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सोनहत (कोरिया)@ स्वच्छता अभियान को ठेंगा

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: सोनहत तहसील और एसडीएम कार्यालय का शौचालय बना बदबूघर
जहां जनता न्याय मांगने आती है,वहां नाक पर रुमाल रखकर गुजरना पड़ रहा
स्वच्छ भारत के पोस्टर चमक रहे,लेकिन शौचालय की हालत देख शर्म से झुक जाएं दावे
-राजन पाण्डेय-
सोनहत (कोरिया),04 जून 2026(घटती-घटना)।
सरकारी दफ्तरों में अक्सर दीवारों पर बड़े-बड़े नारे लिखे दिखाई देते हैं स्वच्छता ही सेवा है,स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत,स्वच्छ परिसर,बेहतर व्यवस्था,लेकिन कोरिया जिले के सोनहत तहसील एवं एसडीएम कार्यालय परिसर में पहुंचते ही यह एहसास हो जाता है कि कुछ नारे केवल दीवारों के लिए होते हैं, जमीन के लिए नहीं। सोनहत तहसील और अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) कार्यालय परिसर में स्थित सार्वजनिक प्रसाधन की स्थिति इन दिनों इतनी बदहाल हो चुकी है कि उसे शौचालय कम और बदबू का स्थायी गोदाम ज्यादा कहा जा रहा है, हालत यह है कि लोग उसके भीतर जाना तो दूर,उसके आसपास से गुजरने में भी कतराने लगे हैं।
दफ्तर में आवेदन देने आएं या गैस मास्क लेकर?
रोजाना सैकड़ों ग्रामीण,महिलाएं,बुजुर्ग और फरियादी विभिन्न प्रशासनिक कार्यों के लिए तहसील और एसडीएम कार्यालय पहुंचते हैं,लेकिन यहां पहुंचने वालों का सबसे पहला सामना व्यवस्था से नहीं,बल्कि बदबू से होता है,ग्रामीणों का कहना है कि शौचालय के आसपास इतनी तीव्र दुर्गंध फैली रहती है कि कुछ देर खड़े रहना भी मुश्किल हो जाता है,कई लोगों को नाक पर रुमाल रखकर निकलना पड़ता है,महिलाओं और बुजुर्गों के लिए स्थिति और भी अधिक परेशान करने वाली है, विडंबना यह है कि जहां से पूरे क्षेत्र के प्रशासनिक आदेश निकलते हैं,वहीं परिसर में बुनियादी स्वच्छता व्यवस्था दम तोड़ती नजर आ रही है।
स्वच्छता अभियान की जमीनी हकीकत
सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर स्वच्छता अभियान चला रही है,पंचायतों से लेकर शहरों तक स्वच्छता रैंकिंग, अभियान और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं,लेकिन यदि प्रशासनिक कार्यालयों की ही यह स्थिति हो तो फिर गांवों और कस्बों को क्या संदेश जाएगा? लोग तंज कसते हुए कहते हैं कि स्वच्छता अभियान की समीक्षा शायद फाइलों में हो जाती है,इसलिए शौचालयों तक पहुंचने की जरूरत महसूस नहीं होती।
पूर्व अधिकारियों के दावों पर भी उठे सवाल
हालांकि वर्तमान एसडीएम ने हाल ही में पदभार संभाला है और लोगों को उनसे व्यवस्था सुधार की उम्मीद है,लेकिन इस बदहाली ने पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं,कार्यालय परिसर में मौजूद यह शौचालय कोई नई समस्या नहीं है,स्थानीय लोगों का कहना है कि लंबे समय से इसकी स्थिति खराब बनी हुई है,ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने कभी इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता महसूस नहीं की? जो अधिकारी सिस्टम और व्यवस्था की दुहाई देते थे,वे अपने ही कार्यालय परिसर की सबसे बुनियादी सुविधा को दुरुस्त नहीं कर पाए।
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में नाराजगी
इस मामले को लेकर स्थानीय नागरिकों में भारी नाराजगी देखी जा रही है,कोरिया जन सहयोग समिति के कार्यकारी अध्यक्ष एवं अधिवक्ता जयचंद सोनपाकर तथा सामाजिक कार्यकर्ता अवध यादव ने इस स्थिति पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है,अधिवक्ता जयचंद सोनपाकर का कहना है कि प्रशासनिक परिसर में इस तरह की बदहाल स्थिति किसी भी दृष्टिकोण से स्वीकार्य नहीं है,दूर-दराज से आने वाले ग्रामीणों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है, उन्होंने मांग की है कि शौचालय की तत्काल सफाई, मरम्मत और नियमित रखरखाव सुनिश्चित किया जाए ताकि आम लोगों को राहत मिल सके।
सबसे बड़ा सवाल
सवाल केवल एक शौचालय का नहीं है,सवाल उस सोच का है जो स्वच्छता को भाषणों और बैठकों तक सीमित रखती है, सवाल उस व्यवस्था का है जो जनता से स्वच्छता की अपेक्षा करती है,लेकिन अपने कार्यालयों की स्थिति देखने का समय नहीं निकाल पाती, अब निगाहें नए एसडीएम और जिला प्रशासन पर टिकी हैं। लोग उम्मीद कर रहे हैं कि इस बदहाल प्रसाधन की स्थिति जल्द सुधारी जाएगी,अन्यथा आने वाले दिनों में लोग यह कहने से भी नहीं चूकेंगे कि सोनहत में स्वच्छता अभियान दीवारों पर चमक रहा है और शौचालयों में दम तोड़ रहा है।


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