15वें वित्त आयोग की रकम फर्जी बिलों के सहारे हजम करने का आरोप, हैंडपंप मरम्मत में 40 हजार का खेल चर्चा में…
ग्रामीणों का सवाल…काम जमीन पर नहीं…भुगतान कागजों पर कैसे हो गया?
-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां,03 जून 2026 (घटती-घटना)। गांवों के विकास के लिए सरकार करोड़ों रुपये खर्च करती है। पंचायतों को वित्त आयोग की राशि इसलिए दी जाती है ताकि पेयजल, सड़क, नाली, प्रकाश व्यवस्था और अन्य मूलभूत सुविधाओं को बेहतर बनाया जा सके। लेकिन जब विकास की रकम विकास पर कम और कागजों पर ज्यादा दिखाई देने लगे, तब सवाल केवल एक पंचायत का नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था का बन जाता है। खड़गवां जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत सिघत इन दिनों ऐसे ही आरोपों को लेकर चर्चा में है, आरोप है कि पंचायत में 15वें वित्त आयोग की राशि का उपयोग विकास कार्यों में कम और फर्जी बिलों के सहारे भुगतान निकालने में अधिक किया गया। ग्रामीणों और शिकायतकर्ताओं का दावा है कि कई ऐसे कार्यों का भुगतान कर दिया गया जिनका वास्तविक स्वरूप जमीन पर दिखाई नहीं देता।
हैंडपंप मरम्मत में 40 हजार का भुगतान,ग्रामीणों ने उठाए सवाल
सबसे ज्यादा चर्चा एक हैंडपंप मरम्मत कार्य को लेकर है,आरोप है कि मरम्मत के नाम पर लगभग 40 हजार रुपये की राशि खर्च दिखा दी गई, जबकि ग्रामीणों का कहना है कि मौके पर ऐसा कोई बड़ा कार्य दिखाई नहीं देता जिससे इतनी बड़ी राशि खर्च होने का औचित्य साबित हो सके, गांव के लोगों का सवाल है कि यदि वास्तव में मरम्मत कार्य हुआ था तो उसका तकनीकी परीक्षण कराया जाए और यह बताया जाए कि आखिर कौन-कौन से कार्य किए गए जिन पर इतनी राशि खर्च हुई।
जनपद अधिकारियों की चुप्पी पर भी सवाल-मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि शिकायतें और समाचार सामने आने के बावजूद अब तक किसी ठोस जांच की जानकारी सामने नहीं आई है, यही वजह है कि ग्रामीण अब सवाल पूछ रहे हैं कि क्या पंचायत स्तर के भ्रष्टाचार को जनपद स्तर का संरक्षण प्राप्त है? क्योंकि सामान्य धारणा यह है कि पंचायतों के वित्तीय मामलों की निगरानी जनपद पंचायत के माध्यम से होती है, ऐसे में यदि लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
’प्रसाद’ पहुंच गया तो जांच का डर कैसा?- ग्रामीण क्षेत्रों में एक व्यंग्यात्मक चर्चा अक्सर सुनाई देती है कि यदि ऊपर तक ‘प्रसाद’ पहुंच जाए तो फिर जांच की फाइलें भी आराम करने लगती हैं, सिघत पंचायत को लेकर भी इसी तरह की चर्चाएं चल रही हैं, लोग सवाल पूछ रहे हैं कि यदि शिकायतें निराधार हैं तो जांच कर पंचायत को क्लीन चिट दे दी जाए और यदि शिकायतों में दम है तो दोषियों पर कार्रवाई हो, लेकिन न जांच पूरी हो रही है और न जवाब सामने आ रहा है।
15 वें वित्त आयोग का उद्देश्य क्या था?- छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम और वित्त आयोग की अनुशंसाओं का मूल उद्देश्य पंचायतों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना है ताकि स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों को गति मिल सके, इस राशि से पेयजल, स्वच्छता, प्रकाश व्यवस्था, सामुदायिक सुविधाएं और अन्य मूलभूत कार्य किए जाने हैं, लेकिन यदि यही राशि फर्जी बिलों और संदिग्ध भुगतानों में खर्च होने लगे तो सबसे बड़ा नुकसान ग्रामीणों को ही होता है,जिन्हें विकास का लाभ मिलना चाहिए था।
पुराने काम को नया बताकर निकाली गई राशि?
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि तत्कालीन सरपंच कार्यकाल में स्थापित सबमर्सिबल पंप, सिंटेक्स और पेयजल स्रोतों से जुड़े कार्यों को वर्तमान कार्य बताकर भुगतान निकाला गया, ग्रामीणों का कहना है कि जिन कार्यों को आधार बनाकर राशि निकाली गई, उनमें से कई कार्य पहले ही पूरे हो चुके थे, इसके बावजूद नए कार्यों के नाम पर भुगतान होना कई सवाल खड़े करता है,यदि आरोप सही हैं तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग का गंभीर मामला माना जाएगा।
फर्जी बिलों का खेल या विकास का मॉडल?
सिघत पंचायत को लेकर सबसे बड़ा आरोप यह है कि कई भुगतान बोगस या संदिग्ध बिलों के आधार पर किए गए,ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत में विकास कार्यों का वास्तविक मूल्यांकन किया जाए तो कई भुगतान और मौके की स्थिति में भारी अंतर दिखाई देगा, व्यंग्य में गांव के लोग कहते हैं कि यहां विकास पहले कागजों में होता है और बाद में अगर समय मिला तो जमीन पर उतरता है।
पहले भी उठ चुके हैं सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि यह पहला मामला नहीं है, पंचायत में पहले भी निर्माण कार्यों, जीर्णोद्धार और पेयजल योजनाओं को लेकर सवाल उठते रहे हैं। आरोप लगाए जाते रहे हैं कि कई कार्य कागजों में पूरे दिखाए गए लेकिन मौके पर उनका स्पष्ट अस्तित्व नहीं मिला, यही कारण है कि अब पंचायत के वित्तीय लेन-देन की स्वतंत्र जांच की मांग जोर पकड़ रही है।
अब ग्रामीण कर सकते हैं उच्चस्तरीय शिकायत
मामले को लेकर ग्रामीणों के बीच नाराजगी बढ़ती दिखाई दे रही है,गांव में चर्चा है कि यदि स्थानीय स्तर पर कार्रवाई नहीं होती तो शिकायत जिला पंचायत,कलेक्टर और अन्य उच्च स्तरीय एजेंसियों तक पहुंचाई जाएगी, ग्रामीणों का कहना है कि जांच केवल कागजों की नहीं बल्कि मौके की होनी चाहिए,भुगतान,माप पुस्तिका, बिल,वाउचर और कार्यस्थल का भौतिक सत्यापन कराया जाए ताकि सच्चाई सामने आ सके।
सबसे बड़ा सवाल- सिघत पंचायत में आखिर हुआ क्या?
क्या वास्तव में विकास कार्य हुए और शिकायतें राजनीतिक हैं? या फिर विकास के नाम पर सरकारी धन का बंदरबांट हुआ? इन सवालों का जवाब केवल निष्पक्ष जांच ही दे सकती है, फिलहाल गांव में एक ही चर्चा है विकास जमीन पर हुआ या सिर्फ फाइलों में? और यदि पैसा खर्च हुआ तो उसका लाभ आखिर किसे मिला?
(नोटः समाचार में वर्णित आरोप शिकायतकर्ताओं और ग्रामीणों द्वारा लगाए गए आरोपों पर आधारित हैं,संबंधित सरपंच,सचिव और जनपद अधिकारियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)
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