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बैकुंठपुर/कोरिया @ जीवन बचाने वाली दवा पर ताला…गुटखा-सिगरेट की दुकानें रातभर चालू

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  • …आखिर स्वास्थ्य व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी?
  • जन औषधि केंद्र पर ताला,बाहर गुटखा-पाउच की बिक्री जारी…क्या यही है 24 घंटे स्वास्थ्य सेवा?
  • 24 घंटे इलाज का दावा,लेकिन रात में दवा के लिए भटकते मरीज…बैकुंठपुर जिला अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल
  • जिला अस्पताल में रात को बंद जन औषधि केंद्र,बाहर खुली गुटखा-चाय की दुकानें…आखिर मरीज जाए तो कहां?
  • रात 12ः15 बजे दवा नहीं मिली,दोस्त को नींद से उठाना पड़ा…पूर्व विधायक के करीबी की पोस्ट से उठे बड़े सवाल
  • अस्पताल में इलाज,लेकिन दवा नहीं…जिला मुख्यालय में 24 घंटे मेडिकल स्टोर नहीं होने पर उठा सवाल
  • पूर्व विधायक के करीबी ज्ञानेंद्र शुक्ला की सोशल मीडिया पोस्ट के बाद उठे सवाल,बोले…रात 12ः15 बजे दवा नहीं मिली, मित्र को नींद से उठाकर मंगानी पड़ी जिला मुख्यालय में 24 घंटे मेडिकल स्टोर की उठी मांग…

-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया,17 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
सरकारें स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर बड़े-बड़े दावे करती हैं,जिला अस्पतालों को 24 घंटे स्वास्थ्य सेवाओं का केंद्र बताया जाता है,गंभीर मरीजों के इलाज,आपातकालीन सेवाओं और जन औषधि केंद्रों के माध्यम से सस्ती दवा उपलब्ध कराने की बातें लगातार की जाती हैं,लेकिन यदि आधी रात को किसी मरीज को जीवनरक्षक दवा की जरूरत पड़ जाए और पूरा जिला मुख्यालय दवा के लिए भटकने को मजबूर कर दे,तो ऐसे दावों की हकीकत क्या रह जाती है? कोरिया जिले के जिला मुख्यालय बैकुंठपुर में ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जिसने स्वास्थ्य व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं,यह सवाल किसी विपक्षी नेता या आम नागरिक ने नहीं,बल्कि एक समय बैकुंठपुर विधायक के बेहद करीबी रहे ज्ञानेंद्र शुक्ला ने अपनी फेसबुक पोस्ट के माध्यम से उठाया है,उनकी पोस्ट सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है,क्योंकि इसमें केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बड़ी खामी उजागर होती दिखाई दे रही है।
रात 12ः15 बजे दवा की जरूरत पड़ी, लेकिन पूरी व्यवस्था सोती मिली-ज्ञानेंद्र शुक्ला ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा कि रात लगभग12 बजकर 15 मिनट पर उनके घर के एक सदस्य की तबीयत खराब हो गई,आवश्यक दवा लेने के लिए वे तत्काल बाहर निकले,उन्हें उम्मीद थी कि जिला अस्पताल परिसर या आसपास कम से कम एक मेडिकल स्टोर ऐसा जरूर होगा,जहां आपातकालीन स्थिति में दवा मिल जाएगी,लेकिन जब वे अस्पताल पहुंचे तो जन औषधि केंद्र सहित दवा दुकानें बंद मिलीं,उन्होंने लिखा कि अस्पताल के आसपास सिगरेट,गुटखा,पान मसाला,चाय-पानी और कुरकुरे जैसी चीजें आसानी से मिल रही थीं, लेकिन जीवन बचाने वाली दवा कहीं उपलब्ध नहीं थी।
क्या जन औषधि केंद्र सिर्फ दिन में ताला खोलने के लिए हैं?-सरकार ने प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि योजना के तहत अस्पताल परिसरों में मेडिकल स्टोर खोले हैं,ताकि लोगों को सस्ती और आसानी से दवा मिल सके,लेकिन यदि यही दुकानें रात में बंद रहती हैं तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इनका संचालन केवल औपचारिकता है? क्या अस्पताल परिसर में स्थित जन औषधि केंद्र का 24 घंटे खुला रहना आवश्यक नहीं? यदि नहीं,तो आपातकालीन मरीजों को दवा कौन देगा?
सिगरेट मिल जाएगी, दवा नहीं-
अपनी पोस्ट में उन्होंने लिखा बात तो कुछ खास नहीं…जिला मुख्यालय बैकुंठपुर…रात को 12 बजकर 15 मिनट हुए थे, इत्तेफाक से एक दवाई की जरूरत आ गई। आप लोग स्वयं देख लीजिए… लेकिन आपको पसंद की सिगरेट और पाउच मिल जाएगा, दवाई नहीं, उन्होंने आगे लिखा कि सौभाग्य से उनके कुछ लोगों से अच्छे संबंध थे, इसलिए एक मित्र को नींद से उठाकर दवा मंगवानी पड़ी, अन्यथा स्थिति और गंभीर हो सकती थी।
क्या जिला अस्पताल में 24 घंटे दवा मिलने की व्यवस्था केवल कागजों तक?-
यह घटना कई सवाल खड़े करती है, जिला अस्पताल का उद्देश्य केवल डॉक्टर और बिस्तर उपलब्ध कराना नहीं होता, बल्कि मरीज को तत्काल आवश्यक दवा उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है, यदि अस्पताल परिसर में संचालित जन औषधि केंद्र या मेडिकल स्टोर रात के समय बंद रहते हैं तो फिर आपातकालीन मरीजों की जरूरतें कैसे पूरी होंगी? क्या अस्पताल में भर्ती मरीजों के परिजनों को रात में कई किलोमीटर दूर दवा खोजने निकलना पड़ेगा?
जिला मुख्यालय में एक भी 24 घंटे मेडिकल स्टोर क्यों नहीं?
बैकुंठपुर जिला मुख्यालय है,यहां जिला अस्पताल है,ट्रॉमा जैसी आपातकालीन सेवाओं की व्यवस्था है,रात-दिन मरीज पहुंचते हैं,ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या पूरे जिला मुख्यालय में एक भी ऐसा मेडिकल स्टोर नहीं होना चाहिए,जो 24 घंटे खुला रहे? यदि किसी दुर्घटना,हार्ट अटैक,जहरीले जीव के काटने,तेज बुखार, अस्थमा या अन्य आपातकालीन स्थिति में दवा की आवश्यकता पड़े तो मरीज आखिर कहां जाएगा?
किसकी जिम्मेदारी है यह व्यवस्था?
यह प्रश्न केवल किसी निजी मेडिकल स्टोर का नहीं है, यदि अस्पताल परिसर में दवा उपलब्ध नहीं है तो जिम्मेदारी किसकी मानी जाए? जिला अस्पताल प्रबंधन की? मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी की? जन औषधि केंद्र संचालकों की? जिला प्रशासन की? या फिर स्वास्थ्य विभाग की?
कभी अस्पताल में लोगों की मदद करते थे ज्ञानेंद्र शुक्ला
ज्ञानेंद्र शुक्ला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं,वे लंबे समय तक पूर्व स्थानीय विधायक के बेहद करीबी रहे और अस्पताल में आने वाले मरीजों की सहायता करते हुए अक्सर देखे जाते थे,स्थानीय लोग बताते हैं कि वे अस्पताल में भर्ती मरीजों और उनके परिजनों की समस्याओं के समाधान के लिए सक्रिय रहते थे, लेकिन अब जब उनके साथ स्वयं यह घटना हुई तो उन्हें अपनी पीड़ा सार्वजनिक रूप से फेसबुक पर लिखनी पड़ी,इससे यह संकेत भी मिलता है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं ऐसी कमी है,जो सीधे आम नागरिकों को प्रभावित कर रही है।
सोशल मीडिया से प्रशासन को आईना
ज्ञानेंद्र शुक्ला ने अपनी पोस्ट के अंत में जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से अपील करते हुए लिखा जिले के जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और जिम्मेदार अधिकारियों से कहना चाहूंगा कि कम से कम एक औषधि दुकान ऐसी हो,जहां जरूरतमंद को रात में भी दवाइयां मिल सकें,ऐसी व्यवस्था बनाने की पहल की जाए,उनकी यह अपील केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं,बल्कि पूरे जिले की आवश्यकता को सामने रखती है।
स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे कमजोर पहलू
अक्सर अस्पतालों में डॉक्टर,मशीनें और भवन होने की चर्चा होती है,लेकिन आपातकालीन दवा उपलब्धता पर कम ध्यान दिया जाता है, विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी इमरजेंसी में इलाज की पहली कड़ी समय पर दवा मिलना होती है, यदि दवा ही उपलब्ध न हो तो अस्पताल की अन्य सुविधाएं भी प्रभावित हो जाती हैं।
जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से जवाब की उम्मीद
यह मामला अब केवल एक फेसबुक पोस्ट तक सीमित नहीं रह गया है, लोगों के बीच यह चर्चा शुरू हो गई है कि जिला मुख्यालय में कम से कम एक 24 घंटे संचालित मेडिकल स्टोर होना चाहिए, विशेषकर जिला अस्पताल परिसर या उसके आसपास,यदि अस्पताल में रातभर मरीजों का इलाज होता है तो दवा की उपलब्धता भी चौबीसों घंटे सुनिश्चित होनी चाहिए…
सबसे बड़ा सवाल
क्या जिला अस्पताल में जीवनरक्षक दवाओं की 24 घंटे उपलब्धता सुनिश्चित है?
यदि अस्पताल परिसर की दुकानें रात में बंद रहती हैं तो मरीज कहां जाए?
क्या जन औषधि केंद्रों के संचालन का समय पुनः निर्धारित किया जाना चाहिए?
क्या जिला प्रशासन इस व्यवस्था की समीक्षा करेगा?
और सबसे महत्वपूर्ण…क्या बैकुंठपुर जैसे जिला मुख्यालय में एक भी 24 घंटे मेडिकल स्टोर नहीं होना चाहिए? यह घटना स्वास्थ्य सेवाओं के उस पहलू को उजागर करती है, जिस पर शायद अब गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।


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