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कोरिया @ ‘सरकारी पैसा है…’ जिसे महंगे उपकरणों की खरीदी पर उठे सवाल

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  • विभागीय खर्च पर फिर घिरा तंत्र?
  • कोरिया शिक्षा विभाग का 1.80 करोड़ प्रोजेक्ट सवालों में,भ्रष्टाचार के आरोप पर जांच की मांग
  • बाहरी कंपनी को करोड़ों का ठेका,स्थानीय विक्रेताओं की अनदेखी—कलेक्टर से शिकायत
  • स्कूल ‘रूम मेकओवर’ प्रोजेक्ट में अनियमितता का आरोप,भुगतान रोकने की मांग
  • टेंडर प्रक्रिया पर उठे सवाल,महंगे सौदों से सरकारी धन के दुरुपयोग का आरोप
  • शिक्षा विभाग में ‘मिलीभगत’ के संकेत,करोड़ों के प्रोजेक्ट की जांच की मांग तेज
  • बाजार से 200-300′ ज्यादा दरों पर खरीदी का आरोप
  • 1.80 करोड़ के प्रोजेक्ट में पारदर्शिता पर उठे सवाल


-राजन पाण्डेय-
कोरिया,28 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)।
सरकारी खर्चों को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही पर अक्सर बहस होती रही है, लेकिन हालिया खरीदी ने इस मुद्दे को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है, विभाग द्वारा कार्यालय उपयोग के नाम पर ऐसे उपकरण खरीदे गए हैं, जिनकी कीमत बाजार दर से काफी अधिक बताई जा रही है, आमतौर पर जिन वाई-फाई राउटर और प्रोजेक्टर को लोग अपने घरों या निजी संस्थानों के लिए कम कीमत में खरीद रहे हैं, वही उपकरण सरकारी दफ्तरों में कई गुना महंगे दाम पर खरीदे जाने की जानकारी सामने आई है,इस पूरे मामले ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी धन के उपयोग में वास्तव में सावधानी बरती जा रही है या ‘सरकारी पैसा है’ की सोच के कारण अनावश्यक खर्च को नजरअंदाज किया जा रहा है। बता दे की जिला कोरिया के स्कूल शिक्षा विभाग में करोड़ों रुपये के एक प्रोजेक्ट को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं, कलेक्टर को सौंपे गए एक विस्तृत शिकायत पत्र में न केवल प्रक्रियागत अनियमितताओं,बल्कि संभावित भ्रष्टाचार और मिलीभगत तक के आरोप लगाए गए हैं, शिकायतकर्ता ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, भुगतान पर तत्काल रोक और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है।
क्या है पूरा मामला
जानकारी के अनुसार संबंधित विभाग द्वारा हाल ही में कुछ तकनीकी उपकरणों की खरीदी की गई है, जिसमें वाई-फाई राउटर और प्रोजेक्टर प्रमुख हैं, इन उपकरणों की खरीदी को लेकर जो आंकड़े सामने आए हैं, वे सामान्य बाजार दरों से मेल नहीं खाते, बताया जा रहा है कि एक वाई-फाई राउटर की कीमत लगभग 18,500 रुपये दिखाई गई है, जबकि बाजार में इसी श्रेणी के राउटर आमतौर पर 4,000 से 5,000 रुपये के बीच आसानी से उपलब्ध हैं, इसी तरह एक प्रोजेक्टर की खरीदी करीब 90,000 रुपये में की गई है, जबकि वर्तमान समय में अच्छी गुणवत्ता वाले प्रोजेक्टर 40,000 से 45,000 रुपये के बीच उपलब्ध हो जाते हैं।
1.80 करोड़ का प्रोजेक्ट बना विवाद की जड़
शिकायत के अनुसार जिला शिक्षा कार्यालय कोरिया द्वारा ‘शिल्पमिस टेक्नोलॉजीज़ प्राइवेट लिमिटेड’ सूरत (गुजरात) को लगभग 1,80,84,535 का प्रोजेक्ट सौंपा गया है, यह प्रोजेक्ट स्कूलों में ‘क्रशशद्व रूड्डद्मद्गश1द्गह्म् ‘,डिजिटल उपकरणों की आपूर्ति और अन्य तकनीकी कार्यों से जुड़ा बताया गया है, शिकायतकर्ता का आरोप है कि इतनी बड़ी राशि का काम देने में पारदर्शिता नहीं बरती गई और नियमों को दरकिनार किया गया।
बाहरी कंपनी को लाभ,स्थानीय व्यापारियों की अनदेखी
शिकायत पत्र में सबसे बड़ा मुद्दा यह उठाया गया है कि छत्तीसगढ़ के स्थानीय अनुभवी विक्रेताओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर एक बाहरी कंपनी को काम दे दिया गया, आरोप है कि स्थानीय व्यापारियों को मौका नहीं दिया गया, बाहरी कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाया गया, इससे स्थानीय रोजगार और आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक असर पड़ेगा, साथ ही यह भी कहा गया है कि भविष्य में सर्विस और मेंटेनेंस के लिए बाहरी कंपनी पर निर्भरता बढ़ेगी, जिससे अतिरिक्त खर्च और परेशानी हो सकती है।
बिना स्पष्ट सूची के स्वीकृत हुआ काम
शिकायत में यह भी उल्लेख है कि जिन स्कूलों में ‘रूम मेकओवर’ किया जाना है, उनकी स्पष्ट सूची तक उपलब्ध नहीं है,इसके बावजूद लगभग 23 लाख के कार्य का प्रावधान कर दिया गया, जिसे नियमों के विपरीत और जल्दबाजी में लिया गया निर्णय बताया गया है।
बाजार दर से कई गुना अधिक कीमतें
प्रोजेक्ट में शामिल सामग्रियों की कीमतों को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं,शिकायत के अनुसार WiFi Router की कीमत लगभग 18,500 दिखाई गई,Projector की कीमत लगभग 90,000 बताई गई, जो कि सामान्य बाजार दर से 200 से 300 प्रतिशत अधिक बताई जा रही है। इसे सीधे तौर पर सरकारी धन के दुरुपयोग से जोड़ा जा रहा है।
‘हैदराबाद मीटअप’ खर्च पर भी विवाद
शिकायत में ‘हैदराबाद मीटअप’ के नाम पर किए गए खर्च को भी संदिग्ध बताया गया है, बताया गया है कि 10 शिक्षकों के लिए 1.01 लाख प्रति व्यक्ति का प्रावधान किया गया,जिसे अत्यधिक और अनावश्यक खर्च करार दिया गया है,शिकायतकर्ता का कहना है कि इस तरह के खर्च सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ हैं।
मिलीभगत के संकेत,जांच की मांग तेज
शिकायत में विभाग और संबंधित कंपनी के बीच संभावित मिलीभगत की भी आशंका जताई गई है, इसी आधार पर कलेक्टर से मांग की गई है कि पूरे प्रोजेक्ट का भौतिक सत्यापन कराया जाए,कंपनी को किए जा रहे सभी भुगतानों पर तत्काल रोक लगाई जाए,टेंडर प्रक्रिया और दर निर्धारण की निष्पक्ष जांच हो,दोषी पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए।
उच्च स्तर पर भेजी गई शिकायत
मामले की गंभीरता को देखते हुए शिकायत की प्रतिलिपि मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ शासन,शिक्षा मंत्री,एंटी करप्शन ब्यूरो, स्थानीय विधायक,प्रमुख सचिव, स्कूल शिक्षा विभाग को भी भेजी गई है,ताकि उच्च स्तर पर निगरानी और कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।
प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती
इस पूरे मामले ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं,यदि आरोप सही पाए जाते हैं,तो यह न केवल आर्थिक अनियमितता का मामला होगा,बल्कि सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी गंभीर असर डालेगा।
बाजार दर और विभागीय खरीदी में बड़ा अंतर
स्थानीय बाजार और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कीमतों की तुलना करने पर यह अंतर और स्पष्ट हो जाता है,तकनीकी जानकारों का कहना है कि सामान्य कार्यालय उपयोग के लिए जिस प्रकार के उपकरणों की आवश्यकता होती है,वे मध्यम श्रेणी में ही आसानी से उपलब्ध होते हैं,ऐसे में दोगुनी या उससे अधिक कीमत पर खरीदी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है,विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि कोई विशेष उच्च गुणवत्ता या विशेष फीचर्स वाला उपकरण खरीदा गया हो,तो उसकी तकनीकी जानकारी और औचित्य सार्वजनिक किया जाना चाहिए,ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
अपने घर के लिए खरीदते तो ‘—उठ रहा बड़ा सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि यदि यही उपकरण संबंधित अधिकारी अपने निजी उपयोग के लिए खरीदते, तो क्या वे इतनी अधिक कीमत पर इन्हें खरीदते? सामान्य तौर पर देखा जाता है कि निजी उपयोग के लिए लोग बाजार में उपलब्ध विकल्पों की तुलना करते हैं और कम कीमत में बेहतर गुणवत्ता का सामान खरीदने का प्रयास करते हैं, लेकिन जब बात सरकारी खरीद की आती है, तो कई बार यही सावधानी नहीं बरती जाती, स्थानीय लोगों का कहना है कि ‘यदि यह खरीदी निजी पैसों से होती, तो निश्चित रूप से इतनी महंगी नहीं होती।
नियम और प्रक्रिया क्या कहते हैं…
सरकारी विभागों में किसी भी प्रकार की खरीदी के लिए निर्धारित नियम और प्रक्रियाएं होती हैं, इसमें निविदा (टेंडर) प्रक्रिया, दरों की तुलना,गुणवत्ता परीक्षण और स्वीकृति जैसे कई चरण शामिल होते हैं,इन प्रक्रियाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि सरकारी धन का उपयोग पारदर्शी और उचित तरीके से किया जाए, हालांकि,जब इस प्रकार की महंगी खरीदी के मामले सामने आते हैं,तो यह सवाल उठता है कि क्या इन सभी प्रक्रियाओं का सही तरीके से पालन किया गया था या नहीं,सूत्रों के अनुसार,इस खरीदी में टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर भी चर्चा हो रही है,यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि कितनी कंपनियों ने इसमें भाग लिया और किन मानकों के आधार पर चयन किया गया, यदि प्रतिस्पर्धी दरों की तुलना की गई होती,तो संभवतः कम कीमत में भी वही उपकरण खरीदे जा सकते थे,विशेषज्ञों का मानना है कि ई-प्रोक्योरमेंट और जेम जैसे प्लेटफॉर्म के माध्यम से खरीदी करने पर दरों में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा बनी रहती है।
गुणवत्ता बनाम कीमत—क्या था आधार
विभागीय स्तर पर अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि उच्च गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए अधिक कीमत वाले उपकरण खरीदे जाते हैं, लेकिन इस मामले में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि खरीदे गए उपकरणों में ऐसा कौन-सा विशेष फीचर या तकनीकी क्षमता है, जो उन्हें सामान्य बाजार उत्पादों से अलग बनाती है, यदि कीमत अधिक है, तो उसके पीछे ठोस तकनीकी कारण होना चाहिए, अन्यथा इसे अनावश्यक खर्च माना जा सकता है।
जनता के बीच बढ़ती नाराजगी
इस मामले के सामने आने के बाद आम लोगों में नाराजगी देखी जा रही है, लोगों का कहना है कि एक तरफ जहां आम नागरिकों को अपने खर्चों में कटौती करनी पड़ती है, वहीं सरकारी स्तर पर इस तरह के खर्च जनता के पैसे का दुरुपयोग प्रतीत होते हैं,कई लोगों ने यह भी कहा कि सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों के लिए धन की कमी की बात कही जाती है,लेकिन दूसरी ओर इस तरह की महंगी खरीदी समझ से परे है।
पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग…
इस पूरे मामले में अब पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग तेज हो गई है, स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि इस खरीदी की जांच होनी चाहिए और यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि खरीदी किस प्रक्रिया के तहत की गई,दरों का निर्धारण कैसे हुआ, क्या बाजार दरों की तुलना की गई थी और क्या इसमें किसी प्रकार की अनियमितता हुई है?
विभाग की चुप्पी या जवाब का इंतजार
फिलहाल इस मामले में संबंधित विभाग की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है,हालांकि,सूत्रों का कहना है कि विभाग इस मामले की आंतरिक समीक्षा कर सकता है,यदि विभाग की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया जाता है,तो इससे स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
विशेषज्ञों की राय
वित्तीय और प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी खरीदी में पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण पहलू है, उनका मानना है कि सभी खरीदी प्रक्रियाओं को सार्वजनिक किया जाना चाहिए,ई-टेंडरिंग को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए और हर बड़ी खरीदी का ऑडिट होना चाहिए,इससे न केवल अनियमितताओं पर रोक लगेगी,बल्कि जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।
क्या हो सकती है आगे की कार्रवाई…
यदि इस मामले में अनियमितता पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है, इसमें विभागीय जांच, अनुशासनात्मक कार्रवाई या अन्य कानूनी कदम शामिल हो सकते हैं, इसके अलावा, भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए सख्त दिशा-निर्देश भी जारी किए जा सकते हैं।
सवाल सिर्फ कीमत का नहीं,व्यवस्था का है…
यह मामला केवल महंगे उपकरणों की खरीदी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही का बड़ा प्रश्न बनकर सामने आया है, जब बाजार में उपलब्ध समान उपकरण कम कीमत में मिल रहे हैं, तो अधिक कीमत पर खरीदी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है, अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विभाग इस मामले में क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या वास्तव में इस पर कोई ठोस कार्रवाई होती है या नहीं, फिलहाल इतना जरूर है कि इस मुद्दे ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि ‘सरकारी पैसा’ आखिर किस हद तक जिम्मेदारी के साथ खर्च किया जा रहा है।
जांच से ही खुलेगा सच…
क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी?
क्या जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी?
या फिर मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?


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