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कोरिया@ मनरेगा में महक रहा है ‘चंदन’

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भुगतान की फाइलों पर पहले खुशबू फिर दस्तखत!
मनरेगा में चंदन की खुशबू या कमीशन का कमाल? बैकुंठपुर जनपद में भुगतान पर उठे बड़े सवाल
-रवि सिंह-
कोरिया,03 जून 2026 (घटती-घटना)।
मनरेगा का उद्देश्य गांवों में रोजगार देना,मजदूरों को समय पर भुगतान करना और विकास कार्यों को गति देना है,लेकिन बैकुंठपुर जनपद पंचायत में इन दिनों मनरेगा की चर्चा कम और चंदन की खुशबू की चर्चा ज्यादा हो रही है, यह खुशबू किसी इत्र की नहीं है,बल्कि पंचायतों में चल रही उन चर्चाओं की है जिनमें कहा जा रहा है कि यहां फाइलें नियमों से कम और संबंधों से ज्यादा चलती हैं।
जनपद पंचायत के गलियारों में बैठे-बैठे लोग मजाक में कहते हैं कि बैकुंठपुर में मनरेगा की फाइलों का अपना मौसम है,बरसात,गर्मी और ठंड के अलावा यहां एक चौथा मौसम भी चलता है—एफटीओ व एमआईएस सीजन। इस मौसम में पंचायतों के सचिव,सरपंच, रोजगार सहायक और ठेकेदार जैसे लोग जनपद कार्यालय की परिक्रमा करते नजर आते हैं,कोई मजदूरों का भुगतान निकलवाने आया है, कोई निर्माण कार्य का बिल अटका हुआ है,तो कोई महीनों से सिस्टम में फंसी फाइल को ढूंढ रहा है, लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की है, वह है सहायक प्रोग्रामर चंदन सिंह।
मनरेगा का डिजिटल दरबार और उसके कथित दरबान
कहने को मनरेगा एक ऑनलाइन व्यवस्था है,भुगतान प्रक्रिया डिजिटल है,फाइलें पोर्टल पर चलती हैं, अधिकारी डिजिटल हस्ताक्षर करते हैं, सब कुछ पारदर्शी बताया जाता है, लेकिन पंचायत प्रतिनिधियों का आरोप है कि बैकुंठपुर में डिजिटल सिस्टम का भी एक दरबार है और उस दरबार का एक कथित दरबान है, जिसके बिना फाइलों की यात्रा अधूरी मानी जाती है, बताया जाता है कि 120 से अधिक पंचायतों से आने वाली फाइलों की अंतिम मंजिल वही टेबल होती है जहां से एफटीओ और एमआईएस की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, यहीं से शुरू होती है वह कहानी जिसकी चर्चा पंचायत से लेकर चाय की दुकानों तक हो रही है वो भी जनपद कार्यालय के सामने वाले चाय की दुकानों।
नियमों की किताब: गरीब की फाइल में मोटी, अमीर की फाइल में पतली!
पंचायत प्रतिनिधियों के बीच सबसे लोकप्रिय चर्चा यह है कि जनपद कार्यालय में एक अदृश्य नियमों की किताब रखी हुई है,जब कोई पंचायत भुगतान के लिए फाइल लेकर पहुंचती है और व्यवस्था नहीं बन पाती,तब वही किताब अचानक खुल जाती है,फिर उसमें से नए-नए नियम निकलते हैं, कहीं हस्ताक्षर कम हैं,कहीं फोटो स्पष्ट नहीं है,कहीं मस्टर रोल में कमी है,कहीं तकनीकी स्वीकृति का सवाल खड़ा हो जाता है,फाइल वापस,भुगतान लंबित,मजदूर परेशान,सरपंच परेशान,सचिव परेशान लेकिन आरोप लगाने वालों का दावा है कि जैसे ही व्यवस्था बन जाती है,वही किताब चमत्कारिक रूप से बंद हो जाती है, जो कमी कल तक पहाड़ लग रही थी,वह आज राई बन जाती है, जो दस्तावेज कल अधूरे थे, वे अचानक पूर्ण घोषित हो जाते हैं, और फिर भुगतान की गाड़ी ऐसी दौड़ती है जैसे उसे कभी ब्रेक लगाया ही न गया हो।
मजदूर इंतजार में, फाइलें कतार में और भुगतान ‘प्राथमिकता’ में…
मनरेगा की आत्मा मजदूर है,योजना का मूल उद्देश्य मजदूरों को समय पर मजदूरी देना है, लेकिन पंचायत प्रतिनिधियों का आरोप है कि कई बार मजदूरों का भुगतान सप्ताहों और महीनों तक अटका रहता है,मजदूर सरपंच से पूछता है,सरपंच सचिव से पूछता है, सचिव जनपद से पूछता है,और जनपद में जवाब मिलता है प्रक्रिया चल रही है,यह प्रक्रिया इतनी लंबी हो जाती है कि मजदूर को लगता है शायद उसकी मजदूरी दिल्ली से पैदल चलकर आ रही है।
जांच हुई तो कई परतें खुल सकती हैं…
बैकुंठपुर जनपद में चल रही चर्चाओं के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन इन शिकायतों की गंभीर जांच करेगा? क्या यह देखा जाएगा कि किन पंचायतों के भुगतान समय पर हुए और किनके महीनों तक लंबित रहे? क्या एफटीओ और एमआईएस की प्रक्रिया का ऑडिट होगा? क्या यह पता लगाया जाएगा कि भुगतान में देरी के वास्तविक कारण क्या थे? और सबसे महत्वपूर्ण,क्या मजदूरों और पंचायतों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था में सुधार होगा? क्योंकि आखिरकार मनरेगा का पैसा किसी अधिकारी,कर्मचारी या सिस्टम का नहीं,बल्कि गांव के उस मजदूर का है जो शाम को घर लौटते समय अपने बच्चों के लिए राशन खरीदने की उम्मीद करता है,और जब मजदूर की मजदूरी फाइलों में फंस जाती है,तब सबसे ज्यादा जरूरत नियमों की किताब खोलने की नहीं,बल्कि जवाबदेही की किताब खोलने की होती है।
सीईओ से शिकायत कर दी? फिर फोन क्यों किया!
इस पूरे मामले में सबसे रोचक चर्चा उस कथित घटना की है जिसमें एक व्यक्ति ने अपना भुगतान अटकने पर जिला पंचायत सीईओ तक शिकायत पहुंचा दी,शिकायत पहुंचने के बाद संबंधित कर्मचारी का फोन आया,बताया जाता है कि सवाल यह था—सीईओ से फोन क्यों करवाया? सीधे मुझे बोल देते,अब यह सवाल सुनकर लोग भी हैरान हैं, क्योंकि सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था में शिकायत ऊपर के अधिकारी तक इसलिए पहुंचती है ताकि समस्या का समाधान हो सके,लेकिन यहां शिकायतकर्ता को ही जवाब देना पड़ गया कि उसने शिकायत क्यों की, जनपद के गलियारों में इस घटना को लेकर खूब चर्चाएं हो रही हैं।
बस से आते हैं, लेकिन प्रभाव वीआईपी जैसा!
बैकुंठपुर में एक और चर्चा बड़ी लोकप्रिय है,लोग कहते हैं कि देखने में तो सब कुछ बेहद सामान्य है, साधारण जीवनशैली, बस से आना-जाना,कोई बड़ी गाड़ी नहीं, कोई दिखावटी ठाठ-बाट नहीं,लेकिन प्रभाव ऐसा कि पंचायत प्रतिनिधि उनसे मिलने के पहले दस बार सोचते हैं,जनपद में यह भी चर्चा है कि बस स्टैंड से लाने और छोड़ने तक के लिए अलग कर्मचारी लगाया जाता है,अब यह व्यवस्था क्यों है, किस आधार पर है और इसकी प्रशासनिक आवश्यकता क्या है,यह तो जांच का विषय हो सकता है, लेकिन चर्चाओं का बाजार गर्म है।
120 पंचायतें और एक कुर्सी का प्रभाव
बैकुंठपुर जनपद की लगभग 120 पंचायतें मनरेगा से जुड़ी हैं,हर पंचायत में मजदूर हैं, हर पंचायत में विकास कार्य हैं, हर पंचायत में भुगतान की जरूरत है, ऐसे में यदि किसी एक कर्मचारी को लेकर इतनी बड़ी संख्या में शिकायतें सामने आ रही हैं तो सवाल केवल व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था का भी है,क्या पूरी प्रणाली किसी एक व्यक्ति पर अत्यधिक निर्भर हो गई है? क्या कार्यों का उचित विभाजन नहीं है? क्या निगरानी तंत्र कमजोर है? ये वे प्रश्न हैं जिनका जवाब प्रशासन को देना चाहिए।
चंदन की खुशबू या सिस्टम की बदबू?
जनपद कार्यालय में इन दिनों लोग व्यंग्य में कहते हैं कि यहां चंदन इतना महक रहा है कि उसकी खुशबू पंचायतों तक पहुंच रही है,लेकिन सवाल यह है कि यह खुशबू वास्तव में चंदन की है या फिर उस व्यवस्था की बदबू है जिसमें पारदर्शिता कम और प्रभाव ज्यादा दिखाई देता है, यदि आरोप गलत हैं तो उनका खंडन होना चाहिए, यदि आरोप सही हैं तो कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन सबसे खराब स्थिति वह होती है जब आरोप भी चलते रहें और जवाब भी न मिले।
मजदूरों के पैसे पर राजनीति नहीं…पारदर्शिता चाहिए…
मनरेगा कोई निजी कारोबार नहीं है,यह गरीब मजदूरों के हक का पैसा है,यह उन लोगों का अधिकार है जो धूप में सड़क बनाते हैं,तालाब खोदते हैं,नाली बनाते हैं और गांवों का विकास करते हैं,यदि उनके भुगतान में देरी होती है तो उसका सीधा असर उनके परिवार पर पड़ता है,इसलिए भुगतान प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
नोट :- इस समाचार में वर्णित आरोप विभिन्न पंचायत प्रतिनिधियों और सूत्रों द्वारा लगाए गए दावों पर आधारित हैं,संबंधित अधिकारी/कर्मचारी का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।


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