
- अधिवक्ता अनिश्चितकालीन आंदोलन पर…जिला प्रशासन और न्याय विभाग अब भी मौन…
- ऐसी क्या मजबूरी है कि जमीन होते हुए भी न्याय विभाग व जिला प्रशासन शहर से 10 किलोमीटर दूर न्यायालय बनाना चाहता है?
- अधिवक्ता का कहना है कि मध्य शहर में न्यायालय में गोली बंदूक चलती है तो फिर 10 किलोमीटर दूर क्या स्थिति उत्पन्न होगी यह कौन विचार करेगा?

-न्यूज डेस्क-
अंबिकापुर 11 नवम्बर 2025
(घटती-घटना)।
न्यायालय भवन सिर्फ एक ढांचा नहीं होता,यह न्याय उपलब्धता का केंद्र होता है,यहां न्यायाधीश और कर्मचारी कार्य करते हैं, लेकिन न्याय की प्रक्रिया तब पूरी होती है जब अधिवक्ता अपनी दलीलें रखते हैं और पक्षकार अपनी बातें कह पाते हैं, ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब न्याय की पूरी संरचना अधिवक्ता,पक्षकार और जनता से मिलकर चलती है, तो न्यायालय के निर्माण या स्थान चयन जैसे निर्णय में इन्हीं लोगों की बात क्यों नहीं सुनी जा रही? यदि न्यायालय को जनता की पहुँच से दूर ले जाया जाता है, तो इसका सीधा मतलब है न्याय पाने में दूरी बढ़ेगी, समय बढ़ेगा, खर्च बढ़ेगा, और अंततः न्याय तक पहुंच कठिन होगी,तो फिर प्रश्न उठना स्वाभाविक हैः क्या न्यायालय की इमारत बनाने वाले लोग न्याय की आत्मा को समझते भी हैं? या फिर यह पूरा निर्णय सिर्फ दफ्तरों के एसी कमरों में बैठकर फाइलों पर कलम चलाने जैसा है? न्यायालय जनता के लिए होता है। यदि जनता और उसके प्रतिनिधि (अधिवक्ता) ही संघर्षरत हों, आंदोलन पर हों, तो यह संकेत है कि निर्णय न्यायहित में नहीं, बल्कि किसी और हित में लिया गया है।
बता दे की सरगुजा संभाग के मुख्यालय अंबिकापुर में जिला न्यायालय को शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर प्रस्तावित स्थान पर स्थानांतरित करने का निर्णय अब एक बड़े जन-आंदोलन का रूप लेता दिखाई दे रहा है, अधिवक्ताओं ने स्पष्ट कहा है कि यह निर्णय व्यावहारिक नहीं,जनविरोधी है और गरीब, ग्रामीण,महिला एवं दिव्यांग पक्षकारों के लिए न्याय तक पहुंच को और कठिन बना देगा, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इतने गंभीर मुद्दे पर न तो जिला प्रशासन कोई ठोस कारण बता पा रहा है और न ही न्याय विभाग द्वारा अब तक कोई सार्वजनिक पक्ष रखा गया है। सांसद चिंतामणि महाराज,विधायक राजेश अग्रवाल,लुंड्रा विधायक प्रबोध मिंज, अंबिकापुर महापौर और विपक्ष के नेता टी.एस. सिंहदेव सभी ने वकीलों की मांग को जायज बताया है तो फिर दिक्कत कहाँ है? अब असली प्रश्न क्या डिस्टि्रक्ट जज का भूमि माँगने वाला पत्र वैध है?
तो क्या कब्जा हटाने की जगह न्यायालय को ही शहर से बाहर भेजने की साजिश हो रही है?
जब कब्जाधारी सरकारी कर्मचारी जमीन खाली नहीं कर रहे, तो जमीन को वापस लेने की बजाय, न्यायालय को ही 10 किलोमीटर दूर ले जाने का प्रस्ताव क्यों? यह स्थिति सीधे-सीधे संकेत करती है किः कब्जाधारियों को बचाने के लिए निर्माण स्थल बदला जा रहा है जनता और अधिवक्ताओं की सुविधा का ध्यान जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है यह प्रशासनिक क्षमता का सवाल नहीं इच्छाशक्ति और दबाव का प्रश्न है।
पहले जहां बनाने का निर्णय हुआ था,वही जमीन क्यों खाली नहीं करवाई जा रही?
यह तथ्य स्वयं प्रशासनिक अभिलेखों में दर्ज है किः दो वर्ष पूर्व गुलाब कॉलोनी को न्यायालय परिसर में शामिल कर दिया गया था, यहां कुल 4 एकड़ से अधिक भूमि न्यायालय निर्माण हेतु उपलब्ध है,भूमि मापन और नक्शा (डिज़ाइन) बन चुका है, 46 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत एवं आवंटित हो चुका है, अप्रैल माह में कर्मचारियों को बेदखली नोटिस भी जारी किया गया था, तो फिर सवाल है, जिस जमीन पर न्यायालय बनना था,वह आज तक खाली क्यों नहीं करवाई गई? क्या कुछ प्रभावशाली कब्जाधारियों को बचाने के लिए न्यायालय को शहर से बाहर धकेला जा रहा है? क्या सरकारी आवासों पर कब्जा किए बैठे कुछ व्यक्तियों के हितों के सामने पूरी न्याय व्यवस्था को कमजोर किया जा रहा है? यह सवाल सिर्फ अधिवक्ताओं का नहीं, बल्कि न्याय चाहने वाली जनता का है।
सुरक्षा का गंभीर सवाल, शहर में गोली चल सकती है तो 10 किमी दूर क्या होगा?
अधिवक्ता संघ के सचिव सम्पूर्णाक गुप्ता ने कहाः ‘जब शहर के बीच में स्थित न्यायालय परिसर में भी पहले गोली-कांड हो चुका है, तो फिर 10 किलोमीटर दूर सुनसान क्षेत्र में सुरक्षा की स्थिति क्या होगी, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।’ यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि सरगुजा संभाग का यह सबसे बड़ा न्यायालय है यहां रोजाना हजारों लोग आते हैं, पुलिस बल की उपलब्धता पहले से सीमित है, क्या दूरस्थ स्थान पर सुरक्षा सुनिश्चित करने की योजना तैयार हुई है? यदि नहीं, तो यह निर्णय किस आधार पर लिया जा रहा है?
वकीलों और प्रबुद्ध नागरिकों के 10 किलोमीटर दूर न्यायालय बनने से ये होगी परेशानी
न्यायालय शहर से दूर चले जाने पर एसडीएम, कलेक्टर,तहसील कार्यालय सब डिसेंट्रलाइज हो जाएंगे,जिससे वकीलों और पक्षकारों की दौड़-धूप बढ़ेगी, अंबिकापुर संभाग मुख्यालय है यहाँ ग्रामीण लोग एसपी, आईजी या कलेक्टर को आवेदन देने आते हैं। आवेदन तैयार करने के लिए वकील जरूरी होते हैं। न्यायालय दूर हुआ तो लोगों को अलग-अलग स्थानों के चक्कर लगाने पड़ेंगे, वर्तमान में टाइपिस्ट, डाटा एंट्री ऑपरेटर, स्टाम्प वेन्डर आदि एक ही परिसर में हैं, यह सुविधा खत्म हो जाएगी। कार्यपालिक मजिस्ट्रेट और न्यायालय एक स्थान पर हैं,इसलिए वकील एक ही दिन में कई मामलों की पैरवी कर पाते हैं, कोर्ट दूर हुआ तो न्याय देर से मिलेगी, वरिष्ठ वकीलों की उपस्थिति से प्रशासनिक अधिकारियों पर नैतिक दबाव रहता है,जिससे रिश्वतखोरी पर कुछ हद तक अंकुश रहता है,अगर न्यायालय दूर होगा, तो यह नियंत्रण घटेगा और भ्रष्टाचार बढ़ सकता है। वकीलों की प्रमुख मांग है कि- सभी न्यायालय (राजस्व , सेशन, उपभोक्ता फोरम, तहसील आदि) एक ही स्थान पर रहें, वर्तमान परिसर के पास (पूर्व में कलाकेंद्र मैदान या पश्चिम दिशा में रिंग रोड पार) भी पर्याप्त जमीन उपलब्ध है, मल्टी-स्टोरी भवन, अंडरग्राउंड पार्किंग और आधुनिक सुविधाओं के साथ नया न्यायालय बनाया जा सकता है, यदि सरकार शहर से बाहर ही ले जाना चाहती है तो फिर छठिरमा क्षेत्र में कलेक्टर, एसपी, तहसीलदार, कार्यपालिक मजिस्ट्रेट के दफ्तर और आवास भी साथ बनाए जा सकते हैं ताकि समन्वय बना रहे।
जनता की सुविधा की अनदेखी, न्याय तक पहुंच को कठिन बनाना क्या न्याय है?
यदि न्यायालय शहर से बाहर चला जाता है, तोः ग्रामीण और गरीब पक्षकारों का किराया बढ़ेगा,दूर दराज के क्षेत्रों से आने वालों के लिए ऑटो,बस,वाहन उपलब्धता की समस्या बढ़ेगी, महिला,बुजुर्ग और दिव्यांग व्यक्तियों की पहुँच और अधिक कठिन हो जाएगी, अधिवक्ताओं पर दैनिक आर्थिक और समयगत बोझ बढ़ेगा,क्या न्याय व्यवस्था सिर्फ विभागीय कर्मचारियों के लिए है? या न्याय पाने वाले आम लोगों के लिए भी?
जनता और अधिवक्ता,दोनों को नजरअंदाज, आखिर किसके इशारे पर फैसला?
अधिवक्ताओं ने बार-बार अनुरोध कियाः बैठक बुलाओ, तर्क सुनो विकल्प देखो, परंतु प्रशासन चुप, न्याय विभाग चुप,नेतृत्व चुप,क्या यह चुप्पी किसी बड़े दबाव की ओर संकेत करती है? यदि नहीं, तो फिर खुलकर तथ्य क्यों नहीं रखे जा रहे? जनता और अधिवक्ताओं की एक ही मांग- न्यायालय शहर में ही बने, जहां पहले से जमीन उपलब्ध है, वहां कब्जे हटाकर निर्माण शुरू किया जाए, न्याय की पहुंच को दूर करना न्याय से समझौता है।
सबसे सीधा सवाल प्रशासन और न्याय विभाग से जब न्यायालय निर्माण की जमीन उपलब्ध, स्वीकृत, नक्शा पास, बजट जारी और बेदखली आदेश लागू है,
तो फिर शहर से 10 किलोमीटर दूर न्यायालय क्यों?
अचानक ऐसा क्या हुआ?
किसके दबाव में निर्णय बदला गया?
किस हित के लिए अधिवक्ताओं और जनता को कठिनाइयों में डाला जा रहा है?
अंतिम सवाल, और यह सवाल जनता का है…
न्यायालय किसके लिए है?
न्यायाधीशों और कर्मचारियों के लिए?
क्या न्यायालय विभाग अकेला न्याय का स्वामी है?
क्या जिला प्रशासन यह मान चुका है कि निर्णय केवल ऊपर की मेजों पर होते हैं, जनता सिर्फ उसे झेलती है?
क्या अधिवक्ता सिर्फ औपचारिकता हैं, जिनकी राय की कोई कीमत नहीं?
और सबसे महत्वपूर्ण — न्याय मांगने वाले आम नागरिक का मूल्य क्या है इस पूरी प्रक्रिया में?
जमीन उपलब्ध होने के बावजूद न्यायालय को 10 किलोमीटर दूर ले
पर गंभीर सवाल, क्या यह ‘कब्जाधारियों’ को बचाने का खेल है?-
अधिवक्ता संघ के सचिव सम्पूर्णाक गुप्ता के अनुसार, जब तत्कालीन माननीय चीफ जस्टिस महोदय अंबिकापुर आए थे, उस समय डब्ल्यूडी द्वारा 2 एकड़ 69 डिसमिल भूमि को न्यायालय निर्माण के लिए विधिवत मापा गया था, इसी भूमि पर न्यायालय भवन के लिए पूरा नक्शा (डिज़ाइन) स्वीकृत हुआ, और लगभग 46 करोड़ रुपये का बजट भी मंजूर हो गया था। यह लगभग ढाई वर्ष पहले की आधिकारिक प्रक्रिया है जिसे किसी ने न तो चुनौती दी, न विरोध, इसके उपरांत, अधिवक्ता संघ के अनुरोध पर और न्यायालय की कार्यप्रणाली को मजबूत करने की आवश्यकता को देखते हुए कलेक्टर द्वारा गुलाब कॉलोनी क्षेत्र को न्यायालय परिसर में शामिल कर दिया गया, इसके बाद न्यायालय के लिए उपलब्ध भूमि बढ़कर 4 एकड़ से अधिक हो गई, अर्थात न्यायालय निर्माण के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध थी, स्वीकृत थी, और बजट तक जारी था, इसी क्रम में, अप्रैल में सरगुजा कमिश्नर द्वारा गुलाब कॉलोनी में निवासरत कर्मचारियों को ‘बेदखली नोटिस’ भी जारी किया गया था, ताकि जमीन को निर्माण के लिए खाली कराया जा सके, लेकिन आज की स्थिति यह है गुलाब कॉलोनी में शासकीय राजस्व कर्मचारी, सिविल कोर्ट से जुड़े कर्मचारी, यहां तक कि कोर्ट प्रबंधन से जुड़े अधिकारी भी खुद कब्जाधारी के रूप में निवास किए हुए हैं। जिनमें कोर्ट मैनेजर युवराज सिंह और न्यायालय अधीक्षक जैसे नाम भी शामिल हैं, यानी न्यायालय की जमीन पर सबसे पहले कब्जा किसका? जिन्हें न्याय व्यवस्था चलती है उन्हीं का, और यही सबसे बड़ा प्रश्न है।
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