या वरिष्ठता सूची जारी हुई? क्या रिक्त पद उपलब्ध थे? यदि कर्मचारी मत्स्य महासंघ का था तो पदोन्नति वहां से मिली या राजस्व विभाग से? यदि राजस्व विभाग से मिली तो संविलियन का आदेश कहां है? इन सवालों का जवाब आज तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया।
1 लाख 46 हजार का वेतन…आखिर किस नियम से?
प्राप्त जानकारी के अनुसार घनश्याम मिश्रा का मासिक वेतन लगभग 1.46 लाख रुपये तक पहुंच चुका है,यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यह वेतन किस वेतनमान और किस सेवा नियम के तहत निर्धारित हुआ? यदि कर्मचारी मत्स्य महासंघ का था तो वेतन संरचना किस आधार पर तय हुई? यदि राजस्व विभाग भुगतान कर रहा था तो क्या वित्त विभाग की अनुमति ली गई थी? क्या वेतन निर्धारण का परीक्षण कभी हुआ? क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में कलेक्टर कार्यालय के स्टेनो का वेतन इससे काफी कम बताया जाता है,यही कारण है कि कर्मचारी अब पूछ रहे हैं जो काम 60-65 हजार में हो सकता था,उसके लिए 24 साल तक डेढ़ लाख का इंतजाम क्यों किया गया?
इंक्रीमेंट का रहस्य…फाइलें किसके पास थीं?
किसी भी कर्मचारी की वार्षिक वेतनवृद्धि सेवा पुस्तिका और वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन के आधार पर होती है,लेकिन इस मामले में सवाल यह है कि सेवा पुस्तिका का संधारण किस विभाग ने किया? मत्स्य महासंघ ने? सहकारिता विभाग ने? या राजस्व विभाग ने? यदि कर्मचारी मूल विभाग में नहीं था तो वहां सेवा सत्यापन कैसे हुआ? यदि राजस्व विभाग में था तो संविलियन का रिकॉर्ड कहां है? हर साल वेतनवृद्धि किस आधार पर दी गई? इन सवालों के जवाब जितने जरूरी हैं, उतने ही रहस्यमय भी।
छुट्टी नहीं ली या रिकॉर्ड नहीं मिला?
सरकारी सेवा में अवकाश प्रबंधन अनिवार्य प्रक्रिया है, अर्जित अवकाश,अर्धवेतन अवकाश, चिकित्सा अवकाश और अन्य अवकाशों का रिकॉर्ड रखा जाता है,लेकिन चर्चाओं में यह बात भी सामने आ रही है कि वर्षों के रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं हैं,यदि रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं तो यह प्रशासनिक लापरवाही का मामला हो सकता है,और यदि रिकॉर्ड हैं तो उन्हें सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों?
कांग्रेस से रिश्तेदारी,भाजपा से नजदीकी?
स्थानीय राजनीतिक गलियारों में इस पूरे मामले को लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं,कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि कांग्रेस शासनकाल में भी प्रभाव बना रहा और भाजपा शासनकाल में भी स्थिति जस की तस रही,इसी वजह से व्यंग्य में कहा जा रहा है सत्ता बदली,सरकार बदली,कमिश्नर बदले,कलेक्टर बदले, लेकिन यदि कुछ नहीं बदला तो वह था स्टेनो की कुर्सी, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्ष का पक्ष भी सामने आना आवश्यक है,लेकिन यदि एक कर्मचारी हर राजनीतिक और प्रशासनिक दौर में समान प्रभाव बनाए रखता है तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
कमिश्नर और कलेक्टर कार्यालय पर भी सवाल…
इस पूरे मामले ने केवल एक कर्मचारी नहीं बल्कि उन सभी अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं जिन्होंने वर्षों तक इस व्यवस्था को जारी रहने दिया,यदि सब कुछ नियमसम्मत था तो दस्तावेज सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए? यदि नियमों के विरुद्ध था तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या कभी ऑडिट में यह मामला उठा? क्या वित्तीय परीक्षण हुआ? क्या किसी अधिकारी ने आपत्ति दर्ज की? यदि नहीं,तो क्यों?


Share

Check Also

अम्बिकापुर@शराब पीकर बाइक दौड़ाना पड़ा महंगाः तीन चालकों पर 30 हजार का जुर्माना, फिर भी नहीं थम रही नशे में ड्राइविंग

Share डॉक्टरी जांच में शराब सेवन की पुष्टि, पुलिस ने जब्त किए वाहन; सड़क सुरक्षा …

Leave a Reply