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अंबिकापुर@सरकारी पद पर निजी भरोसा : योग्यता कितनी जरूरी?

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शौक बड़ी चीज है…लेकिन योग्यता नाम की भी कोई चीज होती है!

  • निज सहायक का पद योग्यता से मिलता है या पसंद से?
  • मंत्री राजेश अग्रवाल की प्रस्तावित नियुक्ति पर सवाल?


-न्यूज डेस्क-
अंबिकापुर,10 नवम्बर 2025
(घटती-घटना)।

भले ही अब मौसम ठंडा हो चुका है ठंड का एहसास लोगों को हो रहा है पर इस ठंड के बीच छत्तीसगढ़ की राजनीति में गर्मी बहुत है, स्थिति यह है कि मौसम की ठंड और राजनीति की गर्मी एक अलग ही मौसम का एहसास करा रही है, राजधानी के गलियारों में इन दिनों एक अद्भुत प्रेम-कहानी जैसे किस्से की चर्चा है, कहानी है मंत्री जी और उनके बेहद ख़ास तबरेज़ भाई की, मंत्री जी का शौक बड़ा निराला, सरकार चलाने से ज्यादा भरोसा अच्छी गिलौरी पर, गिलौरी का अर्थ पान का एक भरा हुआ,मुड़ा हुआ बीड़ा को कहा जाता है, और बताते हैं कि तबरेज भाई की उंगलियां पान की गिलौरी में ऐसा कमाल कर देते हैं, कि पान खाने वाले के दिल तक ताजगी उतर जाए, बस, मंत्री जी ने सोचा —अरे भाई! ऐसा हुनर वाला आदमी मेरे पास रहे, निज सहायक ही बना लेते हैं! जनता भले पूछ रही हो योग्यता क्या है? अनुभव क्या है? लेकिन मंत्री जी का जवाब बड़ा सरल पान की पत्ती में भावनाएं समझने वाला आदमी,इंसान को भी अच्छी तरह संभाल लेगा! मगर यहाँ आ गया नियम और कानून नाम का बगैर बुलाया मेहमान,निज सहायक के लिए 12वीं पास होना जरूरी है, और तबरेज़ भाई मिडिल क्लास में ही दिल जीतकर रुक गए। बस फिर क्या मंत्री जी की पूरी लॉबी,दबाव, दौड़ धूप सब धरी की धरी रह गई। अब गलियारों में कानाफूसी है कानून ने तो बस योग्यता मांगी थीज्पर अफसोस,यहां तो,की परंपरा दांव पर थी। और सबसे बड़ा सवाल झूल गया हवा में —मंत्री जी अब पान कौन खिलाएगा? अंत में हम आपको यह भी बताते हैं कि गिलौरी का अर्थ पान का एक भरा हुआ,मुड़ा हुआ बीड़ा को कहा जाता है अब आप इस वाक्य से पूरी कहानी को समझ सकते हैं।
क्या है मामला जानते है…
सरकारी तंत्र में पदों का निर्धारण केवल नियुक्ति आदेशों या औपचारिक प्रक्रियाओं से नहीं होता,बल्कि यह व्यवस्था की विश्वसनीयता और पारदर्शिता से भी जुड़ा प्रश्न है। हाल ही में मंत्री राजेश अग्रवाल द्वारा तबरेज़ आलम को निज सहायक (पीए) के रूप में नियुक्त करने का प्रयास इसी संदर्भ में व्यापक चर्चा का विषय बना है। मामला इसलिए सवालों के घेरे में आया क्योंकि प्रस्तावित व्यक्ति की शैक्षणिक योग्यता मात्र आठवीं कक्षा तक है, जबकि यह पद कार्यालय संचालन,अभिलेख प्रबंधन, पत्राचार और संवेदनशील संचार से संबंधित जिम्मेदारियों वाले पदों में गिना जाता है। निस्संदेह,राजनीतिक कार्यप्रणाली में व्यक्तिगत भरोसा और निकट सहयोगियों का महत्व होता है। कई नेता उन व्यक्तियों को प्राथमिकता देते हैं जो लंबे समय से उनके साथ जुड़े हों। यह मानवीय और राजनीतिक,दोनों दृष्टियों से समझने योग्य है। परंतु, यह तब सवालों को जन्म देता है जब निजी विश्वास का विस्तार सरकारी वेतन और सरकारी पदों तक होने लगे।
प्रशासन ने अपने अधिकार क्षेत्र में प्रक्रिया और मानकों की रक्षा करने का प्रयास किया
यह भी उल्लेखनीय है कि नियुक्ति फाइल को विभागीय स्तर पर स्वीकृति नहीं मिल सकी। इसका अर्थ यह है कि प्रशासन ने अपने अधिकार क्षेत्र में प्रक्रिया और मानकों की रक्षा करने का प्रयास किया है। यह लोकतांत्रिक मशीनरी के भीतर मौजूद संतुलन और आत्म नियमन का संकेत है। विवाद का केंद्र बिंदु तबरेज़ आलम नहीं हैं,विवाद उस व्यवस्था की प्राथमिकताओं का है जिसमें यह तय होता है कि सार्वजनिक पदों पर किस आधार पर नियुक्ति होती है, यदि राजनीतिक नेतृत्व यह संदेश देता है कि सरकारी पद योग्यता से पहले निकटता के आधार पर तय होते हैं, तो यह उन युवाओं के प्रति अन्याय होगा जो योग्यताएँ हासिल कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं।
यह स्थिति धीरे-धीरे प्रशासनिक संस्थाओं के पेशेवर चरित्र को कमजोर कर सकती है,अंततः यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष या विपक्ष का नहीं,बल्कि लोकतांत्रिक प्रशासन की साख और प्राथमिकताओं का प्रश्न है,सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि सार्वजनिक पदों पर नियुक्ति के मानदंड क्या हैं,यदि यह मानदंड खुलकर और पारदर्शी रूप से परिभाषित होंगे, तो न केवल विवाद कम होंगे,बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी, लोकतांत्रिक शासन में विश्वास,व्यक्ति पर नहीं,प्रणाली पर होना चाहिए।
तेज़ सवाल अब जनता पूछ रही है…
क्या सरकारी वेतन पर निजी भरोसे का ‘इनाम’ दिया जाने वाला था?
क्या प्रदेश में बेरोजगार डिग्रीधारियों की योग्यता अब किसी काम की नहीं?
किस आधार पर मंत्रालय ने आठवीं पास व्यक्ति को पीए के लिए उपयुक्त माना?
क्या मंत्री कार्यालय को भी ‘व्यक्तिगत व्यवस्था’ की तरह चलाया जाएगा?


चर्चा इस बात की भी…
तबरेज़ आलम मंत्री के काफ़ी समय से व्यक्तिगत रूप से नज़दीक बताए जाते हैं,यही नज़दीकी सरकारी पद तक पहुँचने का आधार बन गई, यह बात कई लोग मन में सवाल रूप में उठा रहे हैं,प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, अगर वेतन सरकारी कोष से है, तो नियुक्ति मानक और योग्यता की जांच अनिवार्य है।
फिलहाल स्थिति साफ है…
फाइल अटकी हुई है,विभाग सावधानी की मुद्रा में है और मामला जनता और मीडिया की निगरानी में आ चुका है मंत्री की तरफ़ से अब तक औपचारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।
चौथे स्तंभ का अपना दृष्टिकोण
लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर सरकारी पद का अपना महत्व,उद्देश्य और प्रक्रिया होती है निज सहायक जैसे पद,भले ही किसी मंत्री या जनप्रतिनिधि के व्यक्तिगत कार्यों से जुड़े हों,परंतु जब उस पद का वेतन सरकारी कोष से दिया जाता है,तो वह निजी नहीं,संस्थागत जिम्मेदारी बन जाता है। हाल ही में मंत्री द्वारा अपने परिचित तबरेज़ आलम को निज सहायक (पीए) पद पर संविदा नियुक्त करने का प्रस्ताव इसी कारण चर्चा में आया। बताया गया कि तबरेज़ आलम आठवीं पास हैं। हालांकि,योग्यता का सवाल केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है,मुद्दा नियुक्ति के मानक और पारदर्शिता का है। सरकार के हर विभाग में पदों की नियुक्ति के लिए निर्धारित प्रक्रिया होती है,जिससे भेदभाव और पक्षपात से बचा जा सके। जब मंत्री या अधिकारी अपने पद से जुड़ी नियुक्तियों में व्यक्तिगत संबंधों को प्राथमिकता देते हैं तो यह शासन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। जनता यह अपेक्षा रखती है कि सरकारी पदों पर बैठे लोग योग्यता, दक्षता और ईमानदारी को प्राथमिकता देंगे,क्योंकि यही लोकतांत्रिक प्रशासन की नींव है। राज्य और केंद्र, दोनों स्तरों पर यह आत्ममंथन जरूरी है कि क्या सरकारी प्रणाली में भरोसे की जगह नियम ले रहे हैं या नियम की जगह भरोसा? यह बहस केवल एक व्यक्ति या एक नियुक्ति की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जवाबदेही और प्रशासनिक मर्यादा की है।


अंत में दो मूल प्रश्न खड़े होते हैं…

  • पहला, क्या सरकारी पदों की प्राथमिक शर्त व्यक्तिगत निकटता होनी चाहिए, या फिर योग्यता, अनुभव और प्रक्रिया का पालन?
  • दूसरा,यदि ऐसे पदों पर न्यूनतम शैक्षणिक और कार्यकुशलता मानकों की अनदेखी की जाती है,तो इससे सरकारी तंत्र की दक्षता और निष्पक्षता पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

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