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बैकुंठपुर@टोनही प्रताड़ना से हत्या तक के मामले में चार साल बाद आया फैसला,आरोपी को उम्रकैद

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  • विशेष न्यायालय बैकुंठपुर ने सुनाई आजीवन कारावास की सजा,टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम में भी दोषसिद्धि
  • विशेष न्यायाधीश आशीष पाठक का फैसला,विशेष लोक अभियोजक महेश कुमार शर्मा ने की शासन की ओर से पैरवी


-संवाददाता-
बैकुंठपुर,02 जून 2026 (घटती-घटना)। समाज में अंधविश्वास और टोनही जैसी कुप्रथाओं के कारण होने वाली घटनाएं आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं,कई बार ऐसे अंधविश्वास निर्दोष लोगों की जान तक ले लेते हैं, कोरिया जिले के एक ऐसे ही चर्चित मामले में लगभग चार वर्ष की लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद विशेष न्यायालय बैकुंठपुर ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी उमेश कुमार केवट को हत्या का दोषी ठहराया है,न्यायालय ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई है, साथ ही छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम के तहत भी दोषी मानते हुए पृथक दंड से दंडित किया है,यह फैसला न केवल एक आपराधिक मामले का निष्कर्ष है,बल्कि समाज में व्याप्त अंधविश्वास और कमजोर वर्गों के विरुद्ध होने वाले अपराधों के खिलाफ न्यायिक व्यवस्था का सख्त संदेश भी माना जा रहा है।
2022 की घटना,जिसने
पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था…

न्यायालय में प्रस्तुत अभियोजन कथा के अनुसार 15 सितंबर 2022 की शाम लगभग 5ः30 बजे थाना पोड़ी क्षेत्र के ग्राम चरचा निवासी एक व्यक्ति तालाब में स्नान कर अपने घर लौट रहा था,रास्ते में वह एक मकान के समीप पहुंचा ही था कि आरोपी उमेश कुमार केवट वहां पहुंचा, अभियोजन के अनुसार आरोपी ने चारपहिया वाहन को तेज गति और लापरवाहीपूर्वक चलाते हुए उस व्यक्ति को टक्कर मार दी,टक्कर इतनी गंभीर थी कि पीडि़त सड़क पर गिर गया और गंभीर रूप से घायल हो गया, बाद में उसकी मृत्यु हो गई,घटना के बाद क्षेत्र में सनसनी फैल गई थी,पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी के विरुद्ध हत्या सहित अन्य धाराओं में अपराध दर्ज किया गया।
आजीवन कारावास की सजा- न्यायालय ने आरोपी उमेश कुमार केवट को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी पाते हुए आजीवन कारावास एवं 100 रुपये अर्थदंड से दंडित किया, इसके अतिरिक्त न्यायालय ने छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम की धारा 4 एवं 5 के अंतर्गत भी आरोपी को दोषी माना और क्रमशः एक वर्ष एवं दो वर्ष के कारावास तथा 100-100 रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई,हालांकि भारतीय न्याय व्यवस्था के अनुसार गंभीर अपराध में दी गई प्रमुख सजा प्रभावी रहती है, इसलिए आरोपी को अब आजीवन कारावास भुगतना होगा।
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणी- निर्णय में विशेष लोक अभियोजक महेश कुमार शर्मा द्वारा समाज में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और कमजोर वर्गों के विरुद्ध होने वाले अपराधों पर भी विशेष तर्क प्रस्तुत किए गए, न्यायालय ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि समाज के कमजोर वर्गों को आज भी सामाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक कारणों से अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है,ऐसे वर्गों के सम्मान,गरिमा और अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों का उद्देश्य उन्हें सुरक्षा प्रदान करना है, न्यायालय ने यह भी माना कि सामाजिक पूर्वाग्रह, अंधविश्वास और भेदभाव जैसी प्रवृत्तियां आज भी कई क्षेत्रों में मौजूद हैं, जिन पर नियंत्रण आवश्यक है।
अंधविश्वास के खिलाफ सख्त संदेश
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला केवल एक आरोपी को सजा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि टोनही जैसी कुप्रथाओं के नाम पर किसी व्यक्ति को प्रताडि़त करना या उसके विरुद्ध हिंसा करना गंभीर अपराध है, छत्तीसगढ़ में टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम इसी उद्देश्य से बनाया गया था ताकि महिलाओं और कमजोर वर्गों को अंधविश्वास के नाम पर होने वाले अत्याचारों से संरक्षण मिल सके।
क्षेत्र में चर्चा का विषय बना फैसला
लगभग चार वर्षों तक चले इस मामले में आए निर्णय के बाद क्षेत्र में इसकी व्यापक चर्चा हो रही है, न्यायालय के इस फैसले को अंधविश्वास आधारित अपराधों के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण न्यायिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय स्पष्ट करता है कि यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हों तो न्यायालय कठोरतम दंड देने से पीछे नहीं हटता, चार वर्ष की लंबी सुनवाई के बाद आए इस फैसले ने एक बार फिर यह साबित किया है कि न्यायिक प्रक्रिया भले समय ले, लेकिन जब साक्ष्य और तथ्य न्यायालय के समक्ष स्थापित हो जाते हैं, तब कानून अपना काम करता है और दोषियों को उनके अपराध के अनुरूप दंड मिलता है।
टोनही प्रताड़ना का भी जुड़ा था मामला
मामले की जांच के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि घटना केवल एक सामान्य दुर्घटना या विवाद का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे टोनही संबंधी आरोप और सामाजिक पूर्वाग्रहों का पहलू भी जुड़ा हुआ था, इसी आधार पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के साथ-साथ छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत भी मामला दर्ज किया, बाद में प्रकरण को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के विशेष न्यायालय में विचारण के लिए प्रस्तुत किया गया।
चार वर्षों तक चली न्यायिक प्रक्रिया
मामले की सुनवाई विशेष न्यायालय बैकुंठपुर में हुई, सुनवाई के दौरान शासन की ओर से विशेष लोक अभियोजक महेश कुमार शर्मा ने पैरवी की, अभियोजन पक्ष ने न्यायालय के समक्ष गवाहों, दस्तावेजी साक्ष्यों और परिस्थितिजन्य तथ्यों को प्रस्तुत कर आरोपी के विरुद्ध आरोप सिद्ध करने का प्रयास किया, वहीं बचाव पक्ष ने आरोपी को निर्दोष बताते हुए अभियोजन की कहानी पर सवाल उठाए और साक्ष्यों को चुनौती दी, मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने सभी गवाहों के बयान, दस्तावेजी साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों का विस्तृत परीक्षण किया।
न्यायालय ने माना अभियोजन का पक्ष
विशेष न्यायाधीश आशीष पाठक ने अपने निर्णय में उपलब्ध साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को प्रमाणित करने में सफल रहा है, न्यायालय ने माना कि आरोपी के विरुद्ध प्रस्तुत साक्ष्य पर्याप्त हैं और उसके कृत्य से पीडि़त की मृत्यु हुई, इसी आधार पर न्यायालय ने आरोपी को हत्या का दोषी ठहराया।


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