
अपनों को मंच,निर्वाचित चेहरों की उपेक्षा-आमंत्रण पत्र से उठा प्रशासनिक तूफान
एमसीबी,14 फरवरी 2026 (घटती-घटना)। प्रकृति, पर्यटन और संस्कृति के संगम के रूप में पहचान बना चुका अमृतधारा महोत्सव इस बार अपनी सांस्कृतिक आभा से अधिक प्रशासनिक विवादों को लेकर सुर्खियों में है, जिस आयोजन को जन-भागीदारी और स्थानीय लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का प्रतीक होना चाहिए था,वह एक आमंत्रण पत्र की चूक से राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है,आरोप है कि जिला प्रशासन द्वारा जारी आमंत्रण पत्र में कई निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के नाम शामिल नहीं किए गए, जिससे लोकतांत्रिक मर्यादा और प्रोटोकॉल पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
जिस आंगन में मेला,उसी की ‘मुखिया’ का नाम गायब- सबसे बड़ी आपत्ति इस बात को लेकर है कि जिस लाई ग्राम पंचायत की भूमि पर अमृतधारा महोत्सव का आयोजन हो रहा है, वहां की संवैधानिक प्रमुख सरपंच सोनकुंवर का नाम आमंत्रण पत्र में नहीं है,ग्रामीण स्वशासन व्यवस्था में सरपंच प्रथम नागरिक माने जाते हैं। ऐसे में उनका नाम आमंत्रण पत्र से गायब होना केवल एक व्यक्ति की अनदेखी नहीं, बल्कि पूरे ग्राम पंचायत और उसके मतदाताओं के सम्मान से जुड़ा प्रश्न बन गया है, स्थानीय लोगों का कहना है कि बड़े आयोजनों में संबंधित पंचायत प्रतिनिधियों को आमंत्रण में प्रमुख स्थान दिया जाता है, फिर यहां यह चूक कैसे हो गई?
जिला पंचायत उपाध्यक्ष और जनपद सदस्यों की उपेक्षा- आमंत्रण सूची से जिला पंचायत उपाध्यक्ष और जनपद पंचायत सदस्यों के नाम भी गायब बताए जा रहे हैं, राजेश साहू, जिला पंचायत उपाध्यक्ष, ने इसे निर्वाचित पद की गरिमा का अपमान बताया है, उनका कहना है कि यह केवल व्यक्तिगत अनदेखी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की अवमानना है, उन्होंने कहा कि यदि प्रशासन निर्वाचित प्रतिनिधियों को ही नजरअंदाज करेगा, तो जनप्रतिनिधित्व की भावना कमजोर होगी।
प्रोटोकॉल बनाम प्रशासनिक सुविधा- अमृतधारा महोत्सव केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि जिले की पहचान और पर्यटन का महत्वपूर्ण अवसर है। ऐसे आयोजनों में प्रोटोकॉल का पालन अपेक्षित माना जाता है, स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि आमंत्रण सूची में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को स्थान नहीं दिया गया, तो यह या तो प्रशासनिक लापरवाही है या फिर स्थानीय राजनीतिक समीकरणों का असर, कई लोग इसे ‘अपनों को मंच और दूसरों को किनारा’ की रणनीति के रूप में भी देख रहे हैं।
भाषा और औपचारिकता पर भी सवाल- विवाद केवल नामों तक सीमित नहीं रहा। आमंत्रण पत्र में पते के लेखन को लेकर भी व्याकरणिक त्रुटि सामने आई है, कार्ड में ‘अमृतधारा ग्राम पंचायत – लाई’ लिखा गया, जबकि शुद्ध प्रारूप ‘अमृतधारा, ग्राम पंचायत लाई’ होना चाहिए था, इससे यह संकेत मिलता है कि आयोजन की औपचारिकता और भाषाई शुद्धता पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।
राजनीतिक संकेत या साधारण भूल?
प्रशासन की ओर से अब तक कोई विस्तृत स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। ऐसे में यह विवाद और गहराता जा रहा है, सवाल यह भी उठ रहा है कि, क्या यह केवल एक तकनीकी चूक है? या फिर स्थानीय राजनीतिक समीकरणों का परिणाम? क्या भविष्य में ऐसे आयोजनों के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल तय किया जाएगा?
लोकतांत्रिक गरिमा का सवाल
अमृतधारा महोत्सव जहां प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है, वहीं यह विवाद लोकतांत्रिक संवेदनशीलता की परीक्षा बन गया है, लोकतंत्र केवल मंच और भाषणों से नहीं चलता, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के सम्मान और सहभागिता से मजबूत होता है, यदि स्थानीय जनप्रतिनिधियों को ही दरकिनार किया जाएगा, तो आयोजन की भव्यता के बावजूद उसकी आत्मा अधूरी रह जाएगी, अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं—क्या वह इस विवाद पर स्पष्टता देगा और भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए ठोस कदम उठाएगा? अमृतधारा की जलधारा तो अविरल बहती रहेगी, लेकिन लोकतंत्र की धारा भी उतनी ही स्वच्छ और सम्मानजनक बनी रहे—यही जन अपेक्षा है।
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