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कोरिया @12 साल से टूटा पुल,मौत को मात देकर नदी पार कर रहे ग्रामीण

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बरसात आते ही टापू बन जाता है गिधेर, विकास के दावों के बीच आदिवासी आज भी बदहाली की सजा भुगत रहे
सड़क नहीं,पुल नहीं,स्वास्थ्य नहीं, शिक्षा नहीं,स्वच्छ पानी नहीं…आखिर किस विकास की बात कर रहे हैं जिम्मेदार?
राजन पाण्डेय
कोरिया,07 जून 2026(घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ में विकास के दावे अक्सर बड़े-बड़े मंचों से सुनाई देते हैं,करोड़ों रुपये की योजनाओं के विज्ञापन अखबारों और सोशल मीडिया में छाए रहते हैं। गांव-गांव विकास पहुंचाने की बातें होती हैं, लेकिन यदि इन दावों की असलियत देखनी हो तो कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड के वनांचल क्षेत्रों का एक चक्कर काफी है। यहां पहुंचते ही विकास के तमाम दावे उसी तरह टूटे हुए दिखाई देते हैं जैसे ग्राम गिधेर का वह पुल,जो पिछले 12 वर्षों से खंडहर बना खड़ा है।
यह सिर्फ एक टूटा पुल नहीं है,यह प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक है,यह उन वादों का स्मारक है जो चुनावों के दौरान किए गए और फिर भुला दिए गए,यह उस व्यवस्था का आईना है जो हर चुनाव में आदिवासियों के घर तक पहुंचती है, लेकिन उनकी समस्याओं तक नहीं,सोनहत विकासखंड की ग्राम पंचायत चंदहा का आश्रित ग्राम गिधेर आज भी ऐसी परिस्थितियों में जीवन जी रहा है, जिसे देखकर यह विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि देश आजादी के 79वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है।
बरसात का नाम सुनते ही क्यों कांप उठते हैं ग्रामीण?
गिधेर में लगभग 30 से अधिक आदिवासी परिवार निवास करते हैं,इन परिवारों की जिंदगी का सबसे बड़ा संकट वह पुल है जो करीब 12 साल पहले क्षतिग्रस्त हुआ था और आज पूरी तरह जर्जर होकर उपयोग के लायक नहीं बचा है,गांव के शिव प्रसाद, सियाराम,ईश्वर,नंदलाल, राम मनोहर,सुरेश कुमार,मेहीलाल और बसंत बताते हैं कि गर्मी खत्म होते ही उनकी चिंता बढ़ने लगती है,आसमान में बादल दिखाई देते हैं तो मन में डर बैठ जाता है, कारण साफ है—बरसात शुरू होते ही नदी उफान पर आ जाती है और गांव का संपर्क बाहरी दुनिया से पूरी तरह टूट जाता है, ग्रामीण बताते हैं कि बरसात के चार से छह महीने तक गिधेर एक टापू में बदल जाता है,कोई वाहन गांव तक नहीं पहुंच सकता, बच्चे स्कूल नहीं जा पाते। बीमार मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते और गर्भवती महिलाओं के लिए हर दिन किसी परीक्षा से कम नहीं होता।
बीमारी का मतलब—जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष
जब शहरों में लोग एम्बुलेंस सेवा की गुणवत्ता पर बहस कर रहे होते हैं, तब गिधेर के लोग आज भी यह सोचकर डरते हैं कि अगर रात में कोई बीमार पड़ गया तो क्या होगा? ग्रामीणों के अनुसार बरसात के दौरान यदि किसी व्यक्ति की तबीयत बिगड़ जाए तो उसे खाट पर लिटाकर नदी पार कराने की कोशिश की जाती है। कई बार तेज बहाव के कारण ऐसा करना भी संभव नहीं होता,गर्भवती महिलाओं की स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है। प्रसव पीड़ा के समय अस्पताल तक पहुंचना किसी युद्ध से कम नहीं होता, कई बार लोग भगवान भरोसे ही हालात का सामना करते हैं।
राशन लेने के लिए भी करनी पड़ती है जान की बाजी
सरकार खाद्यान्न सुरक्षा की बात करती है,लेकिन गिधेर के लोगों के लिए राशन प्राप्त करना भी एक संघर्ष है,ग्रामीण बताते हैं कि राशन लेने के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है,फिर राशन को कंधे पर लादकर नदी पार करनी पड़ती है,बरसात में यह काम और भी खतरनाक हो जाता है, कई बार राशन पानी में भीगकर खराब हो जाता है। लेकिन गरीब परिवारों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं होता,यह विडंबना ही है कि जिस देश में खाद्यान्न वितरण को डिजिटल और पारदर्शी बनाने की बात हो रही है, वहां कुछ लोग आज भी राशन की एक बोरी घर तक लाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं।
प्रधानमंत्री आवास योजना भी बन गई मुसीबत…
गांव के लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ तो मिला, लेकिन घर बनाना भी उनके लिए चुनौती बन गया,निर्माण सामग्री लेकर आने वाले वाहन नदी के पास पहुंचते ही कीचड़ और मलबे में फंस जाते हैं। कई बार पूरा दिन गाड़ी निकालने में लग जाता है,ग्रामीण स्वयं श्रमदान कर वाहनों को निकालते हैं। इसके बाद कहीं जाकर निर्माण सामग्री गांव तक पहुंच पाती है,ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब मूलभूत आवागमन की व्यवस्था ही नहीं है तो विकास योजनाएं जमीन पर कैसे सफल होंगी?
गिधेर अकेला नहीं,पूरा इलाका उपेक्षा का शिकार…
गिधेर की कहानी अकेली नहीं है,चंदहा के समीप स्थित नवाटोला पंचायत के देवतीडांड,हर्राडी और शेराडांड़ गांव भी वर्षों से समस्याओं से जूझ रहे हैं, इन गांवों में सड़कें बदहाल हैं,पेयजल संकट गंभीर है और स्वास्थ्य सुविधाएं नाममात्र की हैं,ग्रामीणों को झरिया और नालों का पानी पीना पड़ता है,हैंडपंपों से निकलने वाला लाल और दूषित पानी बीमारी का कारण बन रहा है,मासूम बच्चों के स्वास्थ्य पर इसका सीधा असर पड़ रहा है,लेकिन जिम्मेदार विभागों की नजर अब तक इन समस्याओं पर नहीं पड़ी।
कांटो गांव—जहां लोकतंत्र तो पहुंचा,विकास नहीं…
बंशीपुर पंचायत का आश्रित ग्राम कांटो इस पूरे क्षेत्र की सबसे मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत करता है,ब्लॉक मुख्यालय से लगभग 70 किलोमीटर दूर बसे इस गांव में मात्र 25 लोग रहते हैं,यहां मतदान केंद्र है, चुनाव के समय अधिकारी और कर्मचारी पहुंच जाते हैं,लोकतंत्र अपना कर्तव्य निभा देता है,लेकिन विकास आज तक रास्ता नहीं ढूंढ पाया,गांव में स्कूल नहीं है,आंगनबाड़ी किराए के कच्चे मकान में संचालित होती है, राशन लेने के लिए ग्रामीणों को 25 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है,आने-जाने में लगभग 60 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है,बरसात में यह गांव भी दुनिया से कट जाता है।
पूर्व विधायक ने दिखाई थी उम्मीद…
ग्रामीणों के अनुसार पूर्व विधायक गुलाब कमरो उन गिने-चुने जनप्रतिनिधियों में रहे जिन्होंने इन सुदूर गांवों तक पहुंचकर लोगों की समस्याएं सुनीं,उनके प्रयासों से नवाटोला और देवतीडांड के बीच एक पुल का निर्माण हुआ तथा दूसरा पुल स्वीकृत होकर निर्माणाधीन है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि जब तक गिधेर में नया पुल नहीं बनता और हर्राडी क्षेत्र में आवश्यक पुल निर्माण नहीं होता, तब तक क्षेत्र की वास्तविक समस्या समाप्त नहीं होगी।
गिधेर की आवाज बने पुष्पेंद्र राजवाड़े
हाल ही में कोरिया जन सहयोग समिति के अध्यक्ष पुष्पेंद्र राजवाड़े गांव पहुंचे और उन्होंने ग्रामीणों की समस्याओं को नजदीक से देखा,उन्होंने कहा कि आधुनिक युग में भी लोगों को ऐसी परिस्थितियों में जीवन जीना पड़ रहा है,यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, उन्होंने प्रशासन के समक्ष इस मुद्दे को उठाने और नए पुल निर्माण की मांग करने का आश्वासन दिया।
राजनीतिक बयान बहुत,समाधान कब?
स्थानीय ग्रामीण नंदकिशोर का कहना है कि 12 वर्षों से केवल आश्वासन ही मिल रहे हैं,कांग्रेस नेता अनित दुबे ने पुल निर्माण के लिए अभियान चलाने की बात कही है, भाजपा नेता समय लाल कमलवंशी ने मुख्यमंत्री को मांग पत्र भेजने की घोषणा की है,वहीं पूर्व जिला पंचायत सदस्य ज्योत्स्ना राजवाड़े ने सांसद और प्रशासन को पत्र लिखकर पुल निर्माण की मांग उठाई है,लेकिन ग्रामीण पूछ रहे हैं कि आखिर पत्रों और बयानों से पुल कब बनेगा?
अब फैसला शासन को करना है…
मानसून दस्तक देने वाला है, कुछ ही दिनों बाद नदी फिर उफान पर होगी, गिधेर फिर टापू बन जाएगा, बच्चे फिर स्कूल से दूर हो जाएंगे, मरीज फिर अस्पताल से कट जाएंगे,गर्भवती महिलाओं की चिंता फिर बढ़ जाएगी,सवाल सिर्फ एक पुल का नहीं है, सवाल उन नागरिकों का है जो आज भी विकास के इंतजार में हैं,सवाल उन आदिवासी परिवारों का है जो हर चुनाव में लोकतंत्र को मजबूत करते हैं लेकिन बदले में उन्हें टूटा पुल, जर्जर सड़क और अधूरी सुविधाएं मिलती हैं,अब देखना यह है कि क्या इस बार शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधि बरसात से पहले कोई ठोस कदम उठाते हैं या फिर गिधेर के लोग एक और वर्ष उसी दर्द,उसी डर और उसी उपेक्षा के साथ बिताने को मजबूर होंगे,क्योंकि 12 वर्षों से टूटा पुल अब केवल कंक्रीट का ढांचा नहीं रह गया है,वह व्यवस्था से जवाब मांगता एक जीवंत प्रश्न बन चुका है—आखिर गिधेर तक विकास कब पहुंचेगा?


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