परिजन बोले…पुलिस की पिटाई से हुई मौत…निष्पक्ष पोस्टमार्टम और कार्रवाई तक नहीं करेंगे अंतिम संस्कार

- परिजनों का आरोप पुलिस ने पीट-पीट कर मार डाला,रात्रि में ही आनन-फानन में अंतिम संस्कार करने डाला दबाव
- हिरासत में लेने के बाद परिजनों से मिलने नहीं दिया,मृत्यु उपरांत गोपनीय तरीके से कराया पोस्टमार्टम
- सर्व आदिवासी समाज द्वारा पुलिस महानिरीक्षक सरगुजा रेंज को निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई करने हेतु दिया गया आवेदन
- मृतक की मां ने प्रदेश के राज्यपाल को भी अनुविभागीय अधिकारी के माध्यम से दिया आवेदन,की कार्यवाही की मांग
- क्षेत्र की यह पहली घटना नहीं,जहां पुलिस हिरासत में हुई हो मृत्यु

-न्यूज डेस्क-
बलरामपुर/सरगुजा,11 नवम्बर 2025 (घटती-घटना)।
सरगुजा संभाग में एक बार फिर पुलिस हिरासत में मौत का मामला सामने आया है। बलरामपुर थाना क्षेत्र में चोरी के कथित आरोपी युवक उमेश सिंह (19 वर्ष),निवासी ग्राम नकना की 9 नवंबर को पुलिस कस्टडी में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई,मामला तूल तब पकड़ गया जब परिजनों ने आरोप लगाया कि युवक की मौत बीमारी से नहीं, बल्कि पुलिस की मारपीट से हुई है, मृतक के परिजनों ने चार दिन से शव का अंतिम संस्कार नहीं किया है और निष्पक्ष जांच व दोबारा पोस्टमार्टम की मांग पर अड़े हुए हैं, परिजन और ग्रामवासी बलरामपुर पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कह रहे हैं कि मृत्यु के बाद रातों-रात पुलिस ने शव को गांव भेजकर अंतिम संस्कार कराने का दबाव बनाया और मुआवजा व नगद देने की पेशकश भी की गई। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने कस्टोडियल हैंडलिंग को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए हैं की थर्ड डिग्री का प्रयोग न हो,आवश्यक होने पर ही हिरासत दी जाए, गिरफ्तारी के बाद परिजनों से मिलने से नहीं रोका जाए फिर भी प्रदेश में लगातार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जो पुलिसिया कार्यशैली पर सवाल खड़ा करते हैं। वैसे यह मामला केवल एक मौत का नहीं बल्कि विश्वास बनाम अविश्वास का है, एक ओर पुलिस बीमारी से मौत का दावा कर रही है, तो दूसरी ओर परिजन और समाज कस्टोडियल टॉर्चर की बात कह रहे हैं, अब पूरा मामला निष्पक्ष जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के इंतजार में है। आपको बता दें कि सरगुजा संभाग की पुलिसिया कार्यप्रणाली की पहचान अब कस्टोडियल डेथ से भी होने लगी है, एक के बाद एक होने वाले कस्टोडियल डेथ के कारण सवाल उठना लाजमी है, ताजा घटना बलरामपुर जिले की है,जहां बलरामपुर थाने में एक युवक की पुलिस हिरासत में मौत हो गई, हालांकि पुलिस वालों के अनुसार युवक बीमार था और सिकल सेल एनीमिया से पीडि़त था, जिसके कारण उसकी मृत्यु हुई, बावजूद इसके सैकड़ों सवाल मुंह बाए खड़े हैं, जब युवक बीमार था और बहुत कमजोर था तो उसे हिरासत में लिया ही क्यों गया? क्यों उसे समय अनुसार अस्पताल में दाखिल नहीं कराया गया? उसके शरीर पर चोटों के निशान कैसे पाए गए? प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जब हिरासत में लिया गया तो युवक के साथ मारपीट क्यों की गई? आनन फानन में पोस्टमार्टम क्यों कराया गया? चुपचाप अंतिम संस्कार के लिए परिजनों पर दबाव क्यों डाला गया? परिजनों को मुआवजा राशि देने एवं पुलिस वालों द्वारा नगद पैसे देने का प्रलोभन क्यों दिया गया? ऐसे अनेकों सवाल हैं, जो पुलिस की कार्य प्रणाली पर सवालिया निशान खड़ा कर रहे हैं। कस्टोडियल डेथ का यह संभाग में पहला मामला नहीं है, विगत कुछ वर्षों में और भी ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जिसमें मृतक के परिजन आज तक न्याय के गुहार लगा रहे हैं,सरकारें बदल गई, परंतु परिस्थितियों जस की तस है,यह मामला भी कुछ ऐसा ही है, जहां परिजन युवक की मृत्यु को पुलिस द्वारा किया गया हत्या बता रहे हैं, विडंबना यह है की मृत्यु के चार दिन बीत जाने के बाद भी अभी तक युवक का अंतिम संस्कार नहीं हुआ है, परिजनों ने शव लेने से इनकार कर दिया है, और उनका कहना है कि जब तक निष्पक्ष जांच नहीं होती और निष्पक्ष पोस्टमार्टम नहीं होता वह शव स्वीकार नहीं करेंगे और अंतिम संस्कार भी नहीं करेंगे।
आम आदमी पार्टी ने न्याय के लिए आईजी कार्यालय के सामने दिया धरना घटनाक्रम में मृत युवक के परिजनों को न्याय दिलाने के लिए आम आदमी पार्टी के क्षेत्रीय नेता भी सामने आए और आईजी कार्यालय के सामने धरना प्रदर्शन करते हुए जिला पुलिस प्रशासन के खिलाफ जमकर नारे लगाए। पुलिस प्रशासन को चेतावनी देते हुए आम आदमी पार्टी ने निष्पक्ष जांच न होने की दशा में आंदोलन करने की चेतावनी दी है।
परिजनों का आरोप
सादे लिबास में ले जाकर पीटा, मिलने नहीं दिया गया- मृतक की मां ने पुलिसकर्मियों पर अपने पुत्र की हत्या का आरोप लगाया है,और प्रदेश के राज्यपाल को सीतापुर के अनुविभागीय अधिकारी के माध्यम से आवेदन देकर निष्पक्ष जांच और आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की है। मृतक युवक की मां के अनुसार 7 नवंबर 2025 शाम लगभग 5ः00 बलरामपुर थाने के पुलिसकर्मी जो की सादे लिबास में थे, उन्होंने युवक उमेश सिंह पिता फेकू सिंह उम्र 19 वर्ष को सीतापुर के ग्राम नकना के वार्ड क्रमांक 1 से हिरासत में लिया और प्रत्यक्ष दर्शियों की उपस्थिति में युवक के साथ मारपीट करते हुए अन्य लोगों को भी हिरासत में लेकर चले गए, मृतक की मां को एक दिन बाद सीतापुर थाने से बुलावा आया, जहां से वाहन द्वारा इन्हें बलरामपुर थाने भेजा गया। बलरामपुर थाने में युवक के परिजन युवक से मिलने का गुहार लगाते रहे, परंतु इन्हें युवक से मिलने नहीं दिया गया। 9 नवंबर 2025 की रात्रि में इन्हें सूचना दी गई की युवक की मृत्यु हो गई है, और थाना बलरामपुर पुलिस द्वारा आनन-फानन में युवक के शव को एंबुलेंस में रखकर ग्राम नकना के लिए यह कहकर रवाना किया गया कि इसका अंतिम संस्कार कर दो,सरकार द्वारा मुआवजा मिलेगा और कुछ पैसा हम भी तुम्हें देंगे,मृतक युवक की मां का यह भी आरोप है कि रात भर थाना और पुलिस के चक्कर काटने के बाद सुबह युवक के शव के साथ रवाना किया गया। पोस्टमार्टम के लिए मृतक के परिजनों की सहमति भी नहीं ली गई और पुलिस कर्मियों को युवक के अंतिम संस्कार की इतनी जल्दी क्यों पड़ी थी ? अपनी शिकायत में पांच सदस्यीय डॉक्टरों की टीम द्वारा पोस्टमार्टम और उचित जांच उपरांत दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग भी की है।
सर्व आदिवासी समाज द्वारा पुलिस
महानिरीक्षक सरगुजा रेंज को निष्पक्ष
जांच कर कार्रवाई करने हेतु दिया गया आवेदन
सर्व आदिवासी समाज द्वारा पुलिस महानिरीक्षक सरगुजा रेंज को पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई करने के लिए आज आवेदन सौंपा गया। सर्व आदिवासी समाज की मांग है कि पूरी प्रक्रिया में निष्पक्ष जांच हो, शव का पुनः पोस्टमार्टम कराया जाए,कस्टोडियल डेथ होने की दशा में मृतक के परिजनों को एक करोड़ का मुआवजा मिले और दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही हो। अपने आवेदन में सर्व आदिवासी समाज ने जो कुछ वर्णित किया है, उसके अनुसार पूरा का पूरा मामला संदिग्ध नजर आता है। आवेदन में दिए गए तथ्यों के अनुसार युवक की मृत्यु हो जाने के उपरांत परिजनों को सीतापुर से बुलाया गया, जिसकी व्यवस्था भी पुलिस विभाग के कर्मचारियों ने ही की। युवक से मिलने के लिए टालमटोल लगातार किया गया, परिजनों को कहा गया कि युवक अस्पताल में भर्ती है। वहां भी परिजनों को मिलने नहीं दिया जाता, अचानक परिजनों को सूचना दी जाती है कि युवक की मृत्यु हो चुकी है। इसके बाद भी जब परिजन मृत्यु युवक के शव को देखना चाहते हैं, तो उन्हें दूत्कारा जाता है। और यह कहा जाता है कि पोस्टमार्टम की प्रक्रिया और चिरफाड चल रही है, इसके बाद आपको शव सौंप दिया जाएगा। उसके बाद का घटनाक्रम तो और भी विचित्र है, जहां मृत युवक की लाश को सौंपने के साथ ही अंतिम संस्कार के लिए तत्काल में दबाव डाला जाता है, रुपए, पैसे और मुआवजा का प्रलोभन दिया जाता है। इन सबसे क्षुब्ध होकर परिजनों द्वारा युवक के शव को लेने से इनकार कर दिया गया। जिसकी परिणति यह है कि चार दिन बीत जाने पर भी अभी तक युवक का अंतिम संस्कार नहीं हो पाया है।
प्रदेश के आदिवासी मुख्यमंत्री संभाग के ही और संभाग के आदिवासी सुरक्षित नहीं…
छत्तीसगढ़ सरकार के पूर्व खाद्य मंत्री अमरजीत भगत ने पुलिस प्रशासन के कार्य प्रणाली और सरकार पर गंभीर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि जब प्रदेश को आदिवासी मुख्यमंत्री मिला,तो प्रदेश के आदिवासियों के मन में यह आशा जगी कि चलो अब हम सुरक्षित रहेंगे, संरक्षित रहेंगे। परंतु जब प्रदेश के आदिवासी मुख्यमंत्री अपने ही संभाग के आदिवासियों के साथ न्याय नहीं कर पा रहे, तो पूरे प्रदेश के साथ क्या न्याय करेंगे। पूर्व मंत्री अमरजीत भगत ने कहा कि घटनाक्रम का जो वर्णन हमारे सामने आया है उसके अनुसार जब युवक हिरासत में ले जाते वक्त ठीक था, तो दो दिन बाद उसकी मृत्यु पुलिस हिरासत में कैसे हो गई? परिजनों को युवक से मिलने क्यों नहीं दिया गया और परिजनों को भी क्यों प्रताडि़त किया गया ? यह एक बड़ा सवाल है। उन्होंने प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर के जिला प्रशासन और सरगुजा संभाग के आईजी से मामले की निष्पक्ष जांच करने की मांग की है, और दोषियों को सजा दिलाने के लिए कहा है।
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन की अनदेखी का आरोप…
चाहे कस्टोडियल डेथ का मामला हो या आरोपियों को सरेआम,सरे बाजार हथकड़ी लगाकर जुलूस निकालने का,इसके अतिरिक्त और भी कई सारी ऐसी गतिविधियां हैं, जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन निश्चित है,हिरासत में किसी की मृत्यु ना हो इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट गाइडलाइन जारी किया है कि थर्ड डिग्री का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए,अनावश्यक बल का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए, यदि कोई आरोपी है भी, तो उसके भी मानवाधिकार होते हैं,यदि किसी को गिरफ्तार किया जाता है तो सामान्य परिस्थितियों में उसे हथकड़ी नहीं लगाया जा सकता। आरोप सिद्ध होने के पूर्व हथकड़ी के साथ जुलूस निकालना कहां तक न्याय संगत होता है,परंतु छत्तीसगढ़ पुलिस ने शायद यह ठान लिया है कि उसे सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का पालन नहीं करना है। जिसकी परिणति कस्टोडियल डेथ के रूप में यहां सामने आई है। और भी पूरे प्रदेश में ताजा मामले हुए हैं जहां पर किसी मामले में गिरफ्तार आरोपी को सरे आम हथकड़ी लगाकर उसका जुलूस निकाला गया है। जो कि सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइन के बिल्कुल विपरीत है।
मामला अब किस मोड़ पर…
- शव अस्पताल में संरक्षित है
- परिजन निष्पक्ष जांच तक अंतिम संस्कार से इंकार
- संगठन और सामाजिक समूह मामले पर सक्रिय
- प्रशासन जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात कह रहा है
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