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सूरजपुर@ बीईओ सूरजपुर के लिए क्या आरटीआई कानून सिर्फ सलाह है?

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222 दिन बाद भी नहीं मिली सूचना,डीईओ का आदेश भी पड़ा बेअसर, सूचना का अधिकार अधिनियम की खुलेआम अनदेखी या फिर किसी राज़ पर पड़ा है पर्दा?
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,04 जून 2026(घटती-घटना)।
देश में सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई) इसलिए बनाया गया था ताकि सरकारी कार्यालयों में पारदर्शिता आए,जनता को जानकारी मिले और जवाबदेही तय हो सके। लेकिन सूरजपुर शिक्षा विभाग में जो तस्वीर सामने आ रही है,वह सवाल खड़ा कर रही है कि आखिर आरटीआई कानून की असली हैसियत क्या है? क्या यह सिर्फ आम नागरिकों के लिए एक कागजी अधिकार बनकर रह गया है? सूरजपुर के विकासखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) कार्यालय से जुड़ा एक मामला इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है, आरोप है कि सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी को 222 दिन बीत जाने के बाद भी उपलब्ध नहीं कराया गया, हैरानी की बात यह है कि जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) के स्पष्ट आदेश के बाद भी सूचना नहीं दी गई,अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर यह सिर्फ लापरवाही है या फिर विभागीय संरक्षण का ऐसा कवच, जिसके सामने वैधानिक आदेश भी बेअसर साबित हो रहे हैं?
कार्रवाई होगी या फाइल फिर सो जाएगी?
आवेदक यादवेन्द्र दुबे ने संबंधित जनसूचना अधिकारी के विरुद्ध विभागीय एवं वैधानिक कार्रवाई की मांग की है,साथ ही यह भी संकेत दिया गया है कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो मामला छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग तक ले जाया जाएगा,अब निगाहें जिला शिक्षा अधिकारी और उच्च अधिकारियों पर टिकी हुई हैं,लोग यह जानना चाहते हैं कि क्या आदेश की अवहेलना करने वालों पर कार्रवाई होगी? क्या सूचना तत्काल उपलब्ध कराई जाएगी? क्या जवाबदेही तय होगी? या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों के विशाल कब्रिस्तान में दफन हो जाएगा?
सबसे बड़ा सवाल…
शिक्षा विभाग बच्चों को संविधान, अधिकार और कानून का सम्मान करना सिखाता है, लेकिन यदि उसी विभाग में सूचना के अधिकार अधिनियम का पालन नहीं हो रहा हो, तो फिर आम नागरिक किससे उम्मीद करे? फिलहाल सूरजपुर में एक ही सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है क्या बीईओ सूरजपुर कानून से ऊपर हैं, या फिर सूचना देने से ज्यादा जरूरी सूचना रोककर रखना हो गया है?
24 अक्टूबर 2025 को मांगी गई थी जानकारी
जानकारी के अनुसार आवेदक यादवेन्द्र दुबे ने 24 अक्टूबर 2025 को कार्यालय विकासखंड शिक्षा अधिकारी सूरजपुर में पांच अलग-अलग आरटीआई आवेदन प्रस्तुत किए थे,सूचना का अधिकार अधिनियम स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है कि मांगी गई जानकारी निर्धारित समय सीमा के भीतर उपलब्ध कराई जाए,लेकिन समय बीतता गया और सूचना नहीं मिली, जब निर्धारित अवधि में जानकारी नहीं मिली तो आवेदक ने प्रथम अपील का सहारा लिया।
डीईओ ने दिया आदेश,फिर भी नहीं मिली सूचना
मामले की सुनवाई के बाद जिला शिक्षा अधिकारी अजय कुमार मिश्रा ने 30 जनवरी 2026 को आदेश जारी किया, आदेश में संबंधित जनसूचना अधिकारी हरेन्द्र सिंह को निर्देशित किया गया कि 10 दिनों के भीतर सूचना उपलब्ध कराई जाए,यानि 9 फरवरी 2026 तक जानकारी आवेदक को मिल जानी चाहिए थी,लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि आदेश जारी होने के महीनों बाद भी सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई,अब स्थिति यह है कि मूल आवेदन को 222 दिन और अपीलीय आदेश को 124 दिन से अधिक समय बीत चुका है, फिर भी सूचना का इंतजार जारी है।
क्या बीईओ कार्यालय में डीईओ के आदेश की कोई कीमत नहीं?
प्रकरण ने एक बेहद गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है, जब जिला शिक्षा अधिकारी स्वयं आदेश जारी कर चुके हैं तो फिर उसका पालन क्यों नहीं हुआ? क्या बीईओ कार्यालय में जिला शिक्षा अधिकारी के आदेशों की कोई अहमियत नहीं रह गई है? या फिर ऐसा कोई अदृश्य सुरक्षा कवच है जिसके कारण आदेश फाइलों में ही दम तोड़ देते हैं? शिक्षा विभाग के गलियारों में भी इस मामले को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं,लोग पूछ रहे हैं कि यदि एक वैधानिक आदेश का पालन नहीं हो सकता तो फिर विभागीय अनुशासन का क्या अर्थ रह जाता है?
अनुस्मारक भी हुआ बेअसर
बताया जाता है कि 5 मई 2026 को आवेदक द्वारा अनुस्मारक भी प्रस्तुत किया गया, सामान्यतःअनुस्मारक मिलने के बाद विभाग सक्रिय हो जाते हैं, लेकिन यहां तो मानो चुप्पी ही प्रशासनिक नीति बन गई,न सूचना,न जवाब,न कोई स्पष्टीकरण,और न ही किसी कार्रवाई की जानकारी।
आखिर कौन-सी सूचना है जिसे देने में इतनी परेशानी?
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है,आखिर ऐसी कौन-सी जानकारी है जिसे देने में 222 दिन लग गए? क्या रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं? क्या दस्तावेज गायब हैं? क्या फाइलें नहीं मिल रही हैं? या फिर सूचना देने से कोई ऐसी प्रशासनिक खामी उजागर हो सकती है जिसे विभाग सार्वजनिक नहीं करना चाहता? हालांकि इन सवालों के जवाब विभाग की ओर से अब तक सामने नहीं आए हैं, लेकिन जितनी लंबी देरी होती जा रही है, उतने ही नए सवाल पैदा होते जा रहे हैं।
आरटीआई कानून की आत्मा पर चोट
सूचना का अधिकार अधिनियम केवल एक कानून नहीं है, यह नागरिकों और शासन के बीच पारदर्शिता का पुल है,यह जनता को यह अधिकार देता है कि वह सरकारी कार्यालयों से सवाल पूछ सके और जवाब प्राप्त कर सके, लेकिन जब सूचना देने में महीनों नहीं बल्कि सैकड़ों दिन लग जाएं,तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आरटीआई कानून की आत्मा को ही नजरअंदाज किया जा रहा है? विशेषज्ञों का मानना है कि सूचना को अनावश्यक रूप से लंबित रखना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं,बल्कि जवाबदेही की भावना के विपरीत भी है।


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