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अम्बिकापुर/खैरबार,@ वन ग्राम से राजस्व ग्राम

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विकास की राह या विस्थापन का खतरा?
खैरबार मामले में उठे कानूनी और सामाजिक सवाल
अम्बिकापुर/खैरबार,22 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)
। खैरबार को राजस्व ग्राम घोषित करने की प्रक्रिया ने जहां विकास की नई उम्मीदें जगाई हैं,वहीं कई गंभीर कानूनी और सामाजिक प्रश्न भी खड़े कर दिए हैं। अधिवक्ता धनंजय मिश्रा ने कहा है कि यदि पूरी प्रक्रिया कानून के दायरे में और वास्तविक हितग्राहियों के अधिकारों की रक्षा करते हुए नहीं की गई, तो यह विकास के बजाय शोषण का नया अध्याय बन सकती है। उन्होंने कहा कि जब यह क्षेत्र वन ग्राम था,तब यहां निवासरत आदिवासियों को वन अधिकार पत्र विधिवत प्रदान किए गए थे। ऐसे में भूमि पर स्वामित्व एवं उपयोग का अधिकार परंपरागत वनवासियों के पक्ष में सुरक्षित था। इसके बावजूद अन्य वर्गों द्वारा भूमि के क्रय-विक्रय और कब्जे को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
कानून क्या कहता है? अधिवक्ता श्री मिश्रा के अनुसार, Forest Rights Act 2006 की धारा 4(5) स्पष्ट करती है कि अधिकारों की मान्यता प्रक्रिया पूर्ण होने तक किसी भी वनवासी को उसकी भूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता। साथ ही, इस कानून के तहत दिए गए अधिकार अहस्तांतरणीय हैं, अर्थात उनका क्रय-विक्रय वैध नहीं माना जाता। वहीं, Chhattisgarh Land Revenue Code 1959 के तहत भी अनुसूचित जनजातियों की भूमि के हस्तांतरण पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति ऐसा कोई भी सौदा अवैध माना जाएगा।
जांच की मांग तेज : मिश्रा ने आशंका जताई कि कुछ लोगों ने राजस्व ग्राम बनने की संभावित प्रक्रिया की जानकारी पहले ही प्राप्त कर ली थी और योजनाबद्ध तरीके से बड़े भू-भाग पर कब्जा कर लिया। यदि इसकी निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो वास्तविक हकदार आदिवासी और वनवासी फिर से ठगे जा सकते हैं।
प्रशासन से चार प्रमुख मांगें…
भूमि अभिलेखों,रजिस्ट्री और कब्जों की गहन जांच हो।
अवैध कब्जाधारियों के खिलाफ विधिसम्मत कार्रवाई हो।
पात्र वन अधिकार पत्रधारियों को ही स्वामित्व अधिकार मिले।
पूरी प्रक्रिया में ग्राम सभा की भूमिका सुनिश्चित की जाए।
समय रहते कार्रवाई जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्व ग्राम बनने की प्रक्रिया विकास का अवसर है, लेकिन यदि पारदर्शिता और कानून का पालन नहीं हुआ, तो यह सामाजिक अन्याय का कारण बन सकती है। प्रशासन को समय रहते सख्त कदम उठाने की जरूरत है, ताकि भोले-भाले आदिवासी और वनवासी किसी नए छल का शिकार न हों।


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