- 95 हजार की वसूली तय,लेकिन अपात्र को लाभ दिलाने वालों पर कार्रवाई कब?
- पीएम आवास में बड़ा खेल! पहले पात्र,फिर अपात्र,95 हजार की रिकवरी के बाद सिस्टम पर उठे सवाल
- पीएम आवास में ‘पात्र’ से ‘अपात्र’ बनने की कहानी,क्या सिर्फ हितग्राही दोषी या पूरा सिस्टम कटघरे में?
- जनपद सदस्य रंजीत मंडल पर रिकवरी का आदेश,
- पीएमओ तक पहुंची शिकायत, आदिवासी भूमि कब्जे से लेकर आवास राशि तक कई सवालों में घिरा मामला
- अपात्र था तो पैसा किसने दिलाया? पीएम आवास घोटाले में जनपद सदस्य पर कार्रवाई, अब अधिकारियों की बारी कब?
- पीएम आवास का ‘पात्रता मॉडल’ सवालों में शिकायत के बाद खुली फाइलें, रिकवरी का आदेश और जवाबदेही से बचता सिस्टम
- 95 हजार की रिकवरी,लेकिन असली दोषी कौन? जनपद सदस्य पर कार्रवाई शुरू,पात्र घोषित करने वालों पर खामोशी
- गरीबों का हक किसने छीना? पीएम आवास योजना में अपात्र को लाभ देने का मामला बना बड़ा सवाल
- रिकवरी हितग्राही से,जवाबदेही किससे? पीएम आवास योजना में अनियमितता ने खोली चयन प्रक्रिया की पोल
-रवि सिंह-
कोरिया,09 जून 2026(घटती-घटना)। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) देश की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक योजनाओं में गिनी जाती है, इस योजना का उद्देश्य उन गरीब परिवारों को पक्का आवास उपलब्ध कराना है जो आज भी कच्चे मकानों में रहने को मजबूर हैं, सरकार हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च कर गरीबों को छत देने का दावा करती है, लेकिन जब इसी योजना में पात्र और अपात्र की परिभाषा शिकायत के बाद बदलने लगे, तब सवाल सिर्फ एक हितग्राही पर नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था पर खड़े होने लगते हैं, कोरिया जिले के बैकुंठपुर क्षेत्र से सामने आया मामला अब सिर्फ प्रधानमंत्री आवास योजना का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली,सर्वे प्रक्रिया, जांच तंत्र और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिन्ह बन गया है।
पीएमओ तक पहुंची शिकायत,शुरू हुआ पूरा विवाद
मामले की शुरुआत तब हुई जब बैकुंठपुर निवासी प्रकाश सिंह ने प्रधानमंत्री कार्यालय की शिकायत निवारण प्रणाली सीपीग्राम्स में शिकायत दर्ज कराई, शिकायत क्रमांक PMOPG/E/2026/0077588 में आरोप लगाया गया कि जनपद पंचायत बैकुंठपुर क्षेत्र क्रमांक-17 के जनपद सदस्य रंजीत प्रसाद मंडल ने प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) का लाभ प्राप्त किया जबकि वे पात्रता की श्रेणी में नहीं आते थे, शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि आवास निर्माण पुराने भवन की छत पर किया गया और योजना की राशि का दुरुपयोग हुआ, मामले को गंभीर मानते हुए प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) संचालनालय, नवा रायपुर ने 2 जून 2026 को कलेक्टर कोरिया को पत्र जारी कर सात दिवस के भीतर नियमानुसार कार्रवाई और प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।
कार्रवाई केवल हितग्राही पर या जिम्मेदार अधिकारियों पर भी?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रश्न यही है,यदि किसी व्यक्ति को गलत तरीके से प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिला है तो क्या केवल लाभार्थी ही दोषी है? जिस कर्मचारी ने सर्वे किया,जिस अधिकारी ने पात्रता सूची तैयार की,जिसने सत्यापन किया,जिसने अनुमोदन किया,जिसने भुगतान जारी किया, क्या उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? क्योंकि किसी भी सरकारी योजना में भुगतान एक व्यक्ति की इच्छा से नहीं बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया के बाद होता है, यदि प्रक्रिया में त्रुटि हुई है तो जवाबदेही भी उसी अनुपात में तय होनी चाहिए।
आदिवासी भूमि कब्जे के आरोपों ने बढ़ाई मुश्किलें…
मामला केवल प्रधानमंत्री आवास योजना तक सीमित नहीं है,एसडीएम बैकुंठपुर न्यायालय द्वारा 20 फरवरी 2026 को जारी आदेश में ग्राम खोड़, तहसील पटना की भूमि से संबंधित विवाद का उल्लेख है,शिकायत के आधार पर कुछ व्यक्तियों को निर्माण कार्य पर रोक लगाने के निर्देश दिए गए थे, राजस्व निरीक्षक द्वारा प्रस्तुत जांच प्रतिवेदन में भूमि खसरा नंबर 269/4 और 269/5 से संबंधित स्थिति का उल्लेख करते हुए आदिवासी भूमि पर कब्जे और निर्माण संबंधी बिंदुओं का परीक्षण किया गया,प्रतिवेदन में भूमि स्वामित्व, कब्जे और निर्माण गतिविधियों को लेकर कई तथ्य दर्ज किए गए हैं,यही कारण है कि मामला अब केवल आवास योजना तक सीमित न रहकर राजस्व और भूमि विवाद से भी जुड़ गया है।
95 हजार रुपये की रिकवरी का आदेश
मामले की जांच पहले ही जनपद पंचायत बैकुंठपुर स्तर पर हो चुकी थी, जनपद पंचायत बैकुंठपुर द्वारा 27 फरवरी 2026 को जारी आदेश में रंजीत मंडल को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत प्राप्त 95,000 रुपये की राशि एक माह के भीतर वापस जमा करने के निर्देश दिए गए, आदेश में उल्लेख किया गया कि जांच दल द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन के अनुसार हितग्राही के पास पहले से पक्का मकान उपलब्ध था,जांच में यह भी उल्लेख किया गया कि उनकी पत्नी शासकीय सेवा से जुड़ी थीं तथा परिवार की आर्थिक स्थिति योजना की पात्रता के अनुरूप नहीं पाई गई,इसी आधार पर उन्हें अपात्र मानते हुए राशि वसूली योग्य घोषित किया गया।
सबसे बड़ा सवाल: अगर अपात्र थे तो पात्र किसने बनाया?
यहीं से पूरा मामला दिलचस्प और गंभीर दोनों हो जाता है, प्रधानमंत्री आवास योजना में किसी व्यक्ति को लाभ देने से पहले लंबी प्रक्रिया होती है,सर्वे होता है,पात्रता सूची तैयार होती है,ग्राम पंचायत स्तर पर सत्यापन होता है,जनपद पंचायत और संबंधित विभागों द्वारा परीक्षण किया जाता है,फिर स्वीकृति और भुगतान होता है, ऐसे में यदि आज यह कहा जा रहा है कि रंजीत मंडल के पास पुराना पक्का मकान था,चार पहिया वाहन था, स्कूटी और मोटरसाइकिल थी,उनकी पत्नी नर्स के पद पर कार्यरत थीं और लगभग पांच लाख रुपये का व्यवसाय भी था,तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह सारी जानकारी भुगतान से पहले दिखाई क्यों नहीं दी? क्या सर्वे गलत हुआ? क्या जांच प्रतिवेदन गलत तैयार हुआ? क्या पात्रता सूची में नाम शामिल करते समय नियमों की अनदेखी हुई? या फिर किसी स्तर पर जानबूझकर आंखें बंद कर ली गईं?
शिकायत नहीं होती तो क्या कार्रवाई होती?
यह सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं है,यदि शिकायतकर्ता प्रधानमंत्री कार्यालय तक मामला नहीं पहुंचाता,यदि सीपीग्राम्स पोर्टल में शिकायत दर्ज नहीं होती,यदि जांच नहीं होती,तो क्या यह मामला सामने आता? स्थानीय लोगों का कहना है कि कई मामलों में शिकायत होने तक सब कुछ नियमों के अनुरूप माना जाता है,लेकिन शिकायत के बाद अचानक वही हितग्राही अपात्र घोषित हो जाता है,यदि ऐसा है तो फिर यह केवल एक व्यक्ति की गलती नहीं बल्कि पूरे सत्यापन तंत्र की विफलता है।
गरीबों का हक किसने छीना?
प्रधानमंत्री आवास योजना का सबसे संवेदनशील पहलू यही है कि यदि किसी अपात्र व्यक्ति को लाभ मिलता है तो उसका सीधा नुकसान किसी पात्र गरीब परिवार को होता है,संभव है कि कोई वास्तविक गरीब परिवार सूची से बाहर रह गया हो और उसके हिस्से का लाभ किसी दूसरे व्यक्ति को मिल गया हो,यही वह बिंदु है जहां भ्रष्टाचार,लापरवाही और प्रशासनिक विफलता की आशंकाएं जन्म लेती हैं।
अब निगाहें प्रशासन पर…
फिलहाल मामला विभिन्न स्तरों पर विचाराधीन है। प्रधानमंत्री कार्यालय की शिकायत, जनपद पंचायत का रिकवरी आदेश, राजस्व विभाग की जांच और भूमि विवाद से जुड़े दस्तावेज इस पूरे प्रकरण को गंभीर बना रहे हैं,अब जनता की निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं, लोग जानना चाहते हैं कि कार्रवाई केवल 95 हजार रुपये की रिकवरी तक सीमित रहेगी या फिर उन अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी भी तय होगी जिन्होंने एक व्यक्ति को पात्र घोषित कर योजना का लाभ दिलाया, क्योंकि इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल आज भी अनुत्तरित है जब रंजीत मंडल आज अपात्र हैं, तो कल उन्हें पात्र किसने बनाया था? और जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, तब तक यह मामला सिर्फ एक जनपद सदस्य का नहीं,बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही का मामला बना रहेगा।
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