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कोरिया @कोरिया महोत्सव की रोशनी में छुपा अंधेरा..भीड़ बुलाई, फिर ग्रामीणों को भगवान भरोसे छोड़ा

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  • तालियाँ बजवाकर ‘डीजल खत्म’ः महोत्सव खत्म होते ही प्रशासन की संवेदनशीलता भी हुई रवाना
  • भीड़ जुटी,मंच सजा…पर घर लौटने को तरसे वनांचल के ग्रामीण—जिम्मेदार कौन?
  • महोत्सव में विकास के भाषण,बाहर भूखे-प्यासे भटकते बच्चे—कोरिया प्रशासन कटघरे में…
  • हेलीकॉप्टर उड़ा,व्यवस्था भी उड़ गईः कोरिया महोत्सव बना कुप्रबंधन का आईना…
  • ‘आओ तालियाँ बजाओ,फिर अपने हाल पर जाओ’—कोरिया महोत्सव पर बड़ा सवाल


रवि सिंह
कोरिया 18 फरवरी 2026 (घटती-घटना)। तीन दिवसीय ‘कोरिया महोत्सव’ का शुभारंभ रोशनी, रंगमंच और भाषणों की ऊँची उड़ान के साथ हुआ, मंच सजा, कैमरे चमके, तालियों की गड़गड़ाहट गूंजी और विकास के वादों ने आसमान छू लिया, मुख्य अतिथि के रूप में प्रदेश के मुखिया विष्णु देव साय की उपस्थिति ने आयोजन को और भव्य बना दिया, लेकिन महोत्सव की चमक जब शाम के अंधेरे में ढली, तब स्टेडियम के बाहर एक दूसरी कहानी शुरू हुई—वो कहानी जो मंच की रोशनी में नहीं दिखती, पर प्रशासन की साख पर गहरा साया छोड़ जाती है।
भीड़ प्रबंधन या भीड़ प्रदर्शन? सूत्रों के अनुसार, सोनहत वनांचल के दूरस्थ ग्राम मधला और पुसला सहित कई गांवों से ग्रामीणों को बसों में भरकर कार्यक्रम में लाया गया, बताया गया कि ‘विकास की तस्वीर’ दिखानी है, ‘ऐतिहासिक आयोजन’ का हिस्सा बनना है, ग्रामीण आए—महिलाएं आईं, बुजुर्ग आए, बच्चे आए, तालियाँ भी बजीं। मंच से विकास की गाथाएं भी सुनाई गईं, फिर हेलीकॉप्टर उड़ा… और कथित तौर पर व्यवस्थाओं की हवा भी साथ उड़ गई।
डीजल खत्म है, किराया खुद दो ‘—व्यवस्था का नया मॉडल? जब कार्यक्रम समाप्त हुआ और ग्रामीणों ने वापसी के लिए बसों का रुख किया, तो आरोप है कि जवाब मिला— ‘बस में डीजल नहीं है, अपने खर्चे से किराया दो।’ अब यह स्पष्ट नहीं कि डीजल सचमुच खत्म था या संवेदनशीलता, लेकिन इतना जरूर था कि ग्रामीणों की जेब पहले से ही खाली थी, वे किसी सैर-सपाटे पर नहीं आए थे; उन्हें बुलाया गया था, ऐसा लगा मानो महोत्सव का असली संदेश यही था— ‘आओ, तालियाँ बजाओ… और फिर अपने भरोसे घर जाओ। ‘
भूखे-प्यासे इंतजार में बीती शाम- शाम ढली,रोशनी कम हुई,मंच सिमटा, लेकिन बसों के पास खड़ी महिलाएं और बिलखते बच्चे वहीं रहे, न भोजन की व्यवस्था, न पानी का इंतजाम,न स्पष्ट सूचना, वनांचल से आए इन ग्रामीणों के लिए जिला मुख्यालय की भीड़ एक भूलभुलैया बन गई, उत्सव के अंदर ‘सांस्कृतिक कार्यक्रम’ चल रहे थे, बाहर ‘संवेदनहीनता का लाइव प्रदर्शन’।
जब प्रशासन मौन, तब समाजसेवा सक्रिय- इस बीच जनहित संघ के केंद्रीय उपाध्यक्ष एस.के. रूप मौके पर पहुंचे, उन्होंने ग्रामीणों के लिए नाश्ता और जलपान की व्यवस्था कराई तथा बस किराए की राशि उपलब्ध कराकर उन्हें सुरक्षित गांव रवाना कराया, यानी जहां सरकारी तंत्र ‘महोत्सव मोड’ में था, वहां नागरिक पहल ने स्थिति संभाली।
सवाल जो तालियों में दब गए…
– यदि बसों का अधिग्रहण हुआ था, तो वापसी की योजना कहां थी?
– क्या भीड़ जुटाना ही अंतिम लक्ष्य था?
– क्या ग्रामीण केवल फोटो फ्रेम की पृष्ठभूमि थे?
महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी?- कहा जाता है कि बड़े आयोजनों में छोटी चूकें हो जाती हैं, पर जब ‘छोटी चूक’ भूखे-प्यासे भटकते बच्चों और असहाय महिलाओं में बदल जाए, तो वह चूक नहीं, चरित्र का प्रतिबिंब बन जाती है।
उत्सव बनाम उत्तरदायित्व- ‘कोरिया महोत्सव’ का उद्देश्य जिले की सांस्कृतिक पहचान और विकास को प्रदर्शित करना था, लेकिन यदि आयोजन के बाद वही लोग असहाय छोड़ दिए जाएं जिनके नाम पर विकास के दावे किए जाते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है, व्यंग्य यही है कि मंच पर ‘समावेशी विकास’ की बातें हुईं और मंच के बाहर ‘समावेशी उपेक्षा’ का प्रदर्शन, अब देखना यह है कि प्रशासन इस घटना को ‘समन्वय की कमी’ कहकर फाइलों में दबा देता है या जिम्मेदारी तय कर वास्तविक सुधार की पहल करता है, क्योंकि उत्सव की असली परीक्षा रोशनी में नहीं,अंधेरे में होती है।


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