-संवाददाता-
अम्बिकापुर,23 दिसम्बर 2025 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते औद्योगिक दबाव और जंगलों की अनियंत्रित कटाई के खिलाफ राज्य के विभिन्न जन-संगठनों ने एकजुट होने का निर्णय लिया है। सोमवार को सरगुजा संभाग के अंबिकापुर में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में प्रदेश के जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए एक ‘साझा मंच’ का गठन किया गया।
इस बैठक में रायगढ़,खैरागढ़,कोरबा और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में चल रहे स्थानीय विरोध प्रदर्शनों को एक राष्ट्रीय पहचान देने और सरकार की कथित ‘जनविरोधी’ नीतियों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ने की रणनीति तैयार की गई।
विभिन्न आंदोलनों की एकजुटता उद्योगपतियों के खिलाफ मोर्चाबंदी
बैठक का मुख्य उद्देश्य राज्य के अलग-अलग हिस्सों में बिखरे हुए जन-आंदोलनों को एक सूत्र में पिरोना था। इसमें कोल ब्लॉक,बॉक्साइट खदान, लाइम स्टोन और सीमेंट प्लांट जैसी परियोजनाओं से प्रभावित ग्रामीणों और किसानों ने हिस्सा लिया। शामिल प्रतिनिधियों का कहना है कि सरकार और प्रशासन उद्योगपतियों के मुनाफे के लिए किसानों की उपजाऊ भूमि और आदिवासियों के पारंपरिक जंगलों का बेतहाशा दोहन कर रहे हैं। आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि अब वे अपनी मांगों को मनवाने के लिए चरणबद्ध तरीके से पूरे प्रदेश में विरोध का बिगुल फूंकेंगे।
16 जनवरी को सरगुजा में प्रदेश स्तरीय शक्ति प्रदर्शन…
साझा मंच ने अपने विरोध कार्यक्रम की पहली बड़ी तारीख का एलान कर दिया है। आगामी 16 जनवरी को सरगुजा में एक विशाल प्रदेश स्तरीय आंदोलन किया जाएगा। इस आंदोलन का नेतृत्व ‘हसदेव बचाओ समिति’ के आलोक शुक्ला और आदिवासी नेता भानू प्रताप सिंह करेंगे। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि जल,जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अब केवल स्थानीय स्तर पर नहीं,बल्कि राजधानी तक आवाज बुलंद की जाएगी। यह प्रदर्शन सरकार को यह बताने के लिए होगा कि विकास के नाम पर पर्यावरण का विनाश अब स्वीकार्य नहीं है।
जबरन भूमि अधिग्रहण और जनसुनवाई का विरोध
खैरागढ़ और कोरबा से आए प्रतिनिधियों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए। खैरागढ़ के रमाकांत बंजारे ने बताया कि उनके क्षेत्र के पांच गांवों में लाइम स्टोन खदान के लिए तीन फसली (उपजाऊ) जमीन ली जा रही है, जिसका किसान पुरजोर विरोध कर रहे हैं। वहीं, कोरबा के दीपक साहू ने आरोप लगाया कि प्रदेश में ‘तानाशाही’ रवैये के साथ मनमाने ढंग से जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है। किसानों का कहना है कि उनकी आजीविका का एकमात्र साधन उनकी जमीन है, जिसे वे किसी भी कीमत पर उद्योगपतियों के हवाले नहीं करेंगे।
जंगलों की कटाई और संवैधानिक अधिकारों का हनन
आदिवासी नेता भानू प्रताप सिंह ने पेड़ों की कटाई पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि 16 जनवरी के धरने में मुख्य मांग जंगलों की कटाई पर तत्काल रोक लगाने की होगी। वहीं, ‘छत्तीसगढ़ बचाओ संघर्ष समिति’ के आलोक शुक्ला ने आरोप लगाया कि अनुसूचित क्षेत्रों में संवैधानिक अधिकारों, विशेष रूप से ग्राम सभाओं की शक्तियों का हनन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रशासन ग्राम सभाओं की अवहेलना कर कॉर्पोरेट जगत के हितों के लिए काम कर रहा है, जो कि लोकतंत्र और आदिवासियों के अधिकारों के खिलाफ है।
फर्जी प्रस्तावों और दमनात्मक कार्रवाई पर रोक की मांग
मंच के नेताओं ने सरकार से मांग की है कि फर्जी ग्राम सभा प्रस्तावों के आधार पर पेड़ों की कटाई और खनन गतिविधियों को तत्काल बंद किया जाए। आरोप है कि पुलिस और प्रशासन का उपयोग कर कॉर्पोरेट घरानों के लिए रास्ता साफ किया जा रहा है और विरोध करने वाले ग्रामीणों पर दमनात्मक कार्रवाई की जा रही है। साझा मंच ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने अपनी नीतियां नहीं बदलीं और आदिवासियों व किसानों के हितों की रक्षा सुनिश्चित नहीं की, तो यह आंदोलन आने वाले समय में और अधिक उग्र होगा।
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