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बैकुंठपुर/कोरिया@@खनिज शाखा का अमर लिपिक टेकचंद साहू का आदेश बदले, कुर्सी नहीं!

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  • खनिज शाखा का ‘चर्चित बाबू’ आखिर किसके संरक्षण में?
  • तबादला कागजों में, पकड़ अब भी बरकरार!
  • कोरिया कलेक्टोरेट का चर्चित बाबू के हटाने का आदेश आया, असर नहीं
  • खनिज शाखा में आखिर किसका संरक्षण? वर्षों से जमे लिपिक पर फिर सवाल
  • फाइलों में तबादला, हकीकत में वही कुर्सी!
  • ‘अमर लिपिक’ की कहानी में अधिकारी बदले, व्यवस्था नहीं
  • क्या खनिज शाखा में नियमों से ऊपर है ‘प्रभाव’?
  • खनिज शाखा का रहस्यमयी तबादला: आदेश भी आया और गोपनीयता भी रही
  • कलेक्टर बदले, आदेश बदले…पर नहीं बदला खनिज शाखा का चेहरा
  • क्या सिर्फ दिखावे के लिए हुआ तबादला? खनिज शाखा पर उठे बड़े सवाल

-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया,13 मई 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिला मुख्यालय के कलेक्टोरेट में इन दिनों खनिज शाखा के एक चर्चित लिपिक को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है, वर्षों से एक ही शाखा में जमे इस कर्मचारी को लेकर पहले भी कई बार शिकायतें और समाचार सामने आते रहे, लेकिन हर बार मामला ठंडे बस्ते में चला गया, अब जब संबंधित लिपिक का तबादला आदेश सामने आया है, तब यह सवाल और गहरा हो गया है कि आखिर प्रशासनिक व्यवस्था में ऐसा कौन-सा संरक्षण है जिसके चलते आदेश जारी होने के बाद भी कर्मचारी की कार्यशैली और कार्यस्थल में कोई वास्तविक बदलाव नजर नहीं आ रहा।
सूत्रों के अनुसार खनिज शाखा में पदस्थ सहायक ग्रेड-2 टेकचंद साहू का मार्च 2026 में स्टेनो टू कलेक्टर शाखा में तबादला किया गया था,लेकिन अब तक उनके नई शाखा में नियमित रूप से कार्य करने की कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है,चर्चा यह भी है कि कागजों में पदस्थापना बदल दी गई,लेकिन व्यवहारिक रूप से वह अब भी खनिज शाखा के कार्यों से जुड़े हुए हैं, यही वजह है की सरकारी दफ्तरों में अक्सर कहा जाता है कि कुर्सियां स्थायी नहीं होतीं, अधिकारी और कर्मचारी आते-जाते रहते हैं,लेकिन कोरिया जिला मुख्यालय के कलेक्टोरेट परिसर में एक ऐसी कहानी वर्षों से चर्चा का विषय बनी हुई है जिसने इस कहावत को ही चुनौती दे दी है,यहां खनिज शाखा का एक चर्चित लिपिक ऐसा भी है जिसकी कुर्सी मानो सरकारी व्यवस्था से नहीं, बल्कि किसी अदृश्य शक्ति से संचालित होती दिखाई देती है, तबादले हुए, आदेश निकले,खबरें छपीं,चर्चाएं हुईं,आरोप लगे,लेकिन यदि कुछ नहीं बदला तो वह था संबंधित लिपिक का प्रभाव और उसकी मौजूदगी। अब जब मार्च 2026 में जारी तबादला आदेश सामने आया है और यह जानकारी सार्वजनिक हुई कि संबंधित लिपिक को खनिज शाखा से हटाकर स्टेनो शाखा भेजा गया था, तब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर यह बदलाव जमीन पर दिख क्यों नहीं रहा?
नया प्रशासन क्या करेगा?
अब जिले में नए कलेक्टर की पदस्थापना के बाद लोगों की नजर प्रशासनिक कार्यशैली पर टिकी हुई है, लोग उम्मीद कर रहे हैं कि पुराने विवादित मामलों की समीक्षा होगी और केवल कागजों में नहीं बल्कि वास्तविक स्तर पर भी प्रशासनिक आदेशों का पालन सुनिश्चित कराया जाएगा, सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नया प्रशासन इस मामले में स्पष्ट स्थिति सामने लाएगा? क्या संबंधित कर्मचारी वास्तव में नई शाखा में कार्यरत हैं? क्या खनिज शाखा से उनका प्रभाव पूरी तरह समाप्त हुआ? या फिर यह मामला भी धीरे-धीरे फाइलों की धूल में दब जाएगा?
वर्षों से एक ही शाखा में जमे रहने की कहानी
कोरिया जिले में प्रशासनिक हलकों में यदि किसी कर्मचारी की सबसे ज्यादा चर्चा रही है तो उनमें खनिज शाखा के चर्चित लिपिक टेकचंद साहू का नाम प्रमुखता से लिया जाता रहा है, बताया जाता है कि वह वर्षों से जिला खनिज न्यास शाखा में पदस्थ रहे और इस दौरान विभागीय गतिविधियों, फाइलों और प्रक्रियाओं पर उनकी पकड़ लगातार मजबूत होती चली गई, सरकारी व्यवस्था में सामान्यतः संवेदनशील शाखाओं में समय-समय पर कर्मचारियों का स्थानांतरण किया जाता है ताकि किसी एक व्यक्ति का अत्यधिक प्रभाव न बन सके, लेकिन यहां स्थिति कुछ अलग ही नजर आई, दफ्तर के गलियारों में धीरे-धीरे यह चर्चा आम हो गई कि खनिज शाखा की असली स्थायी संपत्ति फाइलें नहीं बल्कि वही चर्चित लिपिक हैं, जिन्हें हटाने की हिम्मत शायद किसी अधिकारी में नहीं दिखाई दी।
अमर लिपिक की उपाधि आखिर क्यों मिली?
स्थानीय स्तर पर प्रकाशित समाचारों में संबंधित लिपिक को अमर लिपिक तक कहा गया। यह उपाधि यूं ही नहीं मिली, दरअसल, वर्षों तक एक ही शाखा में बने रहना, लगातार विवादों में नाम आना, फिर भी प्रशासनिक कार्रवाई का असर न दिखना—इन सबने यह धारणा बना दी कि यह कोई सामान्य कर्मचारी नहीं बल्कि व्यवस्था के भीतर व्यवस्था है, दफ्तरों में मजाकिया लहजे में कहा जाने लगा कि कलेक्टर बदल सकते हैं, शाखा प्रभारी बदल सकते हैं, शासन बदल सकता है, लेकिन खनिज शाखा का यह चेहरा शायद नहीं बदलता, व्यंग्य यह भी किया जाने लगा कि यदि जिला खनिज न्यास शाखा का कोई स्थायी प्रतीक चिन्ह बनाया जाए तो उसमें सरकारी मोहर के साथ इस चर्चित कुर्सी की तस्वीर भी होनी चाहिए।
तबादला आदेश आया…. लेकिन जैसे गुप्त दस्तावेज हो
मार्च 2026 में जारी आदेश के अनुसार टेकचंद साहू, सहायक ग्रेड-2 को डीएमएफ शाखा (खनिज न्यास) से स्टेनो टू कलेक्टर शाखा में स्थानांतरित किया गया, सामान्यतः ऐसे आदेश जारी होते ही संबंधित कर्मचारी नई शाखा में कार्यभार ग्रहण करता है और व्यवस्था आगे बढ़ जाती है, लेकिन यहां मामला अलग ही दिशा में चलता दिखाई दिया, सूत्रों के अनुसार आदेश जारी तो हुआ, लेकिन उसे लेकर ऐसी गोपनीयता बरती गई मानो यह कोई प्रशासनिक आदेश नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा दस्तावेज हो, लंबे समय तक आदेश सार्वजनिक रूप से चर्चा में नहीं आया, अब जब तत्कालीन कलेक्टर का तबादला हो चुका है, तब जाकर यह आदेश सामने आया और सवालों का नया दौर शुरू हो गया।
आखिर आदेश लागू हुआ भी या नहीं?
यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा और सबसे दिलचस्प सवाल है, यदि कर्मचारी का तबादला हो चुका था, तो क्या उसने नई शाखा में कार्यभार ग्रहण किया? यदि किया, तो खनिज शाखा में उसकी भूमिका और प्रभाव की चर्चा अब भी क्यों हो रही है? यदि नहीं किया, तो आदेश जारी करने वाले अधिकारियों ने पालन सुनिश्चित क्यों नहीं कराया? सूत्रों का दावा है कि व्यवहारिक रूप से स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया और संबंधित कर्मचारी का प्रभाव यथावत बना रहा, यानी कागजों में शाखा बदल गई, लेकिन वास्तविकता में व्यवस्था वही रही, सरकारी दफ्तरों में अक्सर कहा जाता है कि फाइल कहीं भी जाए, नियंत्रण वहीं रहता है जहां से व्यवस्था चलती है। इस मामले में भी कुछ ऐसा ही चर्चा का विषय बना हुआ है।
जिले में लंबे समय से जमे कर्मचारियों पर भी उठ रहे सवाल
यह मामला सिर्फ एक कर्मचारी तक सीमित नहीं है, जिले के कई विभागों—राजस्व, शिक्षा, ट्राइबल और खनिज शाखा—में वर्षों से एक ही स्थान पर जमे कर्मचारियों को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं, लोगों का कहना है कि लंबे समय तक एक ही जगह बने रहने से कर्मचारियों का स्थानीय नेटवर्क मजबूत हो जाता है और फिर वही नेटवर्क प्रशासनिक निष्पक्षता को प्रभावित करने लगता है, यही वजह है कि अब लोग मांग करने लगे हैं कि संवेदनशील शाखाओं में नियमित अंतराल पर स्थानांतरण नीति का सख्ती से पालन कराया जाए।
अधिकारियों की चुप्पी ने बढ़ाए सवाल
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा अधिकारियों की चुप्पी को लेकर हो रही है, जब किसी कर्मचारी को लेकर लगातार समाचार प्रकाशित हों, शिकायतें सामने आएं, तबादला आदेश भी जारी हो जाए और फिर भी स्थिति स्पष्ट न हो—तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं, आखिर ऐसा कौन-सा कारण है कि अधिकारी खुलकर स्थिति स्पष्ट नहीं कर पा रहे? क्या वास्तव में किसी स्तर पर संरक्षण प्राप्त है? या फिर प्रशासनिक व्यवस्था इतनी कमजोर हो चुकी है कि आदेश भी वैकल्पिक सुझाव बनकर रह गए हैं?
सवाल सिर्फ एक कर्मचारी का नहीं, व्यवस्था का है
बैकुंठपुर में खनिज शाखा के चर्चित लिपिक का मामला अब केवल एक कर्मचारी के तबादले का विषय नहीं रह गया है, यह प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल बन चुका है, यदि आदेश जारी होने के बाद भी उसका पालन स्पष्ट रूप से नजर नहीं आता, तो जनता के मन में यह धारणा और मजबूत होती है कि सरकारी व्यवस्था में कुछ लोग नियमों से नहीं बल्कि प्रभाव से संचालित होते हैं, अब देखना यह होगा कि नया प्रशासन इस मामले को सिर्फ फाइलों तक सीमित रखता है या वास्तव में व्यवस्था में बदलाव का संदेश देता है।
चोरी की घटना और बढ़ते सवाल
पूर्व में संबंधित लिपिक के निवास में चोरी की घटना भी चर्चा में रही। बताया गया कि घटना के बाद पुलिस में प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई गई, इसी बात को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हुईं। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थिति थी जिसमें चोरी के बाद भी औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई? फिर चर्चाओं ने नया रूप लिया और आय से अधिक संपत्ति को लेकर कानाफूसी शुरू हो गई, हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि कभी नहीं हुई, लेकिन प्रशासनिक गलियारों में यह मामला लंबे समय तक चर्चा का केंद्र बना रहा।
खनिज शाखाः जहां फाइलों से ज्यादा चर्चा प्रभाव की
खनिज शाखा को हमेशा से संवेदनशील माना जाता है। यहां डीएमएफ राशि, खनिज अनुमति, परिवहन, भुगतान और विभिन्न विकास कार्यों से जुड़े बड़े आर्थिक मामलों की फाइलें संचालित होती हैं, ऐसे विभागों में लंबे समय तक एक ही व्यक्ति का बने रहना प्रशासनिक दृष्टि से उचित नहीं माना जाता। क्योंकि धीरे-धीरे विभागीय प्रक्रियाओं पर उसका प्रभाव बढ़ने लगता है, कोरिया जिले में भी यही आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं कि खनिज शाखा में कुछ लोगों की पकड़ इतनी मजबूत हो चुकी थी कि बिना उनकी इच्छा के फाइलों की गति तक प्रभावित होती थी, व्यंग्य में कर्मचारी यह तक कहते सुने गए कि शाखा में पदस्थ अधिकारी भले बदलते रहें, लेकिन असली सिस्टम एडमिन कोई और ही है।

व्यंग्य में उठ रहे तीखे सवाल, इस पूरे मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर व्यंग्य का ऐसा माहौल बना दिया है कि अब लोग तंज कसते हुए पूछने लगे हैं
क्या कोरिया में तबादला आदेश केवल समाचारों के जवाब के लिए जारी होते हैं?
क्या कुछ कुर्सियों पर बैठने वालों को विशेष सुरक्षा कवच मिला हुआ है?
क्या नियम सिर्फ सामान्य कर्मचारियों के लिए हैं?
क्या खनिज शाखा में कुर्सी छोड़ने से पहले किसी अदृश्य अनुमति की आवश्यकता होती है? कुछ लोग तो यह भी कहने लगे हैं कि यदि प्रशासन इस कुर्सी को संरक्षित स्मारक घोषित कर दे तो भविष्य में विवाद ही समाप्त हो जाएगा।


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