(घटती-घटना होली विशेष व्यंग्य)।
होली है! ढोल बज रहे हैं…गुलाल उड़ रहा है…और राजनीति में फिर वही पुराना नारा-सबका साथ,सबका विकास! जनता पूछ रही है-भाई,विकास कहाँ है? जवाब आता है-रुको…अभी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखेगा!
विकास का ‘व्हीआईपी कलर पैक’
गांव की टूटी सड़क पूछ रही है-मेरा रंग कब चढ़ेगा? अस्पताल का खाली वार्ड कह रहा है-मेरे लिए भी कोई गुलाल बचा है? युवा बेरोजगार खड़ा है-मेरी पिचकारी में नौकरी कब भरेगी? पर उधर नेताओं की होली अलग है-टिकट का रंग, पद का रंग, बोर्ड-निगम का रंग और सबसे गाढ़ा… संभावनाओं का रंग!
अगली होली का ‘मुख्यमंत्री रंगोत्सव’?
चौपालों में उड़ती खबरें भी इस बार गुलाबी नहीं, केसरिया हो गई हैं, कहा जा रहा है की अगर अगली बार भाजपा की सरकार आई तो पिछड़ा वर्ग से श्याम बिहारी जायसवाल मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में उभर सकते हैं, राजनीति में होली से पहले ही रंगों की बुकिंग हो जाती है, समीकरण ऐसे बनते हैं जैसे रंग घोलते वक्त पानी का संतुलन-ज्यादा हुआ तो फीका,कम हुआ तो दाग पक्का! जनता सोचती है की हमें तो बस इतना बता दो कि अगली बार हमारी गली का नाला भी बनेगा या सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी रंगेगी?

बैकुंठपुर से राजभवन तक की ‘रंग यात्रा’?
होली के हंसी-मजाक में एक और चर्चा है की बैकुंठपुर विधायक भईया लाल राजवाड़े को खाली राज्यपाल पदों पर मौका मिल सकता है,राजनीति की होली में आज विधायक,कल मंत्री, परसों राज्यपाल-यहाँ रंग बदलने की रफ्तार गिरगिट से भी तेज होती है, जनता पूछती है-हमारी तकदीर कब बदलेगी? नेता कहते हैं-पहले हमारी जिम्मेदारी बदलने दो!

वर्तमान सरकार का ‘मूल मंत्र’
मूल मंत्र क्या है? विकास? संतुलन? या फिर-जो ज्यादा रंग लगाए,वही आगे बढ़ाए? सरकार कहती है-हमने सबका विकास किया। जनता कहती है-ठीक है,दिखा दो। सरकार कहती है-पोस्टर देख लो। जनता कहती है- जमीन देख लेते हैं?
बजट की होली
बजट आता है…घोषणाएं उड़ती हैं…तालियां बजती हैं… और अगले साल फिर वही सवाल- कहाँ गया रंग? कभी-कभी लगता है विकास भी होली के रंग जैसा है-पहले दिन गाढ़ा, दूसरे दिन हल्का, तीसरे दिन गायब।
जनता की ‘सूखी होली’
नेताओं की होली-मिठाई,मंच,मीडिया और मुस्कान, जनता की होली-महंगाई,बेरोजगारी और इंतज़ार। वो इंतज़ार कि कभी तो ऐसा रंग आएगा जो सिर्फ भाषण में नहीं,जि़ंदगी में भी दिखेगा।
अंतिम पिचकारी
होली का त्योहार कहता है-सब बराबर हैं, राजनीति कहती है-बराबर? चुनाव तक! इस बार जब रंग लगाएँ, तो एक सवाल भी पूछें-अगली होली तक,क्या विकास सिर्फ पोस्टर पर रहेगा या सच में हमारी गली तक आएगा?
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