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बलरामपुर@गोचर भूमि पर पूर्व विधायक का कब्जा,राजस्व विभाग की चुप्पी राजनीतिक दबाव और अंततः अपर कलेक्टर का सख़्त फैसला

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गोचर भूमि को निजी बताकर बनाया गया अवैध पट्टा…अपर कलेक्टर न्यायालय ने किया निरस्त

  • बलरामपुर से सामने आया चौंकाने वाला मामला
  • पूर्व विधायक का कब्ज़ा उजागरः राजस्व विभाग वर्षों तक बताता रहा गोचर को निजी
  • बलरामपुर@राजनीतिक प्रभाव में दबा रहा मामला,6 साल बाद न्यायालय से टूटा अवैध पट्टा
  • सरगुजा सेटलमेंट में गोचर दर्ज…फिर भी निजी स्वामित्व का खेल चलता रहा…
  • 2019 से अवैध कब्ज़ा, 2025 में फैसला राजस्व रिकॉर्ड की सच्चाई आई सामने…

-अनिल सिन्हा-
बलरामपुर,25 दिसम्बर 2025 (घटती-घटना)। बलरामपुर का यह मामला एक आईना है जिसमें राजस्व विभाग की कमजोरी, राजनीतिक हस्तक्षेप, और आम जनता की वर्षों की लड़ाई स्पष्ट दिखाई देती है, अपर कलेक्टर न्यायालय का फैसला यह साबित करता है कि अगर दबाव हटे, तो कानून आज भी जि़ंदा है,अब सवाल सिफऱ् इतना है क्या सिस्टम भी इस फैसले से कुछ सीखेगा, या अगली गोचर भूमि किसी और रसूखदार के हवाले कर दी जाएगी? छत्तीसगढ़ के बलरामपुर-रामानुजगंज जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न सिफऱ् राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि यह भी उजागर कर दिया है कि किस प्रकार राजनीतिक प्रभाव के आगे वर्षों तक सरकारी तंत्र नतमस्तक बना रहा, यह मामला ग्राम मानपुर, तहसील शंकरगढ़ की उस भूमि से जुड़ा है, जो सरगुजा सेटलमेंट 1944-45 के अनुसार स्पष्ट रूप से गोचर (शासकीय चरागाह) भूमि के रूप में दर्ज है, किंतु वर्षों तक उसे निजी भूमि बताकर एक राजनीतिक व्यक्ति—पूर्व विधायक—द्वारा कब्जा कर लिया गया और अवैध पट्टा तक बनवा लिया गया।
मामले की पृष्ठभूमि : 2019 से चला आ रहा विवाद : दस्तावेज़ों के अनुसार, विवादित भूमि खसरा नंबरः 228/5, रकबाः 0.372 हेक्टेयर, स्थितिः ग्राम मानपुर, तहसील शंकरगढ़, जिला बलरामपुर-रामानुजगंज यह भूमि सरगुजा सेटलमेंट के रिकॉर्ड में गोचर मद में दर्ज है, बावजूद इसके वर्ष 2019 से भूमि पर कब्जा किया गया, वहां कच्चा मकान/निर्माण कराया गया, राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर कर निजी पट्टा दर्शाया गया सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि शिकायतों के बावजूद राजस्व विभाग के अधिकारी लगातार इसे निजी भूमि बताते रहे।
राजस्व विभाग की भूमिका : अज्ञानता या संरक्षण? यह प्रश्न अब बेहद गंभीर हो चुका है जब सरगुजा सेटलमेंट 1944-45 में भूमि गोचर दर्ज थी, जब 1954-55 के बाद का तहसील अभिलेख उपलब्ध ही नहीं था, जब पट्टे से संबंधित कोई मूल दस्तावेज़ प्रस्तुत नहीं किया गया तो फिर किस आधार पर इसे निजी भूमि बताया जाता रहा? किसके दबाव में राजस्व अधिकारी आंख मूंदे बैठे रहे? क्या यह महज़ लापरवाही थी या राजनीतिक संरक्षण का परिणाम? दस्तावेज़ बताते हैं कि 1990-91 के कथित नामांतरण की मूल प्रति उपलब्ध नहीं, नामांतरण पंजी में क्रमांक-07 का उल्लेख तो है, पर न्यायालयीन संदर्भ नहीं, किसान किताब और अन्य अभिलेखों में स्पष्ट विरोधाभास था।
शिकायत,जांच और न्यायालय का हस्तक्षेप : लगातार शिकायतों के बाद मामला अपर कलेक्टर न्यायालय,राजपुर (शंकरगढ़) पहुँचा,जांच के मुख्य बिंदु राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आए,भूमि गोचर मद में दर्ज है,किसी भी स्तर पर वैध पट्टा जारी होने का प्रमाण नहीं,1990-91 का कथित पट्टा फर्जी प्रतीत होता है, कब्जा शासकीय भूमि पर अवैध रूप से किया गया।
अपर कलेक्टर का ऐतिहासिक फैसला

दिनांक 12/12/2025 को अपर कलेक्टर न्यायालय ने अवैध पट्टा निरस्त किया,राजस्व रिकॉर्ड में सुधार के आदेश दिए,स्पष्ट कहा कि यह भूमि शासकीय गोचर भूमि है, निजी स्वामित्व का दावा अवैध व निराधार है, यह फैसला केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं,बल्कि उस पूरे सिस्टम के खिलाफ है,जिसने वर्षों तक गलत को सही साबित करने की कोशिश की।
राजनीतिक व्यक्ति और दोहरे मापदंड- यह भी एक सच्चाई है कि आम ग्रामीण अगर गोचर भूमि पर कब्जा करे, तो तत्काल बेदखली, लेकिन जब कब्जाधारी राजनीतिक रसूख वाला हो, तो फाइलें दब जाती हैं, भूमि ‘निजी’ घोषित कर दी जाती है, शिकायतकर्ता को वर्षों तक भटकाया जाता है यही कारण है कि यह मामला केवल भूमि विवाद नहीं, बल्कि लोकतंत्र, समानता और कानून के राज का प्रश्न बन जाता है।
गोचर भूमि बची, पर भरोसा कब लौटेगा?- अपर कलेक्टर का यह निर्णय निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन सवाल अभी भी बाकी हैं जिन अधिकारियों ने गोचर भूमि को निजी बताया, उन पर क्या कार्रवाई होगी? क्या अवैध कब्जे के वर्षों की जवाबदेही तय होगी? क्या राजनीतिक प्रभाव से संचालित ऐसे मामलों की स्वतंत्र जांच होगी? अगर जवाब ‘नहीं’ है,तो यह फैसला भी केवल फाइलों में दर्ज एक आदेश बनकर रह जाएगा।


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