- राजकीय सम्मान के साथ किया गया अंतिम संस्कार
- 13 साल की उम्र में शुरू किया था पंडवानी गायन

रायपुर,05 जुलाई 2026। छत्तीसगढ़ की लोक कला और पंडवानी गायन को वैश्विक पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन हो गया। वे 70 साल की थीं। उन्होंने शनिवार रात 3.15 बजे रायपुर एम्स में अंतिम सांस ली। वे पिछले कुछ समय से बीमार थीं। भारतीय लोक कला में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। रविवार सुबह 11 बजे तीजन बाई के शव को उनके पैतृक गांव गनियारी लाया गया, जहां राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। तीजन बाई ने अपनी सशक्त आवाज, प्रभावशाली अभिनय और अनोखी प्रस्तुति शैली से पंडवानी को देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक में नई पहचान दिलाई। महाभारत की कथाओं को सुनाने की प्रेरणा उन्हें नाना से मिली थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीजन बाई के निधन पर शोक जताया। उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक कला को अपनी भव्य प्रस्तुति से दुनियाभर में पहचान दिलाई। उनका जाना कला और संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।’ छत्तीसगढ़ के सीएम विष्णुदेव साय ने कहा कि पंडवानी के जरिए उन्होंने देश-विदेश में राज्य का नाम रोशन किया।
दुर्ग कलेक्टर अभिजीत सिंह,एसपी विजय अग्रवाल,शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल,विधायक ललित चंद्राकर,विधायक डोमलाल कोर्सेवाड़ा सहित अनेक जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों ने तीजन बाई के पार्थिव शरीर पर फूल अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।
भूपेश बघेल बोले… एक महान कलाकार आज विदा हो गया
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पद्म विभूषण तीजन बाई के अंतिम संस्कार में शामिल होने गनियारी पहुंचे। इस दौरान उन्होंने तीजन बाई को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनसे जुड़ी पुरानी यादें साझा कीं। भूपेश बघेल ने कहा कि जब वे स्कूल में पढ़ते थे, तब साइकिल से पंडवानी सुनने जाया करते थे। उन्होंने कहा कि तीजन बाई ने अपनी अद्भुत कला से छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाई।
राज्यपाल रमेन डेका ने पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया…
राज्यपाल रमेन डेका ने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की अमर स्वर-कोकिला,पद्म विभूषण से सम्मानित एवं विश्वविख्यात पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। अपने शोक संदेश में राज्यपाल ने कहा कि डॉ. तीजन बाई का निधन केवल लोककला जगत ही नहीं,बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पूरे राष्ट्र के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने अपनी अद्वितीय गायन शैली,असाधारण प्रतिभा और लोक परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन के माध्यम से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विशिष्ट पहचान दिलाई। लोककला के क्षेत्र में उनका अतुलनीय योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा। राज्यपाल ने कहा कि डॉ. तीजन बाई ने अपना संपूर्ण जीवन लोककला की साधना, संरक्षण और संवर्धन को समर्पित किया। उन्होंने पंडवानी जैसी समृद्ध लोक परंपरा को विश्व मंच तक पहुंचाकर छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाया। उनका व्यक्तित्व,कला-साधना और सांस्कृतिक योगदान आने वाली पीढिय़ों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे। राज्यपाल ने ईश्वर से प्रार्थना की कि वे दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा शोकाकुल परिजनों,उनके असंख्य प्रशंसकों और समस्त लोककला जगत को इस गहन दुःख को सहन करने की शक्ति एवं संबल प्रदान करें।
नाना को सुनकर गाने के प्रति लगाव बढ़ा
तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को भिलाई के गनियारी गांव में हुआ था। वे पारधी समुदाय से थीं। देश-विदेश में पंडवानी लोक गायिकी को पहचान दिलाने वाली तीजन की जिंदगी का सफर आसान नहीं रहा। इसी गायिकी की वजह से उन्हें समाज ने बेदखल कर दिया था। समाज से निकाले जाने के बाद भी उन्होंने गाना नहीं छोड़ा। उनके पिता का नाम चुनुकलाल और माता का नाम सुखवती था। तीजन अपने नाना ब्रजलाल को महाभारत की कहानियां गाते-सुनाते देखतीं थी। धीरे-धीरे उन्हें ये कहानियां याद हो गई। उनकी लगन और प्रतिभा को देखकर गायक उमेद सिंह देशमुख ने उन्हें प्रशिक्षण दिया। 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना पहला मंच प्रदर्शन किया। उस समय में महिला पंडवानी गायिकाएं केवल बैठकर गा सकती थीं,जिसे वेदमती शैली कहा जाता है। पुरुष खड़े होकर कापालिक शैली में गाते थे। तीजनबाई वे पहली महिला थीं,जिन्होंने कापालिक शैली में पंडवानी की।
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