मुख्य सचिव से की हस्तक्षेप की मांग, कहा- 28 अप्रैल 2026 से पहले के मामलों पर नया कानून लागू करना विधि विरुद्ध
अंबिकापुर,06 जून 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 44 में किए गए संशोधन को लेकर एक नया कानूनी विवाद सामने आया है। अंबिकापुर निवासी अधिवक्ता अशोक दुबे ने मुख्य सचिव, छत्तीसगढ़ शासन को आवेदन भेजकर मांग की है कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता संशोधन अधिनियम-2026 का पालन उसी तिथि से किया जाए, जिस तिथि से इसे राजपत्र में प्रकाशित कर प्रभावशील घोषित किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि सरगुजा संभाग सहित कुछ स्थानों पर संशोधित कानून की ऐसी व्याख्या की जा रही है, जिससे 28 अप्रैल 2026 से पहले के मामलों पर भी इसका प्रभाव डाला जा रहा है, जबकि अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
राजपत्र में स्पष्ट है लागू होने की तिथि
मुख्य सचिव को भेजे गए आवेदन में अधिवक्ता ने उल्लेख किया है कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता संशोधन अधिनियम-2026 की धारा 1(2) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह अधिनियम राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से लागू होगा। अधिनियम का प्रकाशन 28 अप्रैल 2026 को किया गया था। ऐसे में संशोधित प्रावधानों को उसी दिनांक से प्रभावशील माना जाना चाहिए।
अधिवक्ता का तर्क है कि कानून में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि संशोधन को भूतलक्षी (Retrospective) प्रभाव दिया जाएगा। इसलिए 28 अप्रैल 2026 से पूर्व उत्पन्न या लंबित मामलों पर संशोधित प्रावधान लागू नहीं किए जा सकते।
अपील व्यवस्था में हुए बदलाव को लेकर विवाद
आवेदन में कहा गया है कि संशोधन से पहले अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) द्वारा पारित आदेशों के विरुद्ध प्रथम अपील आयुक्त न्यायालय में किए जाने का प्रावधान था। संशोधन के बाद अपीलीय व्यवस्था में परिवर्तन किया गया है।
अधिवक्ता का कहना है कि राजपत्र प्रकाशन की तिथि से पहले आयुक्त न्यायालय में लंबित अपीलों की सुनवाई और निराकरण आयुक्त द्वारा ही किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों को जिला कलेक्टरों के पास भेजना विधि के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
उन्होंने दावा किया है कि सरगुजा संभाग में कुछ मामलों में आयुक्त न्यायालय द्वारा पूर्ववर्ती प्रकरणों को सुनवाई के लिए कलेक्टर न्यायालय भेजे जाने की कार्रवाई की जा रही है, जो संशोधन अधिनियम की भावना और प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।
कानून को भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जा सकता
अशोक दुबे ने अपने आवेदन में विधि के सामान्य सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा है कि किसी भी कानून को तब तक भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जा सकता, जब तक कि विधायिका द्वारा स्पष्ट रूप से ऐसा प्रावधान न किया गया हो।
उन्होंने कहा कि संशोधन अधिनियम-2026 में केवल यह उल्लेख है कि कानून राजपत्र में प्रकाशन की तिथि से लागू होगा। इसलिए उससे पूर्व के मामलों में पुराने प्रावधान ही प्रभावी रहेंगे। यदि शासन की मंशा संशोधन को पूर्व प्रभाव से लागू करने की है, तो इसके लिए अलग से स्पष्ट संशोधन आवश्यक होगा।
शासन से मांगी स्पष्टता
अधिवक्ता ने मुख्य सचिव से अनुरोध किया है कि पूरे प्रदेश में कानून की एकरूप व्याख्या सुनिश्चित की जाए और संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं कि संशोधित अधिनियम केवल 28 अप्रैल 2026 के बाद के मामलों पर लागू होगा। उन्होंने यह भी मांग की है कि जिन मामलों को कथित रूप से संशोधित प्रावधानों के आधार पर कलेक्टर न्यायालयों को भेजा जा रहा है, उनकी प्रक्रिया पर पुनर्विचार किया जाए और आवश्यकता होने पर ऐसे मामलों को पुनः आयुक्त न्यायालय में सुनवाई हेतु भेजा जाए।
कानूनी हलकों में शुरू हुई चर्चा
भू-राजस्व संहिता की धारा 44 में हुए संशोधन और उसके प्रभाव को लेकर अब कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है। अधिवक्ताओं का एक वर्ग मानता है कि किसी भी संशोधन की प्रभावशीलता उसके लागू होने की तिथि से ही मानी जाती है, जबकि प्रशासनिक स्तर पर इसके क्रियान्वयन को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आने की बात कही जा रही है।
अब निगाहें राज्य शासन और राजस्व विभाग पर टिकी हैं कि इस संबंध में कोई स्पष्टीकरण या निर्देश जारी किए जाते हैं या नहीं। यदि शासन स्तर से स्पष्ट मार्गदर्शन जारी होता है, तो प्रदेशभर में लंबित राजस्व अपीलों की सुनवाई प्रक्रिया पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
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