पर्सनल में बात करो,नहीं तो पेपर में छप जाएगा… वायरल चैट ने खोली समाज की अंदरूनी कलह…
सूरजपुर आयोजन के लिए जुटाए गए चंदे पर उठे सवाल… हिसाब मांगने पर शुरू हुई आरोप-प्रत्यारोप की जंग…
-ओंकार पाण्डेय-
कोरिया/सूरजपुर,02 जून 2026 (घटती-घटना)। साहू समाज में इन दिनों सामाजिक एकता से ज्यादा चर्चा सहयोग राशि और उसके हिसाब-किताब की हो रही है,समाज के व्हाट्सऐप ग्रूप में वायरल हो रही बातचीत ने ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं जिनका जवाब अब केवल ग्रुप में इमोजी भेजकर नहीं दिया जा सकता, मामला सूरजपुर में आयोजित एक सामाजिक कार्यक्रम के लिए विभिन्न जिलों से एकत्र की गई सहयोग राशि से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है।
वायरल चैट के अनुसार सूरजपुर जिला साहू समाज के पदाधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से यह सवाल उठाया कि कोरिया जिले से सहयोग राशि अब तक प्राप्त नहीं हुई है, इसके बाद जो संवाद शुरू हुआ उसने पूरे मामले को और विवादित बना दिया,समाज के सदस्य एक-दूसरे से पूछने लगे कि आखिर वह राशि गई कहां,जो समाज के नाम पर लोगों से एकत्र की गई थी? कुछ लोगों ने दावा किया कि कोरिया जिले के विभिन्न क्षेत्रों से कार्यक्रम के लिए सहयोग राशि एकत्र की गई थी,लेकिन वह राशि आयोजन तक नहीं पहुंची।
व्हाट्सएप ग्रुप बना सामाजिक अदालत
आमतौर पर समाज के व्हाट्सएप ग्रुप शुभकामनाओं, श्रद्धांजलि संदेशों और कार्यक्रमों की सूचनाओं से भरे रहते हैं, लेकिन इस बार ग्रुप में सवालों की बौछार शुरू हो गई, सूरजपुर के पदाधिकारियों द्वारा सहयोग राशि नहीं मिलने की बात सामने आने के बाद कई सदस्यों ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की, किसी ने पूछा कि पैसा कहां गया, तो किसी ने हिसाब सार्वजनिक करने की मांग कर दी, मामला तब और रोचक हो गया जब एक सदस्य ने कथित तौर पर लिख दिया कि पर्सनल में बात करो, नहीं तो पेपर में छप जाएगा, बस फिर क्या था, यह एक वाक्य पूरे विवाद का केंद्र बन गया, लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि यदि सब कुछ पारदर्शी है तो फिर सार्वजनिक चर्चा से परहेज क्यों?
चंदा समाज का,हिसाब किसका?
समाज के जानकारों का कहना है कि किसी भी सामाजिक संगठन की सबसे बड़ी पूंजी उसका विश्वास होता है, समाज के लोग कार्यक्रमों के लिए इसलिए सहयोग देते हैं क्योंकि उन्हें भरोसा होता है कि राशि निर्धारित उद्देश्य के लिए खर्च होगी,लेकिन जब स्वयं समाज के भीतर से यह सवाल उठने लगे कि सहयोग राशि आयोजन तक पहुंची या नहीं,तब मामला केवल पैसों का नहीं बल्कि विश्वास का बन जाता है,वायरल संदेशों में कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि कोरिया जिले से लगभग एक लाख रुपये तक की राशि एकत्र की गई थी,हालांकि इस राशि की आधिकारिक पुष्टि अभी तक किसी दस्तावेज से नहीं हुई है।
रसीदें हैं तो हिसाब भी होना चाहिए
सामाजिक संगठनों में चंदा संग्रह कोई नई बात नहीं है, लेकिन चंदे के साथ जवाबदेही भी जुड़ी होती है, यदि राशि एकत्र हुई थी तो उसका लेखा-जोखा होना चाहिए,यदि राशि जमा कर दी गई थी तो उसकी रसीद होनी चाहिए,यदि राशि नहीं पहुंची तो उसका कारण बताया जाना चाहिए, यही वे सवाल हैं जिनका जवाब अब समाज के सदस्य मांग रहे हैं।
समाज के भीतर बढ़ रही पारदर्शिता की मांग
इस पूरे विवाद के बाद समाज के कई वरिष्ठ सदस्यों का मानना है कि भविष्य में किसी भी सहयोग राशि का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए, कई सदस्य यह मांग कर रहे हैं कि जिलेवार सहयोग राशि, जमा राशि और खर्च का पूरा ब्यौरा समाज के सामने रखा जाए ताकि किसी प्रकार की भ्रांति या विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो।
विवाद से ज्यादा चिंता समाज की छवि की
सामाजिक संगठनों का उद्देश्य समाज को जोड़ना होता है, लेकिन जब आरोप और प्रत्यारोप सार्वजनिक मंचों पर आने लगें तो सबसे ज्यादा नुकसान संगठन की साख को होता है, आज सोशल मीडिया और व्हाट्सएप के दौर में कोई भी संदेश कुछ ही मिनटों में सैकड़ों लोगों तक पहुंच जाता है, ऐसे में समाज के भीतर चल रही खींचतान भी अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बन चुकी है।
अब सभी की नजर जवाब पर
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या संबंधित पदाधिकारी इस पूरे मामले पर विस्तृत स्पष्टीकरण देंगे? क्या सहयोग राशि का पूरा हिसाब सार्वजनिक किया जाएगा? और क्या समाज के भीतर उठ रहे सवालों का संतोषजनक जवाब मिलेगा? क्योंकि समाज के लोग अब केवल यह नहीं पूछ रहे कि पैसा आया या नहीं आया, बल्कि यह भी पूछ रहे हैं कि यदि पैसा समाज के नाम पर लिया गया था तो उसका हिसाब समाज को क्यों नहीं दिया गया? जब तक इन सवालों का स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आता, तब तक सहयोग राशि का यह विवाद साहू समाज की बैठकों से लेकर व्हाट्सएप ग्रुपों तक चर्चा का विषय बना रहेगा। और तब तक वह एक वाक्य भी लोगों के बीच गूंजता रहेगा—पर्सनल में बात करो, नहीं तो पेपर में छप जाएगा…।
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