Breaking News

सूरजपुर @ बसदेई पीएचसी में आरएमए का कब्जा

Share

  • 10 महीने बाद भी एमबीबीएस डॉक्टर बेप्रभार
  • नियमों को ठेंगा बसदेई स्वास्थ्य केंद्र में आरएमए चला रहा व्यवस्था…डॉक्टर हाशिये पर…
  • अंगद के पांव बना आरएमए का दबदबा,एमबीबीएस डॉक्टर को नहीं मिली जिम्मेदारी
  • स्वास्थ्य केंद्र या निजी तंत्र? बसदेई में आरएमए का राज,सिस्टम बेबस
  • 10 साल से एक ही प्रभारी,बदलते रहे अधिकारी पर नहीं बदली व्यवस्था
  • मरीज परेशान,डॉक्टर बेप्रभार…बसदेई स्वास्थ्य केंद्र पर उठे बड़े सवाल
  • जीवनदीप फंड से लेकर कुर्सी खरीद तक चर्चा,बसदेई पीएचसी विवादों में…
  • क्या अधिकारियों के आगे सिस्टम हुआ नतमस्तक? बसदेई पीएचसी में गहराया विवाद


-शमरोज खान-
सूरजपुर ,30 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)।
सूरजपुर जिले के बसदेई स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र इन दिनों गंभीर विवाद और सवालों के केंद्र में है,यहां की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं, जिनमें सबसे प्रमुख मुद्दा प्रभार को लेकर बना हुआ है। जानकारी के अनुसार,केंद्र में पदस्थ एक एमबीबीएस डॉक्टर को ज्वाइन किए लगभग 10 महीने बीत चुके हैं,लेकिन आज तक उन्हें स्वास्थ्य केंद्र का प्रभार नहीं सौंपा गया है,दूसरी ओर,वर्षों से एक आरएमए (रूरल मेडिकल असिस्टेंट) नियमों के विपरीत प्रभारी के रूप में कार्य कर रहा है और उसका प्रभाव इतना मजबूत बताया जा रहा है कि स्थिति ‘अंगद के पांव’ जैसी बन गई है,जहां बदलाव की कोई गुंजाइश नजर नहीं आ रही।
निरीक्षण या ‘चाय-नाश्ता दौरा’? बसदेई स्वास्थ्य केंद्र में अफसरों की भूमिका पर सवाल
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बसदेई में लगातार सामने आ रही अनियमितताओं और शिकायतों के बीच अब एक और गंभीर पहलू चर्चा में है की अधिकारियों के निरीक्षण का तरीका। स्थानीय स्तर पर यह आरोप लग रहा है कि जब भी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी और खंड चिकित्सा अधिकारी स्वास्थ्य केंद्र का दौरा करते हैं, तो उनकी जानकारी पहले से ही प्रभारी तक पहुंचा दी जाती है, ग्रामीणों और सूत्रों के मुताबिक, निरीक्षण से पहले ही स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी को यह संदेश पहुंच जाता है कि ‘चाय-नाश्ता तैयार रखना।’ ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या यह निरीक्षण वास्तव में व्यवस्था सुधारने के लिए होता है या फिर केवल औपचारिकता निभाने तक सीमित रह जाता है, यदि शिकायतें लगातार मिल रही हैं चाहे वह प्रभार को लेकर हो,मरीजों की परेशानी हो या कार्यप्रणाली में गड़बड़ी तो अपेक्षा की जाती है कि अधिकारी बिना सूचना के औचक निरीक्षण करें, लेकिन यदि निरीक्षण पहले से तय और सूचित हो,तो वास्तविक स्थिति सामने आ ही नहीं सकती, इस तरह के ‘पूर्व सूचना वाले निरीक्षण’ में अक्सर वही दिखाया जाता है जो दिखाना होता है, व्यवस्थाएं अस्थायी रूप से ठीक कर दी जाती हैं,स्टाफ मौजूद दिखता है और कागजों में सब कुछ व्यवस्थित नजर आता है, लेकिन जैसे ही अधिकारी लौटते हैं, स्थिति फिर पहले जैसी हो जाती है, यही कारण है कि अब क्षेत्र के लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि अधिकारियों की जिम्मेदारी आखिर क्या है सिर्फ औपचारिक दौरे कर चाय-नाश्ता करना या फिर स्वास्थ्य केंद्र की वास्तविक स्थिति सुधारना? विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी मानना है कि यदि किसी संस्था में लगातार शिकायतें मिल रही हों,तो वहां औचक निरीक्षण ही सबसे प्रभावी तरीका होता है। इससे न केवल वास्तविक स्थिति सामने आती है, बल्कि जिम्मेदार कर्मचारियों में जवाबदेही का भाव भी विकसित होता है,बसदेई स्वास्थ्य केंद्र का मामला यह संकेत देता है कि निरीक्षण की प्रक्रिया में पारदर्शिता और गंभीरता की कमी है, यदि यही स्थिति बनी रही,तो शिकायतें केवल कागजों तक सीमित रह जाएंगी और जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं होगा।
नियमों के विपरीत व्यवस्था,जिम्मेदार मौन
स्वास्थ्य विभाग के सामान्य नियमों के अनुसार, जहां एमबीबीएस डॉक्टर पदस्थ हों,वहां प्रभार उन्हें दिया जाना चाहिए,लेकिन बसदेई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में यह नियम लागू होता नहीं दिख रहा,स्थानीय लोगों और सूत्रों का कहना है कि आरएमए का दबदबा इतना अधिक है कि जिम्मेदार अधिकारी भी इस व्यवस्था को बदलने में असमर्थ या अनिच्छुक नजर आ रहे हैं, इस स्थिति ने ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर (बीएमओ) और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। लोगों का कहना है कि यदि अधिकारी चाहें तो यह व्यवस्था तुरंत बदली जा सकती है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
जीवनदीप समिति और खर्चों पर उठे सवाल
मामला केवल प्रभार तक सीमित नहीं है, स्वास्थ्य केंद्र में वित्तीय अनियमितताओं को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं,स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि जीवनदीप समिति के पैसों में गड़बड़ी और बंदरबांट हो रही है, इसके अलावा, 40,000 रुपये की कुर्सी खरीदे जाने की चर्चा भी क्षेत्र में जोरों पर है, हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इन चर्चाओं ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है, लोग मांग कर रहे हैं कि इन सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाई जाए।
10 साल से एक ही प्रभारी, नहीं बदली तस्वीर
बसदेई स्वास्थ्य केंद्र में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है, बताया जा रहा है कि पिछले लगभग 10 वर्षों से एक ही व्यक्ति प्रभारी के रूप में कार्य कर रहा है, इस दौरान कई बार सीएमएचओ बदले, कई डॉक्टरों की पदस्थापना हुई, लेकिन स्वास्थ्य केंद्र की कार्यप्रणाली में कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला, लंबे समय तक एक ही व्यक्ति के प्रभारी रहने से न केवल पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं, बल्कि यह भी आशंका पैदा होती है कि कहीं व्यवस्था पर व्यक्तिगत नियंत्रण तो नहीं बन गया है।
एमबीबीएस डॉक्टर को जिम्मेदारी से दूर रखने पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब केंद्र में एमबीबीएस डॉक्टर मौजूद हैं, तो उन्हें प्रभार क्यों नहीं दिया जा रहा, क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही है या इसके पीछे कोई और कारण है? सूत्रों की मानें तो इस स्थिति के कारण स्वास्थ्य सेवाओं के संचालन में असंतुलन की स्थिति बन गई है। योग्य डॉक्टर होने के बावजूद उन्हें निर्णय लेने और व्यवस्था सुधारने का अवसर नहीं मिल रहा।
समय पर नहीं पहुंचते प्रभारी,मरीज परेशान
बसदेई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में मरीजों को होने वाली परेशानियां भी इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू हैं, ग्रामीणों का आरोप है कि प्रभारी समय पर अस्पताल नहीं पहुंचते, जिससे दूर-दराज से आने वाले मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ता है,सुबह से ही मरीज इलाज की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचते हैं,लेकिन डॉक्टर की अनुपस्थिति या देरी के कारण उपचार शुरू नहीं हो पाता, कई बार गंभीर मरीजों को मजबूरी में निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जिससे उन पर आर्थिक बोझ भी बढ़ता है।
ग्रामीणों में बढ़ता आक्रोश
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर क्षेत्र के लोगों में आक्रोश लगातार बढ़ रहा है, ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य केंद्र में बेहतर चिकित्सा सुविधा मिलनी चाहिए,लेकिन वर्तमान स्थिति में उन्हें निराशा ही हाथ लग रही है, लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि एमबीबीएस डॉक्टर को तुरंत प्रभार सौंपा जाए,वर्तमान व्यवस्था की जांच की जाए, मरीजों को समय पर उपचार सुनिश्चित किया जाए।
जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल
इस मामले में सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से अब तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, बीएमओ और सीएमएचओ स्तर पर कार्रवाई का अभाव यह संकेत देता है कि या तो मामले को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, या फिर जानबूझकर अनदेखी की जा रही है, यह चुप्पी कई तरह की आशंकाओं को जन्म देती है और प्रशासन की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती है।
व्यवस्था सुधार की जरूरत
बसदेई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति यह दर्शाती है कि ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में अभी भी कई स्तरों पर सुधार की जरूरत है, यदि समय रहते इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो स्थिति और बिगड़ सकती है और इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ेगा।
सवाल सिर्फ प्रभार का नहीं,पूरी व्यवस्था का…
बसदेई स्वास्थ्य केंद्र का यह मामला केवल प्रभार को लेकर विवाद नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की पारदर्शिता,जवाबदेही और कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है,जब योग्य डॉक्टर होने के बावजूद उन्हें जिम्मेदारी नहीं दी जाती और नियमों की अनदेखी की जाती है,तो यह व्यवस्था पर अविश्वास पैदा करता है,अब यह देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले में क्या कदम उठाता है और क्या वास्तव में बसदेई स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति में सुधार होता है या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाता है।


Share

Check Also

कोरिया/सूरजपुर@ सुप्रीम कोर्ट में ‘केविएट’ दायर करेगा छत्तीसगढ़ टीचर्स एसोसिएशन

Share शिक्षकों से नहीं लिया जाएगा कोई आर्थिक सहयोगशिक्षकों के हित में बड़ा निर्णय,सुप्रीम कोर्ट …

Leave a Reply