
- जनता का सवाल,होली के रंग में डूबी जनता पूछ रही है…
- क्या राज्यसभा की सीटें भी रंग एक्सचेंज ऑफर में चलती हैं?
- क्या छत्तीसगढ़ में स्थानीय नेताओं की कमी है?
- या फिर यह राष्ट्रीय रणनीति का सुपरफास्ट संस्करण है?
(घटती-घटना होली विशेष व्यंग्य) होली आई नहीं कि सियासत में रंग घुल गया,इस बार रंग थोड़ा खास है, सीधा रायपुर से दिल्ली तक उड़ रहा है,पूर्व उप मुख्यमंत्री टी. एस. सिंहदेव ने होली से पहले ही एक नई पिचकारी भर ली है,दिग्विजय सिंह को छत्तीसगढ़ से राज्यसभा भेजना मेरा लक्ष्य है! अब यह साधारण रंग नहीं है,यह रणनीतिक गुलाल है।
परंपरा का रंग-लोकल नहीं,नेशनल
सिंहदेव जी का कहना है कि कांग्रेस की पुरानी परंपरा रही है, राज्यसभा सीट पर स्थानीय नहीं,राष्ट्रीय चेहरा! मतलब होली में भी वही रंग चलेगा जो दिल्ली से आए,जनता पूछ रही है,हमारे राज्य की सीट है या ट्रांजिट कैंप? पर जवाब साफ है-परंपरा है भाई,परंपरा! राजनीति में परंपरा वही होती है जो वक्त के हिसाब से काम आ जाए।
भूपेश वाला रंग फीका या पक्का?
सिंहदेव ने दावा कर दिया-भूपेश भी असहमत नहीं होंगे। अब यह होली का सबसे दिलचस्प रंग है,राजनीति में मतभेद ऐसे होते हैं,जैसे सूखा रंग – ऊपर से अलग-अलग,पर पानी पड़ते ही एक हो जाते हैं,तो क्या यह नई एकजुटता का गुलाल है? या होली का अस्थायी मेल-मिलाप?
दिग्विजय की एंट्री-छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस…
दिग्विजय सिंह जी के लिए यह नया टिकट है, गंतव्यः छत्तीसगढ़ राज्यसभा, राजनीति में सीट वही होती है जहाँ समीकरण फिट बैठ जाए,जैसे होली में जिसके पास रंग कम पड़ जाए वो पड़ोसी के घर से भी ले आता है।
अंतिम पिचकारी
होली सिखाती है,रंग मिलाओ,दिल मिलाओ। राजनीति सिखाती है सीट मिलाओ,समीकरण मिलाओ,अब देखना यह है कि यह राज्यसभा का रंग होली के बाद भी टिकेगा या पानी पड़ते ही उतर जाएगा। क्योंकि सियासत की होली में रंग से ज्यादा रंग बदलना मायने रखता है।
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