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खनिज विभाग की चुप्पी पर उठे सवाल
पैनारी के जंगलों से धड़ल्ले से हो रहा अवैध उत्खनन,हर दिन सैकड़ों ट्रिप पत्थरों के परिवहन की चर्चा
लीज क्षेत्र में दिखावटी खनन और जंगलों से बोल्डर चोरी के आरोप,ग्रामीणों ने दी आंदोलन की चेतावनी
-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां (एमसीबी),07 जून 2026 (घटती-घटना)। एक ओर सरकार पर्यावरण संरक्षण,वृक्षारोपण और हरित विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के खड़गवां विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत पैनारी के आसपास स्थित छोटे झाड़ वाले जंगल कथित अवैध बोल्डर उत्खनन की भेंट चढ़ते नजर आ रहे हैं, स्थानीय लोगों का आरोप है कि राजस्व भूमि और वन क्षेत्र में खुलेआम बोल्डर निकाले जा रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे बैठा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले कुछ वर्षों में क्षेत्र के छोटे जंगल, पहाडि़यां और प्राकृतिक जलस्रोत पूरी तरह समाप्त हो सकते हैं, अवैध खनन के कारण जहां जंगलों का स्वरूप बदल रहा है, वहीं पर्यावरणीय संतुलन पर भी गंभीर खतरा मंडराने लगा है।
हरे-भरे जंगलों की जगह बन रहे गहरे गड्ढे
स्थानीय लोगों के अनुसार पैनारी क्षेत्र के आसपास स्थित छोटे झाड़ वाले जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में लंबे समय से अवैध बोल्डर उत्खनन किया जा रहा है,जहां कभी हरियाली और प्राकृतिक वनस्पतियां दिखाई देती थीं, वहां अब बड़े-बड़े गड्ढे और कटे हुए पहाड़ी हिस्से नजर आने लगे हैं, ग्रामीणों का आरोप है कि उत्खनन करने वाले पहले बड़े पत्थरों को आग से गर्म करते हैं और फिर उन्हें हथौड़ों तथा अन्य भारी उपकरणों की सहायता से तोड़कर छोटे-छोटे टुकड़ों में परिवर्तित करते हैं, इसके बाद इन्हें वाहनों के माध्यम से क्रेशर प्लांट तक पहुंचाया जाता है, ग्रामीणों का कहना है कि यह कार्य अब छिपकर नहीं बल्कि खुलेआम किया जा रहा है, जिससे लोगों में प्रशासनिक निष्कि्रयता को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है।
हर दिन सैकड़ों ट्रिप बोल्डर परिवहन की चर्चा- स्थानीय लोगों के अनुसार जंगलों से निकाले गए बोल्डरों को बड़ी संख्या में क्रेशर प्लांट तक पहुंचाया जा रहा है,क्षेत्र में प्रतिदिन सैकड़ों ट्रिप पत्थर परिवहन होने की चर्चा है, ग्रामीणों का कहना है कि यदि वास्तव में इतनी बड़ी मात्रा में बोल्डर परिवहन हो रहे हैं तो यह किसी छोटे स्तर की चोरी नहीं बल्कि एक संगठित अवैध खनन नेटवर्क का संकेत है, लोग सवाल उठा रहे हैं कि यदि परिवहन इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है तो फिर जिम्मेदार विभागों की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ रही।
लीज क्षेत्र में कम, जंगलों में ज्यादा खनन के आरोप-ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि कुछ क्रेशर संचालक अपनी स्वीकृत लीज भूमि में सीमित और दिखावटी उत्खनन करते हैं, जबकि वास्तविक सामग्री आसपास के छोटे जंगलों और अन्य प्रतिबंधित क्षेत्रों से लाई जाती है, उनका कहना है कि यदि लीज क्षेत्र, उत्खनन स्थल और क्रेशर में मौजूद स्टॉक का भौतिक सत्यापन किया जाए तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है,ग्रामीणों का आरोप है कि जारी पीट पास की मात्रा और वास्तविक उत्खनन के बीच बड़ा अंतर है, यदि इस संबंध में निष्पक्ष जांच की जाए तो शासन को संभावित राजस्व हानि और अवैध खनन के नेटवर्क से जुड़े कई तथ्य सामने आ सकते हैं।
खनिज विभाग की भूमिका पर सवाल-पूरा मामला सामने आने के बाद सबसे अधिक सवाल खनिज विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे हैं, स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर उत्खनन और परिवहन बिना विभागीय जानकारी के संभव नहीं लगता, ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार शिकायतों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। इससे लोगों के बीच यह धारणा बन रही है कि या तो विभाग इस गतिविधि से पूरी तरह अनजान है या फिर मामले को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, विशेष रूप से तब सवाल और गहरे हो जाते हैं जब संबंधित मामले में जानकारी लेने के लिए खनिज अधिकारी से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनका पक्ष प्राप्त नहीं हो सका, स्थानीय लोगों का आरोप है कि खनिज अधिकारी आमतौर पर फोन कॉल का जवाब देने से भी बचते हैं।
चैन मशीनों से खोदे जा रहे पहाड़…कमजोर हो रही जमीन…
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक पैनारी में संचालित क्रेशर प्लांट से लगी पहाडि़यों में भारी मशीनों का उपयोग कर लगातार उत्खनन किया जा रहा है,हैवी चैन मशीनों की मदद से पत्थरों को निकाला जा रहा है,जिससे पहाडि़यों की संरचना प्रभावित हो रही है,इस गतिविधि के कारण आसपास की जमीन कमजोर होती जा रही है और कई स्थानों पर धंसाव की आशंका भी बढ़ गई है,छोटे पेड़-पौधे,झाडि़यां और प्राकृतिक वनस्पतियां जड़ों समेत नष्ट हो रही हैं,पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे जंगलों का विनाश केवल पेड़ों की कटाई भर नहीं है,बल्कि यह स्थानीय जैव विविधता, भूजल संरक्षण और प्राकृतिक संतुलन पर भी सीधा असर डालता है।
मवेशियों के चराई क्षेत्र हो रहे समाप्त…
अवैध उत्खनन का असर अब ग्रामीणों के दैनिक जीवन पर भी दिखाई देने लगा है,ग्रामीणों का कहना है कि जिन क्षेत्रों में पहले मवेशियों को चराने ले जाया जाता था,वे अब खदाननुमा गहरे गड्ढों में तब्दील हो चुके हैं,पशुपालकों के सामने चराई की समस्या बढ़ गई है,इसके साथ ही पशुओं के दुर्घटनाग्रस्त होकर गड्ढों में गिरने का खतरा भी बढ़ गया है, ग्रामीणों का आरोप है कि यदि समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई तो आने वाले दिनों में पशुपालन पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
जंगल बचाने की मांग, बड़े आंदोलन की चेतावनी
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पैनारी क्षेत्र में संचालित क्रेशरों की लीज भूमि, जंगलों में चल रहे कथित उत्खनन स्थलों और क्रेशर परिसर में रखे गए बोल्डर स्टॉक का संयुक्त भौतिक सत्यापन कराया जाए, लोगों का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच कराई जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि पत्थर कहां से निकाले जा रहे हैं और क्या निर्धारित नियमों का पालन किया जा रहा है या नहीं, ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होंगे।
सबसे बड़ा सवाल-जंगल बचेंगे या बोल्डर माफिया जीतेगा?
आज पैनारी और आसपास के छोटे जंगल एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां निर्णय केवल प्रशासन को लेना है, यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो छोटे झाड़ वाले ये जंगल,पहाडि़यां और प्राकृतिक संसाधन धीरे-धीरे इतिहास बन सकते हैं,फिलहाल ग्रामीणों की निगाहें जिला प्रशासन और खनिज विभाग पर टिकी हैं, लोग जानना चाहते हैं कि क्या जांच केवल फाइलों और कागजों तक सीमित रहेगी या फिर वास्तव में जंगलों को बचाने के लिए धरातल पर सख्त कार्रवाई होगी, क्योंकि सवाल सिर्फ अवैध खनन का नहीं है, सवाल आने वाली पीढि़यों के लिए बची हुई हरियाली का भी है।
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