
- आखिर कितनी महकती है ‘चंदन’ की खुशबू?
- चंदन की खुशबू इतनी असरदार कि शिकायतों पर भी प्रमोशन की फुहार!
- सीईओ की बात टली, नोटिसों की चर्चा चली,फिर भी बढ़ गई जिम्मेदारी, आखिर किस इत्र से महक रहा है मनरेगा का सिस्टम?
- शिकायतों का इनाम,चंदन को मिला बड़ा प्रभार, मनरेगा में खुशबू का असर या संरक्षण का कमाल?
- मनरेगा में चंदन की महक, नोटिसों के साए में बढ़ा रुतबा, सवालों के बीच मिला नया ताज
- 83 लाख का हक,94 लाख का हिसाब! चंदन के गणित पर सवाल,फिर भी बढ़ गया अधिकार
- फाइलों पर खुशबू,आदेशों पर खामोशी! चंदन के बढ़ते प्रभाव पर उठे नए सवाल
- चंदन की खुशबू या सिस्टम की बदबू? जिला पंचायत के आदेश ने खड़े किए कई सवाल
- नोटिस से नहीं,नए प्रभार से नवाजे गए चंदन सिंह! मनरेगा में आखिर चल क्या रहा है?
- एक करोड़ सड़सठ लाख का गणित और बढ़ता रुतबा…मनरेगा में चंदन की कहानी अभी बाकी है…
- 120 पंचायतें परेशान,एक कर्मचारी मालामाल! मनरेगा के ‘चंदन राज’ पर उठी जांच की मांग
- आखिर कौन है इतना ताकतवर?
- आरोप, शिकायत, नोटिस…और फिर प्रमोशन! कोरिया की मनरेगा में मनरेगा का महकता महारथी,सवाल बढ़ते गए, जिम्मेदारियां भी बढ़ती गईं…
-रवि सिंह-
कोरिया,07 जून 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले की मनरेगा व्यवस्था इन दिनों रोजगार सृजन से ज्यादा एक ऐसी खुशबू की वजह से चर्चा में है जो प्रशासनिक गलियारों से लेकर पंचायतों तक फैल चुकी है,यह खुशबू किसी महंगे परफ्यूम की नहीं, बल्कि उस प्रभाव की बताई जा रही है जिसके सामने शिकायतें भी फीकी पड़ जाती हैं,आरोप भी बौने साबित हो जाते हैं और जिम्मेदारियां कम होने के बजाय बढ़ती चली जाती हैं।
बैकुंठपुर जनपद पंचायत में सहायक प्रोग्रामर के पद पर पदस्थ चंदन को 27 मई को एक नया प्रशासनिक उपहार मिला,अब वे सिर्फ जनपद स्तर तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्हें मूल दायित्वों के साथ जिला स्तर पर कंप्यूटर प्रोग्रामर के कार्यों का अतिरिक्त प्रभार भी सौंप दिया गया,आदेश निकलते ही पूरे जिले में चर्चा शुरू हो गई कि आखिर ऐसा कौन सा असाधारण प्रदर्शन रहा जिसके कारण विवादों के बीच जिम्मेदारियां बढ़ाने का निर्णय लिया गया,सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस कर्मचारी की कार्यप्रणाली को लेकर वर्षों से पंचायत प्रतिनिधि, सचिव, रोजगार सहायक और यहां तक कि विभागीय अधिकारी तक सवाल उठाते रहे हों, उसे अतिरिक्त अधिकार देना आखिर किस प्रशासनिक दर्शन का हिस्सा है?
शिकायतों का रिकॉर्ड लंबा, लेकिन आशीर्वाद उससे भी लंबा…
मनरेगा के भुगतान, एफटीओ प्रक्रिया,एमआईएस संचालन और पंचायतों के कार्यों में कथित हस्तक्षेप को लेकर चंदन का नाम पहले भी कई बार चर्चाओं में रहा है,पंचायत प्रतिनिधियों का आरोप रहा है कि भुगतान प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब किया जाता है और कई बार नियमों की ऐसी व्याख्या की जाती है जो फाइल के अनुसार बदलती दिखाई देती है, आरोप लगाने वालों का कहना है कि कुछ फाइलों में छोटी-सी त्रुटि भी हिमालय जैसी बन जाती है,जबकि कुछ मामलों में बड़ी कमियां भी नजरअंदाज हो जाती हैं,यही कारण है कि पंचायतों के बीच एक व्यंग्यात्मक कहावत चल पड़ी है—मनरेगा पोर्टल से ज्यादा महत्वपूर्ण वह कुर्सी है जहां से पोर्टल संचालित होता है, लेकिन आश्चर्यजनक बात यह है कि जितने सवाल बढ़े,उतनी ही जिम्मेदारियां भी बढ़ती चली गईं।
1 करोड़ 67 लाख का गणित और 11 लाख का सवाल…
सूत्रों से सामने आई जानकारी के अनुसार मनरेगा सामग्री भुगतान के लिए लगभग 1 करोड़ 67 लाख रुपये का एफटीओ जारी हुआ था,यह राशि सोनहत और बैकुंठपुर जनपद पंचायत के बीच बराबर-बराबर बांटी जानी थी,सरल गणित कहता है कि दोनों जनपदों को लगभग 83 लाख 50 हजार रुपये मिलने चाहिए थे,लेकिन यहीं से शुरू होती है वह कहानी जिसने कई लोगों की भौंहें तान दी हैं,बताया जा रहा है कि सोनहत को लगभग 83 लाख रुपये मिले,जबकि बैकुंठपुर के हिस्से में करीब 94 लाख रुपये पहुंच गए,अब सवाल यह है कि यदि कुल राशि 1 करोड़ 67 लाख थी और वितरण बराबर होना था,तो फिर बैकुंठपुर के हिस्से में अतिरिक्त लगभग 11 लाख रुपये कहां से आ गए? क्या यह तकनीकी त्रुटि थी? क्या कोई प्रशासनिक आदेश था? क्या किसी स्तर पर राशि पुनर्वितरित की गई? या फिर गणित का कोई नया सूत्र विकसित हुआ जिसे अभी तक विद्यालयों में पढ़ाया नहीं गया? इन सवालों का स्पष्ट उत्तर आज तक सामने नहीं आया है।
नोटिस कार्यक्रम अधिकारी को, लेकिन ताकत किसी और की बढ़ी…
सूत्र बताते हैं कि इस पूरे मामले को लेकर कार्यक्रम अधिकारी जितेंद्र राजवाड़े को नोटिस भी जारी किया गया था,हालांकि नोटिस के बाद क्या कार्रवाई हुई,उसका परिणाम क्या रहा,यह जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई, लेकिन लोगों को सबसे ज्यादा हैरानी इस बात पर है कि यदि भुगतान प्रक्रिया में अनियमितता की आशंका थी,यदि नोटिस जारी हुआ था,यदि विभागीय स्तर पर प्रश्न उठे थे,तो फिर उसी व्यवस्था के प्रमुख पात्र माने जा रहे व्यक्ति की शक्तियां बढ़ाने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? यह प्रश्न अब पंचायतों में खुलकर पूछा जाने लगा है।
सीईओ की बात भी हल्की पड़ गई?
जिला पंचायत स्तर पर यह चर्चा भी जोरों पर है कि कुछ मामलों में जिला पंचायत सीईओ द्वारा स्वयं फोन कर निर्देश दिए गए थे,बताया जाता है कि कुछ शिकायतों के बाद सीईओ को हस्तक्षेप करना पड़ा था,लेकिन आरोप यह है कि उन निर्देशों को अपेक्षित गंभीरता नहीं मिली, यदि यह चर्चा सही है तो फिर प्रश्न और गंभीर हो जाता है,आखिर वह कौन सी प्रशासनिक मजबूरी है जिसके कारण निर्देशों की कथित अवहेलना करने वाले कर्मचारी को बाद में और बड़ा दायित्व सौंप दिया जाता है? क्या यह उत्कृष्ट कार्य का पुरस्कार है? या फिर कोई ऐसी अदृश्य शक्ति काम कर रही है जिसे सामान्य कर्मचारी समझ ही नहीं सकते?
अब जिला स्तर पर बैठेगा डिजिटल दरबार?
नए आदेश के बाद सबसे ज्यादा चिंता वेंडर चयन को लेकर जताई जा रही है,मनरेगा के विभिन्न कार्यों में सामग्री आपूर्ति और संबंधित प्रक्रियाओं में वेंडरों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है,आरोप लगाने वालों का कहना है कि अब जिला स्तर पर अतिरिक्त जिम्मेदारी मिलने के बाद चंदन का प्रभाव और बढ़ जाएगा,चर्चा यह भी है कि कौन वेंडर बनेगा,किसे अवसर मिलेगा और किसकी फाइल आगे बढ़ेगी—इन मामलों में उनका प्रभाव और मजबूत हो सकता है,हालांकि यह सभी आरोप हैं और इनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है,लेकिन यदि ऐसी चर्चाएं लगातार सामने आ रही हैं तो प्रशासन का दायित्व बनता है कि स्थिति स्पष्ट करे।
कोरिया में मनरेगा,फायदा एमसीबी को?
कुछ पंचायत प्रतिनिधियों का आरोप है कि चंदन सिंह स्वयं एमसीबी जिले से आते हैं और कथित रूप से वहां के लोगों को कोरिया जिले में वेंडर के रूप में अवसर दिलाने में विशेष रुचि दिखाते हैं,यदि यह आरोप गलत हैं तो उनका खंडन होना चाहिए, यदि सही हैं तो यह गंभीर जांच का विषय है, क्योंकि किसी भी जिले की योजनाओं में स्थानीय हितों की उपेक्षा और बाहरी प्रभाव का प्रश्न प्रशासनिक निष्पक्षता पर सीधा सवाल खड़ा करता है।
कार्यक्रम अधिकारी बेबस,पंचायतें परेशान…
जानकारों का कहना है कि कार्यक्रम अधिकारी के पद पर बैठे अधिकारी भी कई बार स्थिति को नियंत्रित नहीं कर पाते,यदि यह धारणा प्रशासनिक तंत्र के भीतर बन चुकी है कि एक सहायक प्रोग्रामर की पकड़ इतनी मजबूत है कि अधिकारी भी असहज महसूस करें,तो यह किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था का प्रश्न बन जाता है, व्यवस्था तब तक स्वस्थ नहीं मानी जा सकती जब तक अधिकार और जवाबदेही का संतुलन बना न रहे।
खुशबू आखिर जाती कहां तक है?
जनपद और जिला मुख्यालय में इन दिनों सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला सवाल यही है, यदि शिकायतें हैं, आरोप हैं, नोटिस हैं, विवाद हैं,चर्चाएं हैं, फिर भी जिम्मेदारियां बढ़ रही हैं तो आखिर ऐसा कौन सा तत्व है जो हर नकारात्मक परिस्थिति को सकारात्मक आदेश में बदल देता है? लोग व्यंग्य में कहते हैं कि सामान्य कर्मचारी शिकायत मिलने पर स्पष्टीकरण देता है, लेकिन कुछ विशेष कर्मचारी शिकायत मिलने पर अतिरिक्त प्रभार प्राप्त कर लेते हैं, यही वजह है कि अब लोग इसे चंदन की खुशबू नहीं बल्कि प्रभाव का परफ्यूम कहने लगे हैं।
जांच हुई तो खुल सकती हैं कई परते…
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरोपों की सत्यता का निर्धारण केवल जांच से ही संभव है, जिला प्रशासन को यह देखना होगा कि किस आधार पर अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई? एफटीओ वितरण में वास्तविक स्थिति क्या थी? क्या भुगतान प्रक्रिया में कोई अनियमितता हुई? क्या वेंडर चयन को लेकर लगाए जा रहे आरोपों में तथ्य हैं? क्या सीईओ के निर्देशों की अनदेखी हुई थी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजना का संचालन नियमों के अनुसार हो रहा है? क्योंकि मनरेगा का पैसा किसी अधिकारी, कर्मचारी, प्रोग्रामर या वेंडर का नहीं है,यह उस मजदूर का पैसा है जो तपती धूप में काम करता है और शाम को इस उम्मीद के साथ घर लौटता है कि उसकी मजदूरी समय पर मिलेगी, लेकिन यदि मजदूर की मजदूरी से ज्यादा चर्चा किसी कर्मचारी की खुशबू की होने लगे,तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था में कहीं न कहीं इत्र की मात्रा जवाबदेही से ज्यादा हो गई है।
अधिकारियों/कर्मचारियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रकाशित किया जाएगा…
समाचार में वर्णित आरोप विभिन्न सूत्रों,पंचायत प्रतिनिधियों और विभागीय चर्चाओं पर आधारित हैं,आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि एवं संबंधित अधिकारियों/कर्मचारियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा…
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