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संपादकीय@ जब सत्ता की गाड़ी फंसी तब जागा सिस्टम

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जनता के लिए गड्ढे वर्षों तक नहीं दिखे…
सत्ता की गाड़ी फंसी तो व्यवस्था की आंखें खुल गईं…

कभी-कभी एक छोटी-सी घटना पूरी व्यवस्था का बड़ा सच सामने ला देती है। 20 अगस्त को एनएच-43 पर सत्तारूढ़ दल के प्रदेश संगठन महामंत्री पवन साय की गाड़ी का गहरे गड्ढे में फंसना भी ऐसी ही घटना है। यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि किसी बड़े नेता की गाड़ी फंस गई,बल्कि इसलिए कि उस गाड़ी के फंसते ही वह सड़क अचानक व्यवस्था की नजर में आ गई,जिसे आम जनता वर्षों से झेलती आ रही है।
यही वह बिंदु है जहां से सवाल शुरू होता है…
क्या सड़क पर गड्ढा तब ही दिखाई देता है, जब उसमें सत्ता की गाड़ी फंसती है? अंबिकापुर और सरगुजा की सड़कों की हालत किसी से छिपी नहीं है। मनेन्द्रगढ़ रोड,खरसिया रोड,रामानुजगंज रोड और एनएच-43 के कई हिस्सों में आम नागरिक लंबे समय से परेशानी झेल रहे हैं। लोग गिरते हैं,वाहन खराब होते हैं,दुर्घटनाएं होती हैं,मरीज परेशान होते हैं। शिकायतें भी होती हैं और जनप्रतिनिधियों तक आवाज भी पहुंचती है। लेकिन व्यवस्था का पहिया उतनी तेजी से नहीं घूमता,जितनी तेजी से सत्ता की गाड़ी फंसने के बाद घूमता दिखाई देता है।
यही अंतर लोकतंत्र के लिए असहज करने वाला है…
जनता की गाड़ी का टूटना केवल वाहन का नुकसान नहीं है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार के लिए खराब सड़क का मतलब है—मरम्मत का अतिरिक्त खर्च,अस्पताल तक पहुंचने में देरी, काम पर पहुंचने में परेशानी और हर सफर में दुर्घटना का डर। किसी किसान के लिए खराब सड़क बाजार तक पहुंचने की मुश्किल है। किसी विद्यार्थी के लिए यह रोज स्कूल जाने का जोखिम है। किसी मरीज के लिए यह जीवन और समय का सवाल हो सकता है।
फिर भी इन परेशानियों का वजन शायद उतना नहीं है,जितना किसी प्रभावशाली व्यक्ति की दो घंटे की परेशानी का।
यही सोच बदलनी होगी…

सत्ता जनता से बनती है। सरकार जनता के लिए होती है। अधिकारी जनता की सेवा के लिए होते हैं। सड़कें जनता के टैक्स और सार्वजनिक धन से बनती हैं। फिर जनता को अपनी समस्या साबित करने के लिए किसी वीआईपी की परेशानी का इंतजार क्यों करना पड़े?
यदि सड़क की मरम्मत तुरंत शुरू हो सकती है,तो पहले क्यों नहीं हुई?
यदि कुछ ट्रैक्टर मलबे से गड्ढे भरे जा सकते हैं,तो जनता की शिकायतों के बाद यह मलबा क्यों नहीं मिला?यदि अधिकारियों को सड़क की स्थिति पता थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इन प्रश्नों का उत्तर केवल सड़क विभाग को नहीं, पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को देना चाहिए।
और यहीं ‘सुशासन’ शब्द की असली परीक्षा होती है…
सुशासन का अर्थ यह नहीं कि किसी बड़े व्यक्ति के नाराज होते ही अधिकारी सक्रिय हो जाएं। सुशासन का अर्थ तो यह है कि किसी आम नागरिक को शिकायत लेकर दर-दर न भटकना पड़े। सड़क पर गड्ढा दिखाई दे तो उसे भरने के लिए किसी बड़े पदाधिकारी के निर्देश की जरूरत न पड़े। व्यवस्था इतनी संवेदनशील हो कि समस्या को शिकायत बनने से पहले पहचान ले और दुर्घटना होने से पहले सुधार दे।
जिस व्यवस्था को जगाने के लिए सत्ता की गाड़ी का फंसना पड़े,उस व्यवस्था को अपनी संवेदनशीलता पर गंभीरता से विचार करना चाहिए
यहां स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। गड्ढे भरने के लिए मौके पर पहुंचना अच्छी पहल है। मलबा डलवाना भी जरूरी था। लेकिन सवाल यह है कि यह पहल पहले क्यों नहीं हुई? क्या किसी बड़े नेता की नाराजगी के बाद ही जनहित का महत्व बढ़ जाता है? और यदि इस काम को सोशल मीडिया पर उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है,तो उससे भी बड़ा सवाल सामने आता है—क्या कुछ गड्ढे भर देना सुशासन की उपलब्धि है या वर्षों की अनदेखी का प्रमाण? जनता को तस्वीरों से ज्यादा स्थायी समाधान चाहिए…
सोशल मीडिया पर यह दिखाना आसान है कि सड़क पर मलबा डलवा दिया गया। लेकिन जनता यह देखेगी कि पहली बारिश के बाद सड़क कैसी रहती है। कुछ सप्ताह बाद गड्ढे फिर बनते हैं या नहीं। पूरी सड़क की मरम्मत होती है या केवल उस हिस्से की जहां सत्ता की गाड़ी फंसी थी।
यही असली कसौटी होगी…
स्थानीय मंत्री और प्रभारी मंत्री से भी जवाबदेही की अपेक्षा स्वाभाविक है। राजनीति केवल चुनाव जीतने और पद संभालने का नाम नहीं है। सत्ता का अर्थ यह भी है कि जनता की रोजमर्रा की तकलीफों को प्राथमिकता दी जाए। यदि सड़कें वर्षों से खराब हैं तो बजट,निर्माण की गुणवत्ता, रखरखाव, ठेकेदार और विभागीय जिम्मेदारी—हर पहलू की समीक्षा होनी चाहिए। लेकिन इस पूरे प्रसंग को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित करना भी उचित नहीं होगा। इसे व्यवस्था सुधारने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।
सरकार चाहे तो इस एक घटना को पूरे सरगुजा की सड़कों के लिए अभियान में बदल सकती है। सभी प्रमुख सड़कों का सर्वे हो। खतरनाक गड्ढों को चिन्हित किया जाए। तत्काल मरम्मत और स्थायी निर्माण की अलग-अलग समय-सीमा तय हो। जिम्मेदार विभागों की जवाबदेही तय हो। निर्माण की गुणवत्ता की जांच हो। और सबसे जरूरी—जनता की शिकायत को ‘देखेंगे’ कहकर टालने की संस्कृति समाप्त हो।
क्योंकि सड़क का गड्ढा केवल सड़क में नहीं होता। कभी-कभी वह हमारी प्रशासनिक सोच में भी होता है…
एक गड्ढा सड़क को नुकसान पहुंचाता है, दूसरा गड्ढा जनता और व्यवस्था के बीच भरोसे को…
एनएच-43 का गड्ढा भर जाएगा। सड़क फिर चलने लायक हो जाएगी। लेकिन जनता के मन में उठे इस सवाल का गड्ढा कौन भरेगा कि उसकी परेशानी को गंभीरता से लेने के लिए आखिर सत्ता की गाड़ी का फंसना क्यों जरूरी था?
लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण गाड़ी सत्ता की नहीं,जनता के भरोसे की गाड़ी होती है। उसे गड्ढे में गिरने से बचाना ही असली सुशासन है।


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