हरी सब्जियां और दालें आम आदमी की पहुंच से बाहर
अंबिकापुर,03 अगस्त 2025 (घटती-घटना)। सरगुजा अंचल में इन दिनों महंगाई ने आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। खासकर रसोई का बजट पूरी तरह से गड़बड़ा गया है। बारिश शुरू होते ही सçजयों की कीमतें आसमान छू रही हैं और दालों की कीमत भी लगातार बढ़ती जा रही है। हालात ऐसे हो गए हैं कि कई परिवारों के थाली से दाल और हरी सçजयां गायब हो गई हैं। अंबिकापुर के सजी बाजारों में इस समय केवल लौकी एकमात्र ऐसी सजी है जो 30 से 40 रुपये प्रति किलो की दर से मिल रही है। अन्य सभी हरी सçजयां 60 से 80 रुपये किलो तक बिक रही हैं। सबसे महंगी सजी के रूप में खेखसा (छोटे आकार की विशेष सजी) बाजार में 400 रुपये प्रति किलो बिक रही है।
भिंडी और डोडका,जो पहले 20-30 रुपये किलो बिक रहे थे,अब 80 रुपये किलो में बिक रहे हैं। फूलगोभी की कीमत 100 रुपये किलो और शिमला मिर्च 40 रुपये पाव (160 रुपये किलो) तक पहुंच चुकी है। महज सçजयां ही नहीं,बल्कि प्रोटीन का मुख्य स्रोत दाल भी अब आम लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही है। अरहर, मसूर और मूंग की दालें 180 से 200 रुपये प्रति किलो बिक रही हैं। कई घरों में अब दाल बननी बंद हो गई है, जिससे रसोई का स्वाद और पोषण दोनों ही प्रभावित हो रहा है।
बारिश और बिचौलियों की दोहरी मार
सçजयों की महंगाई के पीछे दो प्रमुख कारण सामने आ रहे हैं—पहला,बारिश के कारण स्थानीय सजी की फसल बर्बाद हो गई है। दूसरा, बिचौलियों की सक्रियता ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। स्थानीय सजी विक्रेताओं के अनुसार, अंबिकापुर के कंपनी बाजार में थोक सजी आती है, लेकिन सिलफिली व अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में बिचौलियों ने किसानों से सीधा माल खरीदकर मंडियों में पहुंचाने की बजाय अन्यत्र भेजना शुरू कर दिया है। इससे स्थानीय मंडियों में आपूर्ति कम हो गई है और कीमतें तेजी से बढ़ी हैं।
सरकार से राहत की उम्मीद
महंगाई से परेशान आम लोग अब सरकार से राहत की उम्मीद कर रहे हैं। लोगों की मांग है कि उचित मूल्य की दुकानों पर सजी व दाल जैसे आवश्यक वस्तुएं भी उपलध कराई जाएं, ताकि गरीब व मध्यम वर्ग के लोग भी संतुलित आहार ले सकें। अंबिकापुर में बढ़ती महंगाई ने लोगों की रसोई को सीधे तौर पर प्रभावित किया है।
सçजयों और दालों की बढ़ती कीमतों के चलते आम आदमी की थाली से पोषण गायब होता जा रहा है। किसानों की फसलें बर्बाद होने,बिचौलियों की सक्रियता और आपूर्ति की कमी ने स्थिति को और विकट बना दिया है। अब जरूरत है कि प्रशासन इस दिशा में गंभीरता से कदम उठाए और आम जन को राहत प्रदान करे,ताकि हर घर की रसोई में फिर से दाल और सçजयों की खुशबू लौट सके।
पाव के हिसाब से बिकने लगी सब्जियां
मौजूदा हालात ऐसे हो गए हैं कि सçजयों के भाव अब किलो की बजाय पाव में बताए जा रहे हैं। 500 रुपये की सजी से झोला भी भर नहीं पा रहा। कुछ महीने पहले तक जहां 300-400 रुपये में दो-तीन दिन की सजी आ जाती थी,अब 500 रुपये में भी पर्याप्त नहीं मिल रही है। हरित सçजयां पोषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं,लेकिन बढ़ती कीमतों ने इन्हें आम थाली से दूर कर दिया है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए जरूरी पोषण तक सीमित हो गया है। अधिकतर परिवारों ने अपने खानपान में कटौती करनी शुरू कर दी है। अब सप्ताह में एक-दो बार ही सजी बन रही है, वह भी सीमित मात्रा में।
रसोई का बजट डगमगाया
कई घरों में महीने का राशन पहले 5000-6000 रुपये में आ जाता था, लेकिन अब वही बजट 8000-9000 रुपये तक पहुंच गया है। चावल,आटा,दाल,तेल और सçजयों की महंगाई ने मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग के लोगों की कमर तोड़ दी है। 500 रुपये लेकर बाजार जाने पर अब सिर्फ दो-तीन आइटम ही मिल पाते हैं। स्थानीय सजी विक्रेता बताते हैं कि सçजयों की आपूर्ति लगातार घट रही है। बारिश के कारण खेतों में फसलें सड़ गई हैं, जिससे उत्पादकता घट गई है। वहीं, बिचौलिए किसानों से माल खरीदकर सीधा बाहर भेज देते हैं। इससे स्थानीय बाजारों में सजी की कमी हो रही है और दाम तेजी से बढ़ रहे हैं। एक विक्रेता ने बताया,अब सजी किलो में नहीं, पाव में बिक रही है। ग्राहक भी परेशान हैं,लेकिन हमारे पास भी कोई विकल्प नहीं है। सजी का थोक दाम ही बहुत ज्यादा है।
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