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रायपुर@पीएससी 2003 घोटाला : भ्रष्टाचार साबित,फिर भी समझौते की बात क्यों?

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  • पीएससी 2003 विवाद में नया मोड़,क्या अब समझौते से दब जाएगा घोटाले का सच?
  • पीएससी घोटाले में फैसला टालने का नया रास्ता या न्याय की नई प्रक्रिया?
  • विशेष लोक अदालत में सुलह की पहल से फिर गरमाया मामला
  • 23 साल बाद भी अधूरा न्याय! पीएससी 2003 घोटाले में अब ‘समझौते’ की पहल पर उठे सवाल
  • 23 साल से लंबित पीएससी घोटाला, क्या फैसले से पहले ही खत्म हो जाएगा पूरा कार्यकाल?
  • हाई कोर्ट ने माना घोटाला,सुप्रीम कोर्ट में आपसी सुलह से सुलझाने की मांग?
  • पीएससी भर्ती घोटालाः न्याय मिलेगा या समय ही बन जाएगा सबसे बड़ा बचाव?
  • भर्ती घोटाले से लेकर बड़े पदों तक…अब लोक अदालत में
  • समाधान की तैयारी 52 अपात्र चयनित,योग्य बाहर…फिर भी 23 साल बाद फैसला अधर में
  • पीएससी 2003ः सिस्टम पर लगे दाग का जवाब कौन देगा?
  • घोटाला प्रमाणित,कार्रवाई अधूरी…आखिर किसे बचा रही लंबी कानूनी प्रक्रिया?


न्यूज डेस्क
रायपुर 13 मई 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित पीएससी 2003 भर्ती घोटाला में एक बार फिर नया मोड़ सामने आया है, करीब दो दशक पुराने इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट की विशेष लोक अदालत के जरिए ‘समाधान’ की कोशिश शुरू हुई है, लेकिन इस पहल ने जितने सवाल हल नहीं किए, उससे कहीं ज्यादा सवाल खड़े कर दिए हैं, सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या यह सच में समाधान की प्रक्रिया है या फिर फैसले को और लंबा खींचने की रणनीति?
2003 का घोटाला,2026 तक अधर में न्याय
छत्तीसगढ़ पीएससी 2003 भर्ती घोटाला राज्य के सबसे चर्चित भर्ती विवादों में गिना जाता है, आरोप लगे थे कि चयन प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी,अंक हेराफेरी,नियमों का उल्लंघन और अपात्र अभ्यर्थियों को फायदा पहुंचाया गया,मामले में मुख्य याचिकाकर्ता वर्षा डोंगरे ने वर्ष 2006 में हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी,लंबी सुनवाई के बाद वर्ष 2017 में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में चयन प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को सही माना था,हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि उत्तर पुस्तिकाओं में गड़बड़ी हुई और नियमों को ताक पर रखकर कई अपात्र उम्मीदवारों को लाभ पहुंचाया गया,कोर्ट ने राज्य सरकार को पूरी चयन सूची संशोधित कर नई सूची जारी करने का आदेश भी दिया था,यही वह फैसला था,जिससे कई प्रभावशाली अधिकारियों की कुर्सियां खतरे में आ गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, फिर वर्षों तक सुनवाई
हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ कई प्रभावित अधिकारियों और चयनित उम्मीदवारों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया,इनमें संजय चंदन त्रिपाठी सहित कई अधिकारी शामिल बताए जाते हैं,सुप्रीम कोर्ट से स्टे मिलने के बाद मामला वर्षों तक लंबित चलता रहा,अब अचानक इस मामले को विशेष लोक अदालत के जरिए ‘आपसी सहमति’ से सुलझाने की पहल ने नई बहस छेड़ दी है, सूत्रों के मुताबिक, याचिकाकर्ता वर्षा डोंगरे समेत अन्य पक्षकारों को समाधान समारोह के लिए बुलाया गया है, मुंगेली और कबीरधाम जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों में उपस्थित होने के नोटिस भी जारी किए गए हैं,लेकिन वर्षा डोंगरे ने साफ शब्दों में कहा है कि इस मामले में समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है। उनका कहना है कि हाई कोर्ट पहले ही उनके पक्ष में फैसला दे चुका है और राज्य सरकार को उस आदेश का पालन करना चाहिए था।
क्या घोटाले से जुड़े अधिकारियों के हाथ में ही प्रशासन?
मामले की सबसे संवेदनशील बात यह है कि जिन अधिकारियों के नाम कभी पीएससी भर्ती विवाद में सामने आए थे, उनमें से कई वर्षों तक महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालते रहे, यही कारण है कि आम लोगों के बीच यह सवाल भी उठता रहा कि आखिर जिन नियुक्तियों पर ही सवाल खड़े हुए, क्या उन्हीं अधिकारियों को जिलों और प्रशासन को चलाने की जिम्मेदारी दी जाती रही? हालांकि अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट के अधीन है और जब तक न्यायालय कोई अंतिम आदेश नहीं देता, तब तक किसी को दोषी मानना कानूनी रूप से उचित नहीं कहा जा सकता।
एसीबी जांच में भी हुई थी पुष्टि
इस मामले को और गंभीर इसलिए माना गया क्योंकि एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) की जांच में भी अनियमितताओं की पुष्टि हुई थी, हाई कोर्ट के आदेश में कई ऐसे नाम सामने आए थे, जिनका चयन कम अंक होने के बावजूद हुआ, वहीं कई पात्र अभ्यर्थी चयन सूची से बाहर कर दिए गए थे, कोर्ट के अनुसार, कुल 52 ऐसे उम्मीदवार थे जो इंटरव्यू के पात्र ही नहीं थे, फिर भी उन्हें चयनित कर लिया गया। वहीं 17 योग्य उम्मीदवार बाहर रह गए थे, यदि हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार दोबारा स्केलिंग कर नई चयन सूची लागू होती, तो दो दर्जन से अधिक अधिकारियों की नियुक्तियां प्रभावित हो सकती थीं। इनमें से कुछ अधिकारी बाद में आईएएस स्तर तक भी पहुंच गए।
23 साल बीते, अब बचे हैं सिर्फ 10 साल…क्या न्याय की प्रतीक्षा में वही भी गुजर जाएंगे?
छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित पीएससी 2003 भर्ती घोटाले को अब 23 साल गुजर चुके हैं, जिन अधिकारियों की नियुक्तियों पर सवाल उठे, उनमें से कई पूरा कार्यकाल निकाल चुके हैं और अब मुश्किल से 8 से 10 साल की सेवा शेष बची है, ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो रहा है कि क्या न्याय की प्रतीक्षा में यह बचा हुआ समय भी निकल जाएगा? मामले में हाई कोर्ट भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को प्रमाणित कर चुका है, एसीबी जांच में भी गड़बडि़यों की पुष्टि हो चुकी है, इसके बावजूद मामला वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। अब विशेष लोक अदालत के जरिए ‘आपसी सहमति’ से समाधान की बात ने पूरे प्रकरण को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा मामला,अब ‘समाधान’ की कोशिश
हाई कोर्ट के फैसले को प्रभावित अधिकारियों और उम्मीदवारों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, इनमें कई ऐसे अधिकारी भी शामिल बताए जाते हैं जो वर्तमान में प्रशासनिक सेवा में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं, सूत्रों के अनुसार, कोरिया के तत्कालीन कलेक्टर संजय चंदन त्रिपाठी तथा वर्तमान एमसीबी कलेक्टर संतन देवी जांगड़े जैसे नाम भी उन प्रभावित अधिकारियों में बताए जा रहे हैं, जिनकी नियुक्तियां इस विवाद से जुड़ी रही हैं, अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा विशेष लोक अदालत के माध्यम से आपसी सहमति से विवाद निपटाने की पहल की जा रही है, इसके लिए वर्षा डोंगरे सहित अन्य पक्षकारों को नोटिस जारी कर उपस्थित होने कहा गया है।
‘समय काटने’ की चर्चा क्यों?
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में एक नई चर्चा तेज हो गई है, सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह पूरी प्रक्रिया केवल समय निकालने की कोशिश है? दरअसल, हाई कोर्ट के फैसले से प्रभावित कई अधिकारी अब अपने करियर के अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं, कुछ सेवानिवृत्ति के करीब हैं, तो कुछ ऊंचे प्रशासनिक पदों तक पहुंच चुके हैं, इसी वजह से यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि यदि मामला लंबा चलता रहा तो कई अधिकारी सेवा समाप्ति तक सुरक्षित रह सकते हैं, यही कारण है कि लोक अदालत के जरिए ‘सुलह’ की कोशिश को लेकर भी संदेह जताया जा रहा है।
घोटाला साबित होने के बाद ‘समझौते’ की गुंजाइश क्यों?
पीएससी 2003 मामला अब किसी दो व्यक्तियों के निजी विवाद का विषय नहीं रह गया है, यह मामला पूरे सिस्टम की पारदर्शिता, भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता और प्रशासनिक ईमानदारी से जुड़ा हुआ है, जब हाई कोर्ट अपने फैसले में चयन प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और नियमों के उल्लंघन की पुष्टि कर चुका है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर अब ‘आपसी सहमति’ किस बात की? क्या भ्रष्टाचार और घोटाले जैसे मामलों का समाधान समझौते से हो सकता है?
क्या समय ही सबसे बड़ा बचाव बन गया?
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर यह चर्चा भी तेज है कि कहीं लंबी कानूनी प्रक्रिया ही सबसे बड़ा बचाव तो नहीं बन गई? 23 वर्षों में कई अधिकारी ऊंचे पदों तक पहुंच गए, कई सेवा के अंतिम दौर में हैं, ऐसे में यदि फैसला आने में और वर्षों लगते हैं, तो क्या वास्तविक जवाबदेही तय हो पाएगी? यही वजह है कि लोक अदालत के जरिए समाधान की कोशिश पर भी सवाल उठ रहे हैं।
यह सिर्फ भर्ती घोटाला नहीं,व्यवस्था पर सवाल है
पीएससी 2003 विवाद ने केवल कुछ नियुक्तियों को नहीं, बल्कि पूरी चयन प्रणाली की विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा किया था, योग्य अभ्यर्थियों का बाहर रह जाना और कम अंक पाने वालों का चयन होना केवल व्यक्तिगत नुकसान नहीं, बल्कि व्यवस्था पर चोट माना गया, इसलिए अब यह मामला केवल नौकरी या पद बचाने का नहीं, बल्कि यह तय करने का भी है कि क्या व्यवस्था में हुए कथित भ्रष्टाचार पर समय के साथ पर्दा डाल दिया जाएगा या फिर जवाबदेही तय होगी।
अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर
करीब 23 साल पुराने इस मामले में अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हुई हैं, एक तरफ प्रभावित अभ्यर्थी वर्षा डोंगरे के साथ न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ चयनित अधिकारी अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है, क्या इतने वर्षों बाद भी पीडि़त अभ्यर्थियों को वास्तविक न्याय मिल पाएगा, या फिर यह मामला भी भारतीय न्याय व्यवस्था में लंबित फाइलों की भीड़ में धीरे-धीरे इतिहास बन जाएगा?
डिस्क्लेमर
यह समाचार विभिन्न न्यायालयीन दस्तावेजों, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सूचनाओं, मीडिया रिपोर्ट्स एवं संबंधित पक्षों के बयानों के आधार पर तैयार किया गया है, पीएससी 2003 भर्ती घोटाला मामला वर्तमान में न्यायालय में लंबित है तथा अंतिम निर्णय माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया जाना शेष है, समाचार में उल्लेखित किसी भी अधिकारी, व्यक्ति या पक्ष को न्यायालय द्वारा अंतिम रूप से दोषी घोषित नहीं किया गया है, समाचार का उद्देश्य केवल जनहित से जुड़े विषयों को प्रस्तुत करना है, किसी व्यक्ति विशेष की छवि धूमिल करना नहीं, यदि किसी पक्ष को समाचार में प्रकाशित तथ्यों पर आपत्ति हो तो उनका पक्ष भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।


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