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लेख @ क्या सत्ता का लंबा सफर भाजपा के लिए चुनौती बनता जा रहा है? लोकतंत्र,जनादेश और जनता की अपेक्षाओं का विश्लेषण

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जनादेश से जनआक्रोश तक? भाजपा के लंबे शासन पर उठते सवाल
लंबे शासन की कीमत,क्या जनता का भरोसा कमजोर पड़ रहा है?
क्या सत्ता का आत्मविश्वास अहंकार में बदल रहा है? लोकतंत्र के आईने में भाजपा

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यहाँ जनता ही अंतिम निर्णायक होती है, कोई भी राजनीतिक दल कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसकी असली ताकत जनता के विश्वास से आती है,जिस दिन जनता का विश्वास डगमगाने लगता है,उसी दिन सबसे मजबूत राजनीतिक किला भी कमजोर पड़ने लगता है,भारतीय राजनीति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, आज़ादी के बाद दशकों तक कांग्रेस देश की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति रही, ऐसा समय भी था जब यह माना जाने लगा था कि कांग्रेस को सत्ता से हटाना लगभग असंभव है,लेकिन समय बदला, जनता का मूड बदला और वही कांग्रेस, जो कभी अपराजेय मानी जाती थी,धीरे-धीरे सत्ता से बाहर होती चली गई, 2014 में जनता ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को भारी जनादेश दिया,भ्रष्टाचार, महंगाई,नीति-निर्णय में सुस्ती और मजबूत नेतृत्व की तलाश जैसे मुद्दों ने भाजपा को अभूतपूर्व समर्थन दिलाया, 2019 में भी भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहले से भी बड़ा जनादेश
मिला,लेकिन अब,लगातार लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद,यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भाजपा भी उसी दौर की ओर बढ़ रही है, जहाँ जनता की अपेक्षाएं और सरकार का आत्मविश्वास आमने-सामने खड़े दिखाई देने लगते हैं?
भारत का लोकतंत्र लगातार विकसित हो रहा है, सरकारों का मूल्यांकन उनके कार्य,नीतियों और जनता के अनुभवों के आधार पर होता है, लंबे समय तक सत्ता में रहना किसी भी दल के लिए अवसर भी है और परीक्षा भी,यदि सरकार जनता की अपेक्षाओं,आलोचनाओं और संवाद को गंभीरता से लेती है,तो उसका जनसमर्थन मजबूत हो सकता है,यदि जनता को लगता है कि उसकी चिंताओं की अनदेखी हो रही है,तो वह चुनाव के माध्यम से अपना निर्णय बदल सकती है,अंततः लोकतंत्र की असली शक्ति किसी एक दल, नेता या विचारधारा में नहीं,बल्कि नागरिकों के मताधिकार,संविधान और शांतिपूर्ण जनभागीदारी में निहित है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाएँ और जनता का अधिकार ही भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान हैं।
सत्ता की सबसे बड़ी परीक्षा उसका लंबा कार्यकाल होता है- विपक्ष में रहकर सरकार की आलोचना करना अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन लंबे समय तक सत्ता में बने रहना कहीं अधिक कठिन होता है,शुरुआत में जनता उम्मीदों के साथ सरकार को समय देती है, लेकिन जैसे-जैसे कार्यकाल बढ़ता है,अपेक्षाएँ भी बढ़ती जाती हैं, लंबे समय तक शासन करने वाली लगभग हर सरकार के सामने कुछ सामान्य चुनौतियाँ आती हैं जनता में सत्ता-विरोधी भावना का उभरना,संगठन और सरकार के बीच संवाद में कमी,स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही कमजोर होना,यह धारणा बनना कि सरकार जनता की बात कम और अपनी उपलब्धियों की चर्चा अधिक कर रही है, यही परिस्थितियाँ कभी कांग्रेस के सामने भी आई थीं और राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि किसी भी लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले दल को इन चुनौतियों से गुजरना पड़ता है।
क्या भाजपा के सामने भी वही चुनौती है?- भाजपा समर्थक सरकार की उपलब्धियों की लंबी सूची प्रस्तुत करते हैं,बुनियादी ढाँचे का विस्तार, डिजिटल भुगतान,कई कल्याणकारी योजनाएँ, विदेश नीति, रक्षा क्षेत्र में कुछ फैसले,सड़क और रेलवे परियोजनाएँ जैसे विषय अक्सर उसकी उपलब्धियों में गिनाए जाते हैं,दूसरी ओर, आलोचक महंगाई,बेरोजगारी,सामाजिक तनाव, विपक्ष के साथ टकराव,संस्थाओं की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,किसानों और युवाओं की चिंताओं जैसे मुद्दे उठाते हैं,लोकतांत्रिक राजनीति में दोनों तरह की बातें साथ-साथ मौजूद रहती हैं, किसी भी सरकार का मूल्यांकन केवल उपलब्धियों या केवल आलोचनाओं से नहीं, बल्कि दोनों के संतुलन से किया जाता है।
क्या जनता की नाराज़गी बढ़ रही है?- जब किसी सरकार के खिलाफ लगातार अलग-अलग वर्ग आवाज उठाने लगें,तो यह राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है,कर्मचारी,किसान, युवा, व्यापारी,छात्र या अन्य समूह यदि अपनी समस्याओं को लेकर आंदोलन करते हैं, तो सरकार के लिए यह अवसर भी होता है और चेतावनी भी, हर विरोध यह सिद्ध नहीं करता कि सरकार अलोकप्रिय हो गई है,लेकिन लगातार बढ़ते असंतोष को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना भी किसी सरकार के लिए उचित नहीं माना जाता।
जंतर-मंतर और विरोध की राजनीति- भारत का संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और विरोध करने का अधिकार देता है, लोकतंत्र में सरकार से असहमति होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है, हालाँकि,हर प्रदर्शन की परिस्थितियाँ अलग होती हैं, कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है,यदि किसी विरोध प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग हुआ हो,तो उसकी वैधता और आवश्यकता का आकलन तथ्यों,परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए, किसी भी एक घटना से व्यापक निष्कर्ष निकालने से पहले उसके सभी पक्षों को देखना आवश्यक है।
क्या सरकार आलोचना सुन रही है?-किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की मजबूती केवल चुनाव जीतने में नहीं,बल्कि आलोचना सुनने और आवश्यक सुधार करने की क्षमता में भी होती है, यदि सरकार के समर्थक हर आलोचना को देशविरोध या राजनीति मानकर खारिज कर दें, तो इससे वास्तविक समस्याओं पर चर्चा कमजोर हो सकती है,दूसरी ओर, यदि विपक्ष हर सरकारी निर्णय को बिना तथ्यों के गलत ठहराए,तो वह भी रचनात्मक लोकतांत्रिक विमर्श को नुकसान पहुँचाता है,स्वस्थ लोकतंत्र में नीतियों की आलोचना और उपलब्धियों की सराहना—दोनों के लिए स्थान होना चाहिए।
क्या सत्ता का आत्मविश्वास कभी अहंकार में बदल सकता है?-राजनीतिक इतिहास बताता है कि लंबे समय तक लगातार चुनाव जीतने के बाद किसी भी दल के भीतर यह जोखिम पैदा हो सकता है कि वह अपनी लोकप्रियता को स्थायी मानने लगे,यदि ऐसा होता है, तो जनता के साथ संवाद कमजोर पड़ सकता है, हालाँकि,यह कहना कि कोई विशेष दल निश्चित रूप से अहंकार में आ गया है,एक राजनीतिक राय होगी,स्थापित तथ्य नहीं,इसका आकलन मतदाता अपने अनुभवों,चुनावी व्यवहार और सरकार के कामकाज के आधार पर करते हैं।
भाजपा समर्थक और आलोचक-दोनों की भूमिका-लोकतंत्र में समर्थक और आलोचक दोनों आवश्यक हैं, समर्थक सरकार की उपलब्धियाँ सामने रखते हैं,जबकि आलोचक कमियों की ओर ध्यान दिलाते हैं, यदि समर्थक हर निर्णय का बिना प्रश्न किए समर्थन करें या आलोचक हर निर्णय का बिना विश्लेषण विरोध करें,तो दोनों स्थितियाँ लोकतांत्रिक बहस को कमजोर करती हैं,किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए तथ्य-आधारित चर्चा अधिक उपयोगी होती है।क्या जनता के पास विकल्प हमेशा रहता है?- भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा सत्य यही है कि अंतिम निर्णय मतदाता करता है,इतिहास में कई ऐसे अवसर आए हैं जब बहुत मजबूत मानी जाने वाली सरकारें चुनाव हार गईं,और कई बार कठिन परिस्थितियों के बावजूद सरकारें दोबारा जनादेश लेकर लौटीं,इसलिए यह मान लेना कि कोई भी दल हमेशा सत्ता में रहेगा या कोई दल कभी वापस नहीं आएगा—दोनों ही राजनीतिक रूप से निश्चित निष्कर्ष नहीं हैं, लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यही है कि जनता समय-समय पर अपना निर्णय बदल भी सकती है।
रवि सिंह
कोरिया,छत्तीसगढ़


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