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बिलासपुर@ हाई कोर्ट का फैसला

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एससी,एसटी एक्ट में अपराध साबित करने के लिए वैध जाति प्रमाणपत्र का होना जरुरी
बिलासपुर ,22 अप्रैल 2026।
छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, एससी, एसटी एक्ट में अपराध साबित करने के लिए वैध जाति प्रमाणपत्र का होना जरुरी है। याचिकाकर्ताओं की याचिका को कोर्ट ने आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया है। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी छह महीने की सजा को रद्द कर दिया है। जुर्माने की राशि को 500 रुपये से बढ़ाकर दो हजार रुपये कर दिया है। यह राशि प्रत्येक याचिकाकर्ता को जमा करनी होगी। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, एससी, एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(आर) के तहत अपराध साबित करने के लिए आवश्यक है,अभियोजन यह साबित करे,पीडि़त अनुसूचित जाति,जनजाति से संबंधित है,और आरोपी उस वर्ग से नहीं है। जस्टिस एनके व्यास ने अपने फैसले में कहा है, इसके लिए वैध जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य है। बता दें,मामला 21 साल पुराना है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था,सरकारी जमीन पर दुकान निर्माण को लेकर विवाद के दौरान आरोपियों ने उसे जातिसूचक शब्द कहकर अपमानित किया, मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी। शिकायत के आधार पर पुलिस ने आईपीसी की धाराओं 294,323,506/34 और एससी,एसटी एक्ट की धारा 3(1)(आर) के तहत एफआईआर दर्ज कर कोर्ट में चालान पेश किया था। मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को धारा 294, 506 आईपीसी और 3(1)(आर) के तहत दोषी ठहराया था।
ट्रायल कोर्ट के फैसले को हाई कोर्ट में दी चुनौती
ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए आरोपियों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट के सामने पैरवी करते हुए बताया, शिकायतकर्ता का जाति प्रमाणपत्र केवल तहसीलदार द्वारा जारी अस्थायी प्रमाणपत्र था, जो सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी नहीं किया गया था, लिहाजा, जाति प्रमाण पत्र को वैध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने अधिवक्ता के इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा, केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है, शिकायतकर्ता किस जाति से है, बल्कि इसे ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य से सिद्ध करना जरूरी है। चूंकि इस मामले में वैध जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया, इसलिए धारा 3(1)(ह्म्) के तहत अपराध सिद्ध नहीं हुआ। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया है।
कोर्ट ने गवाहों के बयानों के आधार पर आईपीसी की धारा 294 (अश्लील भाषा के उपयोग) के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। धारा 506(2) के तहत आपराधिक धमकी के आरोप को पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में खारिज कर दिया है। बी कोर्ट ने कहा, घटना को 21 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है और आरोपी पहले ही एक दिन जेल में रह चुके हैं, इसलिए छह महीने की सजा को घटाकर पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया है। ट्रायल कोर्ट द्वारा की गई जुर्माना ?500 से बढ़ाकर 2000 रुपये कर दिया है। जुर्माने की राशि प्रत्येक याचिकाकर्ता को जमा करने का निर्देश दिया है।


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