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बलरामपुर/राजपुर@पंचायतों से “विज्ञापन वसूली” का नेटवर्क?

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  • राजपुर सचिव संघ पर गंभीर आरोप, हर पंचायत से सालाना 5 हजार लेने की चर्चा
  • मीडिया मैनेजमेंट के नाम पर उगाही का दावा, प्रशासन बोला- जांच होगी

-सुदामा राजवाड़े-

बलरामपुर/राजपुर,18 मई 2026 (घटती-घटना)। बलरामपुर जिले के राजपुर जनपद क्षेत्र में पंचायत सचिव संघ पर “विज्ञापन” के नाम पर पंचायतों से अवैध वसूली करने के गंभीर आरोप लगे हैं। आरोप इतने गंभीर हैं कि अब सवाल केवल सचिव संघ तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि पंचायत व्यवस्था, जनसंपर्क विभाग और कुछ कथित मीडिया कर्मियों की भूमिका भी चर्चा के केंद्र में आ गई है।
मामले का खुलासा तब हुआ जब जनपद क्षेत्र के एक पंचायत सचिव ने कथित रूप से एक सूची साझा करते हुए दावा किया कि राजपुर जनपद क्षेत्र की प्रत्येक ग्राम पंचायत से सालाना 5-5 हजार रुपए “मीडिया विज्ञापन” के नाम पर लिए जाते हैं। बताया जा रहा है कि यह राशि सचिव संघ के माध्यम से एकत्र की जाती है।
हालांकि उपलब्ध कराई गई सूची की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन जिस तरह पंचायत स्तर पर यह चर्चा वर्षों से चल रही है, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पंचायत सचिव द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार यह वसूली कोई नई व्यवस्था नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहा एक संगठित सिस्टम है।
“मीडिया को पैसा देना पड़ता है…”सरपंचों और जनप्रतिनिधियों ने भी जताई नाराजगी
राजपुर जनपद क्षेत्र के कुछ जनप्रतिनिधियों और सरपंचों ने नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर बताया कि सचिव संघ के पदाधिकारी पंचायतों से सीधे राशि की मांग करते हैं। आरोप है कि जब पंचायत प्रतिनिधि कारण पूछते हैं तो कहा जाता है कि “मीडिया वालों को पैसा देना पड़ता है, नहीं तो पंचायतों में हो रहे भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों की खबरें लगातार प्रकाशित होंगी।”
यानी पंचायतों से वसूली गई राशि को कथित तौर पर “मीडिया मैनेजमेंट” के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल आर्थिक अनियमितता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और मीडिया की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न होगा।
बड़ा सवाल — क्या जनसंपर्क विभाग ने दी है अनुमति?
पूरा मामला सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर पंचायतों से “विज्ञापन” के नाम पर राशि लेने का अधिकार सचिव संघ को किसने दिया? क्या जिला जनसंपर्क कार्यालय या डीपीआरओ कार्यालय की ओर से किसी प्रकार की अनुमति या निर्देश जारी किए गए हैं? यदि नहीं, तो फिर वर्षों से यह व्यवस्था किसके संरक्षण में संचालित हो रही है?
स्थानीय स्तर पर चर्चा यह भी है कि पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर पहले से सीमित बजट होता है, ऐसे में इस तरह की कथित वसूली सीधे पंचायत फंड पर अतिरिक्त बोझ डालती है।
कुछ कथित मीडिया कर्मियों की भूमिका पर भी उठे सवाल
मामले में सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि पंचायतों से वसूली गई राशि आखिर किन लोगों तक पहुंचती है? क्या वास्तव में कुछ कथित मीडिया कर्मियों को इसका लाभ मिलता है? यदि हां, तो किन आधारों पर भुगतान किया जाता है? क्या किसी प्रकार का विज्ञापन प्रकाशित भी होता है या केवल नाम पर राशि ली जाती है?
क्षेत्र में यह चर्चा भी जोरों पर है कि कुछ तथाकथित मीडिया कर्मी पंचायतों में होने वाली अनियमितताओं को दबाने के लिए इस व्यवस्था का हिस्सा बने हुए हैं। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही संभव होगी।
“मामला संज्ञान में नहीं, सही हुआ तो गंभीर” — सीईओ
मामले को लेकर जब जनपद पंचायत राजपुर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी संजय दुबे से चर्चा की गई तो उन्होंने कहा कि यह मामला फिलहाल उनके संज्ञान में नहीं है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह बेहद गंभीर विषय है। उन्होंने कहा कि मामले की जानकारी लेकर जांच कराई जाएगी और आवश्यक होने पर प्रेस नोट भी जारी किया जाएगा।
सचिव संघ अध्यक्ष से संपर्क नहीं
वहीं सचिव संघ के अध्यक्ष अशोक गुप्ता से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। ऐसे में सचिव संघ का पक्ष सामने नहीं आ सका है।
अब सबकी नजर प्रशासनिक कार्रवाई पर
समाचार सामने आने के बाद अब क्षेत्र में चर्चा तेज हो गई है। पंचायत प्रतिनिधियों, आम लोगों और प्रशासनिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि यदि पंचायतों से वास्तव में इस तरह की राशि ली जा रही थी, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
अब देखने वाली बात यह होगी कि जिला प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराता है या मामला केवल बयानबाजी तक सीमित रह जाता है। यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है तो यह पंचायत व्यवस्था और मीडिया जगत दोनों के लिए बड़ा खुलासा साबित हो सकता है।


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