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मनेंद्रगढ़@ आदेश का तेल निकल गया या ड्रमों में चला गया?

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प्रशासन बोला…पेट्रोल-डीजल सिर्फ वाहनों में,तस्वीर बोली…साहब! फिर ये ड्रम किस खुशी में खड़े हैं?
फरमानिया पेट्रोल पंप की तस्वीरों ने खड़े किए सवाल,सीसीटीवी कैमरे बता सकते हैं कि आदेश जमीन पर उतरा था या सिर्फ प्रेस नोट में छपा था…
-रवि सिंह-
मनेंद्रगढ़,04 जून 2026 (घटती-घटना)।
सरकारी आदेशों का भी अपना अलग जीवन चक्र होता है, कुछ आदेश फाइल से निकलते हैं,प्रेस नोट तक पहुंचते हैं,अखबारों में छपते हैं और फिर आराम से किसी अलमारी में विश्राम करने चले जाते हैं, कुछ आदेश ऐसे भी होते हैं जो जनता को तो दिखाई देते हैं, लेकिन जिनके पालन की जिम्मेदारी होती है, वे शायद उन्हें केवल पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं।
इन दिनों मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में पेट्रोल और डीजल बिक्री को लेकर जारी एक आदेश चर्चा का विषय बना हुआ है,पश्चिम एशिया संकट की पृष्ठभूमि में छत्तीसगढ़ शासन ने पेट्रोल और डीजल की जमाखोरी रोकने तथा आपूर्ति व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से सख्त निर्देश जारी किए थे, आदेश इतना स्पष्ट था कि उसमें व्याख्या की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी गई,पेट्रोल और डीजल केवल वाहनों की टंकी में दिया जाएगा,डिब्बे,बोतल,जेरीकेन,ड्रम अथवा अन्य किसी पात्र में नहीं,साथ ही चेतावनी भी थी कि नियम तोड़ने वालों पर आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के तहत कार्रवाई की जाएगी, आदेश पढ़कर लगा कि अब तो पेट्रोल पंपों में ऐसा अनुशासन होगा कि यदि कोई खाली बोतल लेकर भी पहुंच जाए तो उसे दूर से ही वापस भेज दिया जाएगा, लेकिन फिर कुछ तस्वीरें सामने आईं,और तस्वीरों ने वह सवाल पूछ लिया,जिसका जवाब अब पूरा जिला जानना चाहता है।
निरीक्षण के आदेश भी थे,फिर निरीक्षण कहां था?
सरकार ने सभी अनुविभागीय अधिकारियों को पेट्रोल पंपों का नियमित निरीक्षण करने के निर्देश दिए थे, संयुक्त जांच टीमों की बात भी कही गई थी,अब यदि तस्वीरें सवाल खड़े कर रही हैं तो स्वाभाविक रूप से अगला सवाल निगरानी व्यवस्था पर उठता है,क्या निरीक्षण हुए? यदि हुए तो क्या देखा गया? यदि देखा गया तो क्या दर्ज किया गया? और यदि कुछ नहीं मिला तो फिर तस्वीरें क्या कह रही हैं?
सबसे बड़ा सवाल अभी भी खड़ा है…
सरकार ने कहा ईंधन केवल वाहनों की टंकी में दिया जाएगा, तस्वीरों में दिखाई दिए ड्रम,अब इन दोनों के बीच जो खाली जगह है,उसी का नाम है—सवाल। और उस सवाल का जवाब किसी प्रेस विज्ञप्ति में नहीं,किसी बयान में नहीं,बल्कि संभवत,पेट्रोल पंप के सीसीटीवी कैमरों में कैद है,अब देखना यह है कि जांच वहां तक पहुंचती है या नहीं,क्योंकि जनता के मन में अभी भी एक ही सवाल घूम रहा है जब आदेश इतना साफ था,तो फिर ड्रमों तक पेट्रोल-डीजल पहुंचा कैसे?
जनता की जिज्ञासा बनाम प्रशासन की चुप्पी
जनता की समस्या यह है कि वह तस्वीर देखती है,प्रशासन की ताकत यह है कि उसके पास रिकॉर्ड होते हैं, इसलिए जनता सवाल पूछती है और प्रशासन जवाब देता है, लेकिन जब सवाल बढ़ जाएं और जवाब न आएं तो चर्चाएं शुरू हो जाती हैं,और जहां चर्चा शुरू होती है,वहां अफवाहें भी जन्म लेती हैं,इसलिए किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए सबसे अच्छा विकल्प पारदर्शिता होता है।
यदि सब वैध था तो बताइए…
यह भी संभव है कि ड्रमों के पीछे पूरी तरह वैध कारण हो,यह भी संभव है कि किसी विशेष अनुमति के तहत कार्य किया गया हो,यह भी संभव है कि तस्वीरों को देखकर जो संदेह पैदा हो रहा है,वह वास्तविकता न हो,लेकिन यदि ऐसा है तो सबसे आसान रास्ता है—तथ्य सार्वजनिक कर दीजिए,अनुमति दिखा दीजिए,रिकॉर्ड दिखा दीजिए,सवाल अपने आप खत्म हो जाएंगे।
तस्वीर में ड्रम हैं,सवाल में दम है…
चैनपुर मार्ग स्थित फरमानिया पेट्रोल पंप की तस्वीरों में कुछ बड़े ड्रम दिखाई दिए,अब ड्रम कोई अपराध नहीं हैं,ड्रम रखना प्रतिबंधित भी नहीं है,लेकिन जब शासन ने स्पष्ट रूप से कहा हो कि किसी पात्र में ईंधन नहीं दिया जाएगा और उसी दौरान पेट्रोल पंप परिसर में ड्रम दिखाई दें,तो सवाल उठना स्वाभाविक है,लोग पूछ रहे हैं क्या ये ड्रम पर्यटन के लिए रखे गए थे? क्या इनमें बारिश का पानी भरना था? क्या इन्हें सजावट के लिए रखा गया था? या फिर इनका कोई ऐसा उपयोग था जिसे जनता नहीं जानती? यही वह जगह है जहां तस्वीरें सवाल पूछती हैं और प्रशासन से जवाब की अपेक्षा करती हैं।
आदेश की भाषा और जमीन की तस्वीर…
खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग का आदेश साफ कहता है कि ईंधन केवल वाहनों की टंकी में दिया जाएगा,इस आदेश का उद्देश्य भी स्पष्ट था,प्रशासन नहीं चाहता था कि बड़ी मात्रा में पेट्रोल-डीजल कहीं संग्रहित किया जाए,क्योंकि संकट के समय सबसे बड़ी समस्या कृत्रिम कमी और जमाखोरी बन जाती है,यानी सरकार कह रही थी गाड़ी लाओ,तेल ले जाओ, लेकिन यदि कहीं ड्रम दिखाई दे जाएं तो फिर सवाल यह उठता है कि आदेश की भावना और जमीनी स्थिति के बीच दूरी कितनी है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि नियम सिर्फ जनता के लिए हैं?
यह सवाल नया नहीं है, हमारे यहां अक्सर नियमों के दो संस्करण देखने को मिल जाते हैं, एक जनता के लिए, दूसरा व्यवस्था के लिए, आम आदमी अगर एक लीटर पेट्रोल बोतल में मांग ले तो उसे नियम समझा दिया जाता है,लेकिन यदि कहीं बड़ी मात्रा में पात्र दिखाई दें तो फिर लोग पूछते हैं कि क्या वहां कोई विशेष नियम लागू था? यही वजह है कि इस मामले ने लोगों की दिलचस्पी बढ़ा दी है।
सीसीटीवी कैमरे सबसे बड़े गवाह
इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प पात्र कोई अधिकारी नहीं है, न कोई कर्मचारी, न कोई शिकायतकर्ता, सबसे बड़ा गवाह है—सीसीटीवी कैमरा, क्योंकि कैमरा न पक्षधर होता है और न विरोधी, उसे न चुनाव लड़ना है, न तबादला कराना है, जो हुआ है, वही रिकॉर्ड किया होगा, यदि जांच एजेंसियां वास्तव में सच्चाई जानना चाहती हैं तो उन्हें फाइलों से ज्यादा कैमरों की तरफ देखना चाहिए, कैमरे बता देंगे—ड्रम कब आए? कौन लाया? क्या उनमें ईंधन भरा गया? यदि भरा गया तो किसके कहने पर? और बाद में वे कहां गए?
जांच फाइल से नहीं, फुटेज से शुरू होनी चाहिए…
अक्सर जांच की शुरुआत कागजों से होती है, फिर फाइलें खुलती हैं, नोटशीट बनती है, स्पष्टीकरण मांगा जाता है,फिर जवाब आता है,फिर जवाब का जवाब आता है,और कई बार मामला इतना लंबा हो जाता है कि मूल प्रश्न ही थक जाता है,लेकिन इस मामले में तकनीक मौजूद है, यदि सीसीटीवी रिकॉर्ड सुरक्षित हैं तो जांच कुछ घंटों में कई दिनों का सच बता सकती है।
और यदि नियम टूटे हैं तो कार्रवाई भी दिखनी चाहिए…
यदि जांच में यह सामने आता है कि आदेशों की अनदेखी हुई है,तो फिर कार्रवाई भी उतनी ही स्पष्ट दिखनी चाहिए जितना स्पष्ट आदेश था,क्योंकि शासन की विश्वसनीयता केवल आदेश जारी करने से नहीं बनती,विश्वसनीयता तब बनती है जब आदेशों का पालन भी सुनिश्चित हो।


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