- विकास की ड्रिलःगैस पाइप के नीचे दबा राष्ट्रीय राजमार्ग
- सुविधा की कीमतःक्या सड़कें अब बलि का बकरा हैं?
- पटना का राजमार्ग या प्रयोगशाला? विकास का अंडरग्राउंड मॉडल
- राजमार्ग पर गड्ढे और व्यवस्था में सन्नाटा…विकास का भूमिगत प्रयोग,सतह पर उभरे सवाल
- ‘विकास’ की नई परिभाषा ने जन्म लिया गैस पाइप के लिए सड़क की बलि!
- कोरिया के पटना राष्ट्रीय राजमार्ग पर विकास का ‘ड्रिल मॉडल’

-रवि सिंह-
कोरिया/पटना,06 मार्च 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले के पटना नगर पंचायत में इन दिनों विकास अपने नए रूप में दिखाई दे रहा है,पहले सड़क बनती थी,फिर सुविधा आती थी,अब सुविधा आती है,और सड़क चली जाती है, राष्ट्रीय राजमार्ग जिसे बनने में वर्षों की फाइलें,करोड़ों की लागत और जनता की उम्मीदें लगती हैं वही आज गैस पाइपलाइन की ‘भूमिगत महत्वाकांक्षा’ के आगे नतमस्तक दिख रहा है,जहां अधिकांश जगहों पर पाइप लाइन सड़क के किनारे से निकाली गई,वहीं पटना शहर के भीतर इसे राष्ट्रीय राजमार्ग के नीचे से ले जाया गया जिसका नतीजा? कहीं सड़क उभरी हुई है,कहीं दरारें हैं,कहीं गड्ढे ऐसे कि मानो धरती भी सोच में पड़ गई हो की ‘मुझसे पूछ तो लेते! ‘ बता दे की कोरिया जिले के पटना नगर पंचायत में इन दिनों विकास का एक नया अध्याय लिखा जा रहा है फर्क सिर्फ इतना है कि यह अध्याय कागज़ पर नहीं,राष्ट्रीय राजमार्ग की सतह पर उकेरा जा रहा है, गैस पाइपलाइन बिछाने के नाम पर सड़क के नीचे मशीनें चलीं और ऊपर सड़क ने उभरकर मानो विरोध दर्ज करा दिया,राष्ट्रीय राजमार्ग कोई साधारण सड़क नहीं होता। यह किसी क्षेत्र की आर्थिक,सामाजिक और प्रशासनिक जीवनरेखा है, इसे बनाने में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं,वर्षों की प्रक्रिया लगती है,और तब जाकर जनता को एक सुगम मार्ग मिलता है। ऐसे में यदि किसी नई सुविधा के लिए उसी मार्ग को जोखिम में डाल दिया जाए,तो यह विकास नहीं बल्कि असंतुलन की कहानी बन जाती है।
करोड़ों की सड़क बनाम ‘सुविधा का जोश
राजमार्ग बनने में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं,जनता टैक्स देती है, सरकार बजट देती है, तब जाकर एक अच्छी सड़क नसीब होती है, और अब,गैस पाइपलाइन बेचकर सुविधा देने की जल्दी में सड़क की हालत ऐसी कर दी गई है जैसे विकास का रिहर्सल चल रहा हो,सवाल सीधा है की क्या पाइपलाइन बिछाने वाली कंपनी सड़क को दोबारा उसी गुणवत्ता में बनाएगी? क्या जुर्माना लगेगा? या फिर ‘काम हो गया’ मानकर सब आगे बढ़ जाएंगे?
संतुलित विकास या संतुलन बिगाड़ विकास?
गैस पाइपलाइन बुरी नहीं है,स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में कदम है,लेकिन विकास का मतलब यह नहीं कि एक सुविधा की नींव दूसरी सुविधा को कमजोर कर दे,यदि सड़क की उम्र घट गई, दुर्घटना का खतरा बढ़ गया और विभाग मौन रहा—तो यह विकास नहीं, व्यवस्था की व्यंग्य कथा बन जाएगी।
विकास का नया फॉर्मूला
एक सुविधा दो,दूसरी सुविधा को दांव पर लगा दो,कहते हैं कि आधुनिक तकनीक से काम हुआ है,मशीनें आईं,ड्रिलिंग हुई,पाइप नीचे गया…और सड़क ऊपर से फूल गई, ऐसा लगता है जैसे राजमार्ग भी कह रहा हो-‘मुझे गैस नहीं,आराम चाहिए!’गैस पाइपलाइन निस्संदेह आधुनिक सुविधा है,स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में यह आवश्यक कदम है,परंतु सवाल सुविधा का नहीं,उसके क्रियान्वयन का है,जहां अधिकांश स्थानों पर पाइपलाइन सड़क के किनारे से डाली गई,वहीं पटना शहर के भीतर इसे राजमार्ग के नीचे से ले जाने का निर्णय क्यों लिया गया? क्या यह तकनीकी मजबूरी थी या प्रशासनिक सुविधा? आज सड़क पर उभार हैं,दरारें हैं,गड्ढों की आशंका है। कल यदि कोई दुर्घटना होती है,तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
अनुमति की फाइल भी भूमिगत?
भारत में राष्ट्रीय राजमार्गों का रखरखाव और अनुमति प्रक्रिया सामान्यत, National Highways Authority of India (NHAI) के अधीन होती है, नियम कहते हैं कि पहले अनुमति, फिर तकनीकी मानक,और अंत में सड़क को पूर्व स्थिति में बहाल करना अनिवार्य,लेकिन यहां जनता पूछ रही है की क्या अनुमति भी पाइपलाइन के साथ जमीन के नीचे चली गई? या विभागीय चुप्पी ही नया प्रशासनिक मॉडल है?
खतरे की घंटी
आज सड़क उभरी है,कल धंस भी सकती है, जहां खुदाई हुई है,वहां अचानक गड्ढा बन जाए तो हादसे की जिम्मेदारी कौन लेगा? सड़क कोई निजी आंगन नहीं है कि खराब हुई तो झाड़ू लगाकर ठीक कर लेंगे। यह राष्ट्रीय राजमार्ग है क्षेत्र की आर्थिक धड़कन।
जनता का अंतिम सवाल
पटना की जनता पूछ रही है की क्या गैस की लौ जलाने के लिए सड़क की चमक बुझानी जरूरी थी? विकास तब सार्थक होता है जब वह जोड़ता है, तोड़ता नहीं,अन्यथा इतिहास में इसे ‘ड्रिल वाला विकास मॉडल’ के नाम से याद किया जाएगा।
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