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कोरिया@ नाम बड़ा,भीड़ तैयार…पर टिकट का इंतजार

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  • रनई के ‘टाइगर’ योगेश शुक्ला की अधूरी राजनीतिक कहानी
  • जमींदारी से जननेता तक का सफर,62वें जन्मदिन पर शक्ति प्रदर्शन-पर अब भी ‘मौके’ की तलाश जारी
  • भीड़ साथ,पहचान मजबूत…पर टिकट अब भी दूर…रनई के टाइगर का इंतजार
  • 62वें जन्मदिन पर शक्ति प्रदर्शन,पर ‘मौके’ की फाइल अब भी लंबित
  • नाम,काम और जनसमर्थन सब मौजूद—फिर भी क्यों नहीं मिला मौका?
  • रनई के जमींदार से ‘टाइगर’ तक,पर राजनीति में मौका अधूरा
  • भीड़ की दहाड़,पर टिकट पर सन्नाटा योगेश शुक्ला की कहानी
  • जन्मदिन बना शक्ति प्रदर्शन,संदेश साफ—अब बारी पार्टी की
  • राजनीति में पहचान पूरी, पर किस्मत आधी—मौके का इंतजार जारी
  • दहाड़ तो गूंज रही है,पर टिकट की सीटी अब तक नहीं बजी
  • समर्थन हजारों का, मौका शून्य—टाइगर की राजनीति का सच ‘
  • भीड़ दिखी, ताकत दिखी…अब क्या बदलेगा पार्टी का रुख?


-रवि सिंह-
कोरिया,24 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)।
राजनीति में अक्सर यह कहा जाता है कि यहां पहचान से ज्यादा मायने ‘मौके’ का होता है, कई लोग बिना खास पहचान के आगे निकल जाते हैं, तो कई ऐसे भी होते हैं जिनके पास नाम, काम और जनसमर्थन सब कुछ होता है, लेकिन फिर भी वे उस एक मौके के इंतजार में रह जाते हैं, कोरिया जिले के वरिष्ठ कांग्रेस नेता योगेश शुक्ला की कहानी भी कुछ ऐसी ही है जहां प्रसिद्धि की कोई कमी नहीं, भीड़ हर मंच पर साथ खड़ी है, लेकिन राजनीति का दरवाजा अब तक पूरी तरह नहीं खुल पाया है।
रनई : एक ऐसा गांव,जहां चुनाव नहीं,पहचान होती है…
योगेश शुक्ला का जन्म 24 अप्रैल 1964 को कोरिया जिले के ग्राम पंचायत रनई में हुआ, यह गांव अपने आप में एक अनोखी पहचान रखता है, आजादी के बाद से अब तक इस पंचायत में कभी चुनाव नहीं हुआ, यह तथ्य जितना चौंकाने वाला है, उतना ही इस गांव की सामाजिक संरचना को दर्शाता है, रनई गांव और योगेश शुक्ला—दोनों की पहचान एक-दूसरे से जुड़ी हुई है, उन्हें इस क्षेत्र में ‘रनई के जमींदार’ के रूप में भी जाना जाता है, यह जमींदारी सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव का भी प्रतीक है।
नौकरी छोड़ राजनीति की राह : एक जोखिम भरा फैसला
शुक्ला ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही पूरी की और आगे चलकर शिक्षक की नौकरी भी की, लेकिन उनका झुकाव शुरू से ही जनसेवा और सामाजिक कार्यों की ओर था, उन्होंने एक स्थिर सरकारी नौकरी को छोड़कर राजनीति का रास्ता चुना—जो किसी भी आम व्यक्ति के लिए आसान निर्णय नहीं होता, यह वह दौर था जब राजनीति में प्रवेश का मतलब सिर्फ सत्ता नहीं, बल्कि संघर्ष और अनिश्चितता भी था, शुक्ला ने कांग्रेस पार्टी का दामन थामा और इसी उम्मीद के साथ आगे बढ़ते रहे कि एक दिन उन्हें भी अवसर मिलेगा।
‘टाइगर’ की पहचान : आवाज जो भीड़ को बांध ले…
कोरिया जिले में योगेश शुक्ला को ‘टाइगर’ के नाम से जाना जाता है, यह नाम उन्हें उनके भाषणों और आक्रामक अंदाज के कारण मिला, जब भी वह किसी मंच पर बोलते हैं, उनकी आवाज और शैली लोगों का ध्यान खींच लेती है, उनकी दहाड़, उनके शब्द और उनका आत्मविश्वास—इन सबने मिलकर उनकी एक अलग छवि बनाई है, राजनीति में जहां कई नेता संतुलित भाषा का इस्तेमाल करते हैं, वहीं शुक्ला का अंदाज सीधे दिल और दिमाग पर असर डालता है।
प्रसिद्धि भरपूर,पर ‘मौका’ अधूरा
योगेश शुक्ला की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उनके पास पहचान और लोकप्रियता की कोई कमी नहीं है, लेकिन उन्हें वह बड़ा मंच नहीं मिला,जिसकी उन्हें उम्मीद थी,वर्षों से वह कांग्रेस पार्टी के प्रति समर्पित रहे हैं,हर कार्यक्रम में सक्रिय भूमिका निभाई है और संगठन के साथ मजबूती से खड़े रहे हैं,लेकिन टिकट की दौड़ में हर बार उनका नाम पीछे रह गया, राजनीति में यह एक आम लेकिन कड़वा सच है—जहां मेहनत और निष्ठा के साथ-साथ ‘समय और समीकरण’ भी अहम भूमिका निभाते हैं।
62वां जन्मदिन : भीड़ ने दिया संदेश
24 अप्रैल को बैकुंठपुर के मानस भवन में उनका 62वां जन्मदिन बड़े ही भव्य तरीके से मनाया गया, शुक्ला पेट्रोल पंप से लेकर मानस भवन तक गाडि़यों की लंबी कतारें यह बता रही थीं कि यह सिर्फ जन्मदिन नहीं, बल्कि एक शक्ति प्रदर्शन भी है,कार्यक्रम में हजारों लोगों की उपस्थिति रही, दूर-दूर से समर्थक पहुंचे, माला पहनाकर उनका स्वागत किया गया और पूरे कार्यक्रम में उत्साह का माहौल बना रहा, यह आयोजन इस बात का प्रमाण था कि शुक्ला की लोकप्रियता सिर्फ नाम तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन पर भी मजबूत है।
राजनीतिक दिग्गजों की मौजूदगी : संकेत साफ
इस आयोजन में कोरिया और अविभाजित कोरिया जिले के कई वरिष्ठ कांग्रेस नेता शामिल हुए, पूर्व विधायक गुलाब कमरो, पूर्व नगर पालिका उपाध्यक्ष कृष्ण मुरारी तिवारी और कांग्रेस एमसीबी अध्यक्ष अशोक श्रीवास्तव जैसे नेताओं की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को और महत्वपूर्ण बना दिया, युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं की भी बड़ी संख्या में भागीदारी रही, जो यह दर्शाती है कि शुक्ला की पकड़ नई पीढ़ी में भी मजबूत है।
सोशल मीडिया पर भी दिखी लोकप्रियता
जन्मदिन के मौके पर सोशल मीडिया पर भी बधाइयों का सिलसिला जारी रहा, कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा नेताओं और आम लोगों ने भी उन्हें शुभकामनाएं दीं, यह एक ऐसा दृश्य था, जहां राजनीतिक सीमाएं पीछे छूटती नजर आईं और व्यक्तिगत लोकप्रियता सामने आई।
शक्ति प्रदर्शन या दावेदारी का संदेश?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आयोजन सिर्फ जन्मदिन नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव के लिए एक स्पष्ट संदेश भी था, इतनी बड़ी संख्या में लोगों का जुटना, नेताओं की मौजूदगी और आयोजन का भव्य स्वरूप यह संकेत देता है कि शुक्ला अपनी दावेदारी को मजबूत करना चाहते हैं, यह एक तरह से पार्टी नेतृत्व को यह दिखाने का प्रयास भी है कि उनके पास जनसमर्थन की कमी नहीं है।
राजनीति का गणित : जहां समीकरण बनाते हैं भविष्य
राजनीति में सिर्फ लोकप्रियता ही काफी नहीं होती, यहां जातीय समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन, पार्टी रणनीति और कई अन्य कारक मिलकर निर्णय लेते हैं, संभव है कि इन्हीं कारणों से शुक्ला को अब तक मौका नहीं मिल पाया हो, लेकिन यह भी सच है कि लगातार सक्रियता और जनसमर्थन किसी भी नेता को नजरअंदाज करना आसान नहीं होता।
इंतजार की राजनीति : धैर्य की परीक्षा
योगेश शुक्ला का राजनीतिक सफर धैर्य का एक उदाहरण भी है, वर्षों से वह बिना किसी बड़े पद के पार्टी के लिए काम कर रहे हैं, उनका यह इंतजार सिर्फ टिकट का नहीं, बल्कि अपने संघर्ष की पहचान का भी है, राजनीति में जहां कई लोग अवसर न मिलने पर रास्ता बदल लेते हैं, वहीं शुक्ला अब भी उसी पार्टी के साथ खड़े हैं।
जनता की उम्मीदें…क्या इस बार बदलेगा फैसला?
उनके समर्थकों को उम्मीद है कि इस बार पार्टी नेतृत्व उनके योगदान और लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए उन्हें मौका देगा, 62वें जन्मदिन पर उमड़ी भीड़ ने यह संकेत दे दिया है कि अगर उन्हें मौका मिला, तो वह चुनावी मैदान में मजबूत दावेदार साबित हो सकते हैं।
कहानी अभी बाकी है…
योगेश शुक्ला की कहानी अभी अधूरी है, यह एक ऐसे नेता की कहानी है,जिसके पास पहचान है, समर्थन है,अनुभव है—लेकिन मौका अभी भी इंतजार में है,उनका 62 वां जन्मदिन एक संकेत जरूर है कि वह अब भी सक्रिय हैं और तैयार हैं,अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पार्टी इस बार उनके धैर्य और समर्पण को पहचानती है,या फिर यह कहानी आगे भी ‘प्रसिद्धि के साथ इंतजार’ के रूप में चलती रहेगी, फिलहाल, रनई का यह ‘टाइगर’ मैदान में है,दहाड़ भी रहा है बस इंतजार है उस सीटी का,जो उसे असली मुकाबले में उतारे।


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