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बैकुंठपुर/कोरिया@कोरिया कलेक्टे्रट का ‘अमर स्टेनो’ मॉडल

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  • विभाग दूसरा,कुर्सी दूसरी…लेकिन प्रभाव ऐसा कि सिस्टम भी हुआ नतमस्तक?
  • मत्स्य निगम का कर्मचारी,राजस्व विभाग की सबसे प्रभावशाली कुर्सी! दो दशक की प्रतिनियुक्ति पर उठे सवाल
  • छः महीने में पदोन्नति,दो दशक की प्रतिनियुक्ति…आखिर किस संरक्षण में चलता रहा यह सिस्टम?
  • कलेक्ट्रेट में स्थायी प्रतिनियुक्ति का खेल? अर्ध शासकीय कर्मचारी के हाथों में संवेदनशील फाइलों पर बहस तेज
  • फाइलें,शिकायतें और प्रभाव का नेटवर्क! कोरिया कलेक्ट्रेट के चर्चित स्टेनो पर नए खुलासे
  • राजस्व विभाग नहीं,फिर भी कलेक्ट्रेट की सबसे ताकतवर कुर्सी! आखिर कैसे बना यह प्रभावशाली तंत्र?
  • स्टेनो की कुर्सी या समानांतर सत्ता? बदलते रहे कलेक्टर,लेकिन नहीं बदला प्रभाव
  • अर्ध शासकीय कर्मचारी के हाथों में कलेक्ट्रेट की गोपनीय फाइलें! प्रशासनिक सुरक्षा पर बड़े सवाल
  • प्रतिनियुक्ति या स्थायी कब्जा? दो दशक से जमे स्टेनो पर उठी जांच की मांग…
  • कोरिया कलेक्ट्रेट में फाइलों का खेल? शिकायतें हुईं,जांच बैठी… लेकिन कार्रवाई अब तक गायब!

-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया,18 मई 2026 (घटती-घटना)। सरकारी दफ्तरों में अक्सर कहा जाता है कि कर्मचारी आते-जाते रहते हैं,लेकिन व्यवस्था चलती रहती है, लेकिन कोरिया कलेक्ट्रेट में हालात कुछ अलग बताए जाते हैं, यहां वर्षों से पदस्थ एक प्रभावशाली स्टेनो को लेकर अब ऐसी चर्चाएं सामने आ रही हैं,जिन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था, प्रतिनियुक्ति प्रणाली, विभागीय जवाबदेही और कार्यालयीन पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, मामला केवल एक कर्मचारी के लंबे समय तक एक कार्यालय में पदस्थ रहने का नहीं है, सवाल यह भी है कि आखिर एक अर्ध शासकीय कर्मचारी,जो मूल रूप से राजस्व विभाग का नहीं बल्कि मत्स्य निगम विभाग का बताया जा रहा है,वह दो दशक से अधिक समय तक कलेक्ट्रेट जैसे अत्यंत संवेदनशील कार्यालय में कैसे बना रहा? और उससे भी बड़ा सवाल—यदि किसी दिन कोई महत्वपूर्ण फाइल गायब हो जाए,कोई संवेदनशील दस्तावेज लापता हो जाए या कोई प्रशासनिक गड़बड़ी सामने आए,तो जिम्मेदारी आखिर तय किसकी होगी? अब जब दस्तावेजों, पदोन्नति,प्रतिनियुक्ति,सर्विस बुक, शिकायतों और दबाई गई जांचों को लेकर चर्चाएं तेज हो चुकी हैं, तब कोरिया कलेक्ट्रेट का यह मामला केवल स्थानीय चर्चा नहीं बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर परीक्षा बनता जा रहा है।
राजस्व विभाग नहीं, मत्स्य निगम विभाग के कर्मचारी!
पूरे मामले का सबसे गंभीर पक्ष यही माना जा रहा है कि संबंधित स्टेनो मूल रूप से राजस्व विभाग के कर्मचारी ही नहीं बताए जा रहे, सूत्रों के अनुसार वे मत्स्य निगम विभाग से जुड़े अर्ध शासकीय कर्मचारी हैं,अब यहां सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि कलेक्ट्रेट जैसा संवेदनशील कार्यालय, जहां भूमि रिकॉर्ड,राजस्व प्रकरण, गोपनीय फाइलें,प्रशासनिक आदेश और महत्वपूर्ण दस्तावेज रहते हैं,वहां अपने विभाग के नियमित कर्मचारी के बजाय दूसरे विभाग के अर्ध शासकीय कर्मचारी को इतने वर्षों तक बनाए रखना क्या प्रशासनिक सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न नहीं है? प्रशासनिक हलकों में अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि यदि किसी दिन कोई फाइल गायब हो जाए, कोई आदेश लीक हो जाए या कोई रिकॉर्ड प्रभावित हो जाए,तो उसकी जवाबदेही किसकी तय होगी? क्योंकि नियमों के अनुसार यदि कर्मचारी मूल विभाग का ही नहीं है, तो कार्रवाई की प्रक्रिया भी जटिल हो जाती है, यानी जिम्मेदारी की स्थिति में मामला यह हमारा कर्मचारी नहीं और यह वहां प्रतिनियुक्ति पर था जैसे जवाबों के बीच फंस सकता है।
छः महीने में पदोन्नति… सरकारी सिस्टम का चमत्कार या फाइलों का खेल?
प्राप्त दस्तावेजों और सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार संबंधित कर्मचारी घनश्याम मिश्रा की नियुक्ति 7 अप्रैल 1986 को स्टेनो टाइपिस्ट पद पर हुई थी, लेकिन सबसे अधिक हैरानी की बात यह बताई जा रही है कि महज कुछ ही महीनों बाद 27 अप्रैल 1986 को उन्हें स्टेनोग्राफर बना दिया गया, अब सरकारी कर्मचारी खुद पूछ रहे हैं कि जहां सामान्य कर्मचारी वर्षों तक पदोन्नति सूची में अपना नाम ढूंढते रह जाते हैं, वहां आखिर ऐसा कौन-सा प्रशासनिक चमत्कार हुआ कि कुछ महीनों में ही पद बदल गया? व्यंग्य में कर्मचारी कहते सुने जा रहे हैं कि यदि सरकारी सेवा में इतनी तेज पदोन्नति संभव है,तो प्रतियोगी परीक्षाओं और वरिष्ठता सूची की जरूरत ही क्या है? यही नहीं,दस्तावेजों में नाम को लेकर भी चर्चा है,नियुक्ति रिकॉर्ड में घनश्याम मिश्रा नाम बताया जा रहा है, जबकि कुछ पदोन्नति संबंधी दस्तावेजों में जेपी मिश्रा नाम सामने आने की बात कही जा रही है,अब सवाल यह है कि यह केवल रिकॉर्ड की तकनीकी शैली है या फिर सरकारी दस्तावेजों का वही पुराना खेल, जहां नाम, पद और नियम परिस्थितियों के अनुसार आकार बदल लेते हैं।
क्या अर्ध शासकीय कर्मचारियों के हाथों में महत्वपूर्ण फाइलों का ट्रांजैक्शन सुरक्षित है?
कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील कार्यालय में हर दिन सैकड़ों महत्वपूर्ण फाइलों का आवागमन होता है,इनमें राजस्व प्रकरण,भूमि विवाद, प्रशासनिक आदेश,गोपनीय पत्राचार, नियुक्तियां,विभागीय जांच, शिकायतें और शासन स्तर से आने वाले संवेदनशील दस्तावेज शामिल रहते हैं,ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या इस प्रकार की महत्वपूर्ण फाइलों और गोपनीय दस्तावेजों का संचालन किसी अर्ध शासकीय कर्मचारी के हाथों में होना प्रशासनिक दृष्टि से सुरक्षित और उचित माना जा सकता है? प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में कलेक्ट्रेट जैसे कार्यालयों में संवेदनशील शाखाओं में उन्हीं कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है जिनकी जवाबदेही सीधे संबंधित विभाग और शासन के अधीन स्पष्ट रूप से तय हो,क्योंकि यदि किसी दस्तावेज में गड़बड़ी हो,फाइल गायब हो जाए,आदेश लीक हो जाए या रिकॉर्ड प्रभावित हो जाए, तो जिम्मेदारी तय करना आसान होता है,लेकिन जब मामला किसी दूसरे विभाग से प्रतिनियुक्ति पर आए अर्ध शासकीय कर्मचारी का हो,तब जवाबदेही का प्रश्न और जटिल हो जाता है, यदि भविष्य में कोई गंभीर प्रशासनिक गड़बड़ी सामने आती है तो कार्रवाई कौन करेगा? राजस्व विभाग या मूल विभाग? और क्या विभागीय नियमों के तहत उतनी ही सख्ती से जवाबदेही तय हो पाएगी जितनी एक नियमित शासकीय कर्मचारी की स्थिति में संभव होती है? सूत्रों के अनुसार यही कारण है कि अब कलेक्ट्रेट की कार्यप्रणाली को लेकर कई कर्मचारी और प्रशासनिक जानकार सवाल उठा रहे हैं,उनका कहना है कि महत्वपूर्ण कार्यालयों में फाइलों का ट्रांजैक्शन केवल अनुभव का नहीं बल्कि सुरक्षा,गोपनीयता और प्रशासनिक विश्वसनीयता का विषय भी होता है,कर्मचारियों के बीच यह चर्चा भी है कि यदि वर्षों तक एक ही व्यक्ति के हाथों से अधिकांश महत्वपूर्ण फाइलें गुजरती रहें,तो स्वाभाविक रूप से एक अनौपचारिक नियंत्रण की स्थिति बन जाती है,ऐसे में यह आशंका भी बढ़ जाती है कि कौन-सी फाइल कितनी तेजी से आगे बढ़ेगी,कौन-सी शिकायत लंबित रहेगी और कौन-सा मामला दब जाएगा,यह सब प्रभावित हो सकता है, यही वजह है कि अब यह बहस केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं रह गई है,बल्कि प्रशासनिक सुरक्षा व्यवस्था और कलेक्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण कार्यालयों की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल बन चुकी है।
कमिश्नर स्तर की जांच भी गायब?
सूत्रों के अनुसार सरगुजा कमिश्नर शिखा राजपूत द्वारा एक जांच टीम गठित की गई थी, बताया जाता है कि एक प्रशिक्षु डिप्टी कलेक्टर को इस जांच का दायित्व भी सौंपा गया था, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह जांच आखिर कहां पहुंची? क्या रिपोर्ट तैयार हुई? क्या किसी अधिकारी को सौंपी गई? क्या कार्रवाई प्रस्तावित हुई? या फिर वह जांच भी सरकारी फाइलों की भीड़ में खो गई? प्रशासनिक हलकों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि कई बार जांचें शुरू तो बड़े शोर के साथ होती हैं, लेकिन बाद में उनका पता तक नहीं चलता।
पत्नी के नाम निजी स्कूल और सांसद निधि पर भी सवाल
मामले में नया मोड़ तब आया जब परिवार से जुड़े निजी स्कूल को लेकर भी चर्चाएं शुरू हुईं, स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि परिवार द्वारा संचालित निजी स्कूल को सांसद निधि से अनुदान मिला,अब जानकार सवाल उठा रहे हैं कि क्या निजी स्कूलों को इस प्रकार की सहायता नियमानुसार दी जा सकती है? यदि दी गई,तो किस प्रक्रिया के तहत? किस आधार पर पात्रता तय हुई? और क्या अन्य निजी स्कूलों को भी समान अवसर मिला? यही कारण है कि अब शिक्षा विभाग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
नई कलेक्टर के सामने सबसे बड़ी चुनौती
अब जिले में नई प्रशासनिक व्यवस्था बनने के बाद सबसे अधिक निगाहें इसी बात पर टिकी हैं कि क्या वर्षों से चली आ रही इस स्थायी प्रतिनियुक्ति व्यवस्था की समीक्षा होगी,क्या सेवा रिकॉर्ड की जांच होगी? क्या प्रतिनियुक्ति समाप्त होगी? क्या शिकायतों की फाइलें फिर से खुलेंगी? क्या विभागीय जवाबदेही तय होगी? कर्मचारियों का कहना है कि कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील कार्यालय में पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए,लेकिन दूसरी ओर यह भी माना जा रहा है कि वर्षों में मजबूत हो चुके नेटवर्क को तोड़ना आसान नहीं होगा।
सबसे बड़ा सवाल—आखिर सिस्टम चला कौन रहा है?
पूरे मामले के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या प्रशासनिक व्यवस्था नियमों से चल रही है या फिर वर्षों से बने प्रभावशाली नेटवर्क से? क्या कमिश्नर सरगुजा इस पूरे मामले में गंभीर संज्ञान लेंगी? क्या प्रतिनियुक्ति व्यवस्था की समीक्षा होगी? क्या विभागीय रिकॉर्ड और पदोन्नति की जांच होगी? क्या शिकायतों और गायब फाइलों का सच सामने आएगा? या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों की धूल में दबकर रह जाएगा? फिलहाल कोरिया कलेक्ट्रेट में चर्चा सिर्फ एक कर्मचारी की नहीं, बल्कि उस स्थायी सिस्टम की है, जो शायद सरकारी नियमों से ज्यादा मजबूत साबित हो चुका है।
सर्विस बुक आखिर है कहां?
मामले में एक और बड़ा सवाल सर्विस पुस्तिका यानी सर्विस बुक को लेकर खड़ा हो गया है, आखिर संबंधित कर्मचारी की मूल सर्विस बुक कहां है? राजस्व विभाग में? मत्स्य निगम विभाग में? या फिर फाइलों के उसी जंगल में, जहां कई शिकायतें रास्ता भटक चुकी हैं? सूत्र बताते हैं कि सूचना के अधिकार के तहत कई बार जानकारी मांगी गई, लेकिन जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई, आरोप यह भी है कि जिन टेबलों पर सूचना से संबंधित फाइलें आती थीं, उन्हीं टेबलों पर संबंधित कर्मचारी स्वयं बैठे रहते थे, अब लोग सवाल पूछ रहे हैं कि यदि किसी कर्मचारी से जुड़े मूल दस्तावेज और सेवा रिकॉर्ड तक स्पष्ट नहीं हैं, तो फिर इतने वर्षों तक उनकी पदस्थापना कैसे बनी रही?
शिकायतें हुईं…लेकिन कार्रवाई फाइलों में ही दफन?
प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा भी वर्षों से बनी हुई है कि संबंधित स्टेनो के खिलाफ कई शिकायतें हुईं, सूत्रों के अनुसार शिकायतें एसीबी तक पहुंचीं, उच्च स्तर तक गईं,लेकिन किसी बड़ी कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई,अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर शिकायतों का हुआ क्या? क्या जांच शुरू हुई लेकिन पूरी नहीं हुई? क्या फाइलें आगे बढ़ीं ही नहीं? या फिर सरकारी कार्यालयों की पुरानी परंपरा के अनुसार विचाराधीन होकर किसी अलमारी में आराम कर रही हैं? कर्मचारियों के बीच अब यह व्यंग्य भी सुनाई देता है कि कुछ शिकायतें इतनी संवेदनशील होती हैं कि वे सीधे कार्रवाई तक नहीं पहुंचतीं, पहले धूल की कई परतों से गुजरती हैं।
कलेक्टर बदलते रहे…लेकिन प्रभाव नहीं बदला
सूत्र बताते हैं कि वर्षों में कई कलेक्टर आए और गए, लेकिन संबंधित स्टेनो का प्रभाव लगातार बना रहा, कई कर्मचारियों का आरोप है कि हर नए अधिकारी से करीबी बनाकर उन्होंने खुद को हमेशा सुरक्षित बनाए रखा, धीरे-धीरे स्थिति ऐसी बन गई कि फाइलों की गति, शिकायतों की दिशा और अधिकारियों तक पहुंचने वाली जानकारी को लेकर भी चर्चाएं होने लगीं, कुछ कर्मचारी तो यहां तक कहते हैं कि कलेक्ट्रेट में कौन-सी फाइल कितनी तेज चलेगी, इसका निर्णय नियमों से पहले व्यवस्था तय करती थी, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन चर्चाएं इतनी व्यापक हैं कि अब प्रशासनिक संतुलन पर भी सवाल उठने लगे हैं।


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