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बैकुंठपुर/कोरिया@@खुद प्रदेश अध्यक्ष की नहीं मानी, अब समाज से बहिष्कार का फरमान!

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  • कोरिया साहू समाज में नेतृत्व संकट गहराया, विवादित अध्यक्ष,
  • बंटी हुई समाज व्यवस्था और बहिष्कार प्रस्ताव ने खड़े किए बड़े सवाल
  • जिला अध्यक्ष का चुनाव वर्षों से अधर में…विवादित बैठक के बाद समाज में मचा घमासान
  • खुद का चुनाव नहीं, अब समाज को दे रहे फरमान!
  • विवादित अध्यक्ष और बहिष्कार का ड्रामा, साहू समाज में मचा घमासान
  • प्रदेश अध्यक्ष के आदेश ठंडे बस्ते में, जिले में चलता रहा ‘स्वयंभू राज’
  • जब अध्यक्ष ही विवादित,तो बहिष्कार किस आधार पर?
  • साहू समाज में दो फाड़ः कुर्सी बचाने बहिष्कार का हथियार?
  • समाज से बड़ा कौन? विवादित नेतृत्व पर उठे कानूनी सवाल
  • अध्यक्ष पद रिक्त,फिर भी जारी बहिष्कार का फरमान!
  • कुर्सी,समाज और बहिष्कारः कोरिया साहू समाज का अंदरूनी संग्राम
  • ‘हम ही अध्यक्ष’ की जिद में उलझा समाज, अब फैसलों पर उठे सवाल


-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया, 18 मई 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले में साहू समाज इन दिनों गहरे आंतरिक विवाद, नेतृत्व संकट और सामाजिक टकराव के दौर से गुजर रहा है,जिला अध्यक्ष पद को लेकर लंबे समय से चली आ रही खींचतान अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है,जहां समाज के भीतर ही समाज की वैधता और फैसलों की संवैधानिक स्थिति पर सवाल उठने लगे हैं।
मामला तब और ज्यादा गरमा गया जब ग्राम स्तर पर आयोजित एक सामाजिक बैठक में कुछ लोगों द्वारा बहिष्कार संबंधी प्रस्ताव पारित किए जाने की जानकारी सामने आई,इस बैठक के बाद अब पूरे जिले में यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर जब स्वयं जिला अध्यक्ष का पद ही विवादित है,चुनाव वर्षों से नहीं हुए हैं और प्रदेश नेतृत्व के आदेशों को लगातार नजरअंदाज किया गया,तब किसी व्यक्ति या परिवार का सामाजिक बहिष्कार करने का अधिकार आखिर किसके पास है? यह विवाद अब केवल समाज की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि कानूनी,सामाजिक और संवैधानिक बहस का विषय बनता जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी है…
आज पूरे कोरिया जिले में एक ही सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है, जब स्वयं समाज का जिला अध्यक्ष पद विवादित है,चुनाव नहीं हुए,प्रदेश अध्यक्ष के आदेशों का पालन नहीं हुआ और संगठन दो हिस्सों में बंटा दिखाई दे रहा है,तब किसी सामाजिक बहिष्कार के फैसले को आखिर कौन मानेगा? और उससे भी बड़ा सवाल क्या समाज अब संगठनात्मक सुधार की दिशा में आगे बढ़ेगा,या फिर नेतृत्व की यह लड़ाई आने वाले समय में और बड़ा विवाद बन जाएगी?
क्या बहिष्कार का फैसला अपराध की श्रेणी में आ सकता है? कानूनी विशेषज्ञों की नजर में गंभीर मामला
कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को उसकी वैवाहिक पसंद,अंतरजातीय विवाह या सरकारी योजना का लाभ लेने के कारण सामाजिक रूप से प्रताडि़त किया जाता है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ विभिन्न कानूनी धाराओं के तहत कार्रवाई संभव है,यदि किसी बैठक में लोगों को सामाजिक रूप से अलग-थलग करने, आर्थिक या सामाजिक दबाव बनाने अथवा सार्वजनिक अपमानित करने का प्रस्ताव पारित किया गया हो,तो यह मामला संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन से जुड़ सकता है,विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सामाजिक संगठन को संविधान से ऊपर अधिकार प्राप्त नहीं हैं, भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता, समानता और गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है।
समाज के भीतर बढ़ता असंतोष,युवा वर्ग खुलकर उठा रहा सवाल
इस पूरे विवाद के बाद साहू समाज के भीतर युवा वर्ग में काफी नाराजगी देखी जा रही है,कई युवाओं का कहना है कि समाज को आधुनिक सोच और शिक्षा की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन यहां नेतृत्व की लड़ाई और पद की राजनीति में समाज की छवि खराब हो रही है, कुछ युवाओं ने यह भी कहा कि समाज को संगठित करने के बजाय गुटबाजी और व्यक्तिगत वर्चस्व की राजनीति ने स्थिति को और खराब किया है, समाज के भीतर अब यह मांग भी उठने लगी है कि जल्द से जल्द निष्पक्ष चुनाव कराए जाएं और वैधानिक जिला अध्यक्ष चुना जाए।
प्रदेश नेतृत्व की चुप्पी पर भी सवाल
समाज के कई लोगों का कहना है कि यदि प्रदेश स्तर से समय रहते सख्त निर्णय लिए जाते और चुनाव प्रक्रिया को अनिवार्य बनाया जाता, तो स्थिति यहां तक नहीं पहुंचती,अब जब विवाद खुलकर सामने आ चुका है, तब प्रदेश नेतृत्व की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं,लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर प्रदेश संगठन विवादित नेतृत्व पर क्या कार्रवाई करेगा? क्या चुनाव कराए जाएंगे? क्या बहिष्कार प्रस्ताव को वैध माना जाएगा? और क्या समाज के भीतर चल रही समानांतर व्यवस्था पर रोक लगेगी?
प्रशासन भी रखे हुए है नजर
सूत्रों के अनुसार,पूरे घटनाक्रम पर प्रशासनिक स्तर पर भी नजर रखी जा रही है,यदि किसी व्यक्ति या परिवार को सामाजिक रूप से प्रताडि़त करने,सरकारी योजना का लाभ लेने से रोकने या जातिगत दबाव बनाने की शिकायत मिलती है,तो प्रशासनिक हस्तक्षेप की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता,विशेष रूप से इसलिए क्योंकि मामला सामाजिक बहिष्कार और अंतरजातीय विवाह जैसी संवेदनशील विषयवस्तु से जुड़ा हुआ है।
चुनाव नहीं, फिर भी कुर्सी कायम!
साहू समाज के भीतर पिछले कई महीनों से जिला अध्यक्ष पद को लेकर विवाद बना हुआ है, समाज के कई वरिष्ठ लोगों और युवाओं का आरोप है कि जिला अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी समय पर चुनाव नहीं कराए गए, प्रदेश स्तर से कई बार चुनाव कराने के निर्देश दिए गए, बैठकें बुलाई गईं, लेकिन हर बार किसी न किसी कारण से मामला टलता गया, समाज के भीतर अब व्यंग्य में यह कहा जाने लगा है कि जिला अध्यक्ष पद एटीकेटी व्यवस्था में चल रहा है, यानी कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद पद पर बने रहने की परंपरा बन गई है, आरोप यह भी है कि वर्तमान विवादित नेतृत्व ने प्रदेश अध्यक्ष द्वारा जारी निर्देशों को भी गंभीरता से नहीं लिया, प्रदेश संगठन की ओर से जब चुनाव कराने और नई कार्यकारिणी गठित करने की पहल की गई, तब भी स्थानीय स्तर पर उसे प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया, यहीं से समाज के भीतर दो धड़े स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे।
अपने आप को मान लिया अध्यक्ष
समाज के कई लोगों का कहना है कि जिला स्तर पर संगठनात्मक स्थिति इतनी अस्पष्ट हो चुकी है कि अब अलग-अलग गुट स्वयं को अधिकृत मानकर कार्य कर रहे हैं, एक पक्ष खुद को वैध नेतृत्व बताता है, जबकि दूसरा पक्ष प्रदेश संगठन के आदेशों और चुनाव प्रक्रिया की मांग कर रहा है, आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि कुछ लोग बिना वैधानिक प्रक्रिया के स्वयं को अध्यक्ष घोषित कर बैठकों का आयोजन कर रहे हैं और समाज के नाम पर फैसले लेने की कोशिश कर रहे हैं, यही कारण है कि अब समाज के भीतर यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि यदि संगठनात्मक स्थिति ही स्पष्ट नहीं है, तो किसी सामाजिक दंड या बहिष्कार संबंधी निर्णय की वैधता कैसे तय होगी?
अधिवक्ता मधुसूदन साहू के पत्र ने बढ़ाया विवाद
मामले में नया मोड़ तब आया जब अधिवक्ता मधुसूदन साहू द्वारा प्रदेश अध्यक्ष को पत्र लिखकर जिला अध्यक्ष पद की वैधता, चुनाव प्रक्रिया और समाज में चल रही गतिविधियों पर सवाल खड़े किए गए, सूत्रों के अनुसार, पत्र में यह उल्लेख किया गया कि जब जिला अध्यक्ष पद पर वैधानिक रूप से निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं है, तब समाज के नाम पर लिए जा रहे फैसले विवादित माने जाएंगे, पत्र में यह भी सवाल उठाया गया कि आखिर प्रदेश संगठन के निर्देशों का पालन क्यों नहीं हो रहा और चुनाव प्रक्रिया को बार-बार क्यों टाला जा रहा है? बताया जा रहा है कि इसी पत्र के बाद समाज के भीतर हलचल तेज हुई और एक सामाजिक बैठक आयोजित कर कुछ लोगों के खिलाफ बहिष्कार जैसी कार्रवाई पर चर्चा की गई।
ग्राम सरई की बैठक बनी विवाद का केंद्र
17 मई 2026 को ग्राम सरई में आयोजित एक बैठक अब पूरे विवाद का केंद्र बन गई है, बैठक का विवरण एक रजिस्टर में दर्ज किया गया, जिसमें कई लोगों के हस्ताक्षर भी मौजूद बताए जा रहे हैं, रजिस्टर में कथित रूप से उल्लेख किया गया कि कुछ लोगों द्वारा सामूहिक विवाह अथवा अंतरजातीय विवाह योजना से जुड़ी गतिविधियों को लेकर समाज नाराज है और ऐसे लोगों के खिलाफ सामाजिक बहिष्कार जैसी कार्रवाई की जाएगी, यहीं से विवाद और गहरा गया, अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या कोई भी सामाजिक समूह संविधान और कानून से ऊपर जाकर किसी व्यक्ति को सामाजिक रूप से अलग-थलग करने का निर्णय ले सकता है? और उससे भी बड़ा सवाल क्या बिना वैध जिला अध्यक्ष और विधिवत अधिकृत कार्यकारिणी के ऐसा प्रस्ताव कानूनी रूप से टिक सकता है?
बिना अध्यक्ष के हस्ताक्षर बहिष्कार मान्य नहीं…
समाज के कई वरिष्ठ लोगों का कहना है कि किसी भी सामाजिक निर्णय की वैधता के लिए अधिकृत अध्यक्ष और विधिवत गठित कार्यकारिणी का होना जरूरी है, यदि जिला अध्यक्ष पद ही विवादित हो, चुनाव न हुए हों और प्रदेश संगठन उस पद को लेकर स्पष्ट स्थिति में न हो, तो किसी बैठक में पारित प्रस्ताव की कानूनी स्थिति स्वतः कमजोर हो जाती है, कई समाजजनों का कहना है कि संबंधित रजिस्टर में वैधानिक अध्यक्ष के अधिकृत हस्ताक्षर तक स्पष्ट नहीं हैं। ऐसे में बहिष्कार संबंधी निर्णय को सामाजिक या कानूनी मान्यता मिलना कठिन माना जा रहा है, कुछ लोगों ने तो यहां तक सवाल उठा दिए कि जब स्वयं समाज का बड़ा वर्ग प्रदेश अध्यक्ष के निर्देशों को नहीं मान रहा, तब आम समाजजन किसी बहिष्कार प्रस्ताव को क्यों और किस आधार पर मानेंगे?
मामला केवल समाज का नहीं, कानून का भी, अंतरजातीय विवाह योजना से जुड़ा है पूरा विवाद
इस पूरे मामले को गंभीर इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि इसका संबंध राज्य सरकार की छत्तीसगढ़ अस्पृश्यता निवारणार्थ अंतर्जातीय विवाह प्रोत्साहन योजना नियम 1978 (संशोधित 2019) से भी जोड़ा जा रहा है, इस योजना का उद्देश्य समाज में जातिगत भेदभाव को कम करना और अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करना है, योजना के तहत पात्र दंपतियों को ?2.50 लाख से ?3 लाख तक की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है, सरकार का स्पष्ट उद्देश्य यह है कि समाज में समानता बढ़े, जातिगत भेदभाव समाप्त हो और सामाजिक समरसता मजबूत हो, ऐसे में यदि किसी दंपति को इस योजना का लाभ लेने पर सामाजिक दबाव, धमकी या बहिष्कार का सामना करना पड़े, तो मामला केवल सामाजिक विवाद नहीं रह जाता, बल्कि संवैधानिक अधिकारों और कानूनी संरक्षण से जुड़ा विषय बन जाता है।


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