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अंबिकापुर@निजी स्कूलों सहित शासकीय स्कूलों में छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम की किताबें ही चलेंगे…पर किताबों की आपूर्ति भगवान भरोसे…

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  • शासकीय स्कूलों तक किताब पहुंच नहीं पाई, अब निजी स्कूलों तक किताब कैसे पहुंचेगी?
  • निजी व शासकीय स्कूलों तक किताब पहुंचने में आ रही है कई दिक्कतें…
  • एक जिले के निजी स्कूल को पुस्तक लेने के लिए अंबिकापुर के डिपो में एक दिन का समय और एक दिन में मात्र 56 स्कूलों को ही मिल पा रहा है पुस्तक…
  • कोरिया के 126 निजी स्कूलों को किताब देने का दिया आदेश, वितरण सिर्फ 57 को बाकी खाली हाथ लौटे…
  • छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम की लापरवाही,आदेश से निजी स्कूल हो रहे परेशान…
  • अंबिकापुर स्थित पुस्तक भंडार में निजी स्कूल का लगा हुजूम…प्रभारी ने कहा हम क्या करें…
  • जो कार्य सत्र आरंभ होने के पूर्व जून माह में हो जाना था संपन्न,उसके लिए विद्यालय खुलने के एक माह बाद तक जद्दोजहद
  • सिर्फ चंद कर्मचारी के भरोसे किताबें बांटने क जिम्मा और बदहाल व्यवस्था
  • कर्मचारियों की कमी और बारकोड स्कैनिंग ने बिगाड़ी वितरण की व्यवस्था, विद्यालयों में पढ़ाई पर असर
  • किताबों के बारकोड स्कैनिंग के चलते शिक्षक और स्कूल प्रबंधन परेशान

न्यूज डेस्क-
अंबिकापुर,13 जुलाई 2025 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ में अब जो भी निजी स्कूल हैं,जो छत्तीसगढ़ बोर्ड से या छत्तीसगढ़ के रजिस्ट्रेशन पर स्कूल संचालित हो रही है,वह निजी स्कूल में भी छत्तीसगढ़ पाठ्यक्रम की पुस्तक चलेंगे। सभी स्कूलों में अब अपने मनमानी किताबें नहीं चला पाएंगे। अब सभी को छत्तीसगढ़ पाठ पुस्तक निगम के द्वारा ही किताब उपलध कराई जाएगी, जिसका आदेश छत्तीसगढ़ शिक्षा विभाग ने जारी कर दिया था। इससे निजी स्कूलों पर जो अभिभावकों का किताब में अधिक पैसा खर्च होता था,वह भी अब बच जाएगा। वहीं आरटीई के तहत भी पढ़ रहे बच्चों को किताबों के बोझ से मुक्ति मिलेगी पर समस्याएं भी कम नहीं है,छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम के आदेशानुसार पूरे प्रदेश में शासकीय किताबों का वितरण किया जा रहा है। सरगुजा संभाग से लेकर पूरे संभाग में फैली अव्यवस्था से निजी स्कूल संचालक काफी परेशान हो रहे हैं। ऐसा ही कुछ आलम अंबिकापुर में स्थित पुस्तक भंडार में देखने को मिला,जहां 10 जुलाई गुरुवार को कोरिया और एमसीबी जिले के 269 निजी स्कूलों के लिए पुस्तक वितरण करने का दिन दिया गया। जिसमें लगभग 50 स्कूलों को पुस्तक मिल सका। अंबिकापुर बुक डिपो प्रभारी गुलाबराम केरकेट्टा ने बताया कि शासन के आदेश का पालन कर रहे,जबकि यह समस्या पूरे प्रदेश में व्याप्त है, जबकि पुरे संभाग में 1000 से अधिक निजी स्कूल है।
सुबह से निजी स्कूल के शिक्षकों के साथ कर्मचारी हुए परेशान
कोरिया,एमसीबी से निजी स्कूलों की संख्या 269 के स्कूलों के प्रतिनिधि सहित स्कूल संचालक सरगुजा संभाग में पाठ्य पुस्तक वितरण व्यवस्था में अव्यवस्था और बदइंतजामी से परेशान हैं। अंबिकापुर के शंकर घाट स्थित पाठ्य पुस्तक निगम के गोदाम से संभाग भर के प्राइवेट स्कूलों के किताबें वितरण की जा रही हैं, लेकिन चुनिंदा कर्मचारियों के भरोसे भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। गुरुवार को कोरिया और एमसीबी जिले के स्कूलों के लिए किताब वितरण की तिथि करीब 250 स्कूलों के संचालक और स्टाफ किताब लेने के लिए स्वयं के वाहन और साधन तथा मजदूरों के साथ पहुंचे परंतु अव्यवस्था का आलम यह रहा कि लगभग 50 से 60 स्कूल संचालकों को ही किताबें मिल पाए और बाकी स्कूल संचालकों को खाली हाथ लौटना पड़ा। जो स्कूल संचालक दूर दराज से आए थे, घंटो इंतजार करने के बावजूद उन्हें किताबें नहीं मिल पाई।
शासकीय स्कूलों तक किताब पहुंच नहीं पाई तब निजी स्कूलों तक किताब कैसे पहुंचेगी?
विगत सत्र में करोड़ों की शासकीय किताबों का कबाड़ में बेचा जाना शिक्षा विभाग और छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम पर सवालिया निशान लगा गया था। जिससे बचने के लिए इस बार छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम और छत्तीसगढ़ सरकार ने पुस्तकों में बारकोड स्कैनिंग की व्यवस्था बना रखी है, जिससे छापी जाने वाली प्रत्येक पुस्तकों का हिसाब रखा जा सके। शिक्षा सत्र प्रारंभ हुए एक माह बीत चुके हैं, परंतु अभी तक छत्तीसगढ़ में संचालित शासकीय विद्यालयों में ही पुस्तकों की आपूर्ति नहीं हो पाई है। ग्राउंड स्तर पर रिपोर्ट लेने के पश्चात यह पाया गया कि शासकीय विद्यालयों में 20 प्रतिशत पुस्तक भी अभी तक नहीं पहुंचे हैं। आनन-फानन में शिक्षा सत्र के प्रारंभ के दबाव को लेकर और शाला प्रवेश उत्सव मनाने के लिए कुछ विषयों की चंद किताबों का वितरण विद्यालयों में किया गया है, बाकी पुस्तकों का अभी तक कोई अता-पता नहीं है। इससे पढ़ाई तो प्रभावित हो ही रही है, सरकार की किरकिरी भी हो रही है। क्योंकि जिस गंभीरता के साथ सरकार ने युक्तियुक्त कारण कर विद्यालयों में शिक्षकों के पद को समाप्त किया।और नए सेटअप को लागू किया, उतनी गंभीरता शायद विद्यालयों में पढ़ाई सुनिश्चित करने के लिए किताब वितरण में नहीं दिखाई।
जो कार्य सत्र आरंभ होने के पूर्व जून माह में हो जाना था संपन्न,उसके लिए विद्यालय खुलने के एक माह बाद भी जद्दोजहद
विद्यालयों में किताबों की आपूर्ति और निजी विद्यालयों के लिए छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम द्वारा छापी गई पुस्तकों द्वारा अध्ययन अध्यापन की तैयारी जहां सत्र आरंभ होने के पूर्व माह जून में ही कर ली जानी थी, वह प्रक्रिया अब तक संपन्न नहीं हो पाई है। निजी विद्यालयों की बात छोडि़ए, शासकीय विद्यालयों में भी पुस्तक के अभाव में छात्रों की पढ़ाई प्रभावित है। परंतु इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। पढ़ाई के लिए सत्र आरंभ के पूर्व जो तैयारी सरकार और छत्तीसगढ़ पाठ्यपुस्तक नियम के द्वारा की जानी थी, उस पूरे समय तक छत्तीसगढ़ शासन का फोकस केवल नए सेटअप बनाने में, शिक्षकों के पद समाप्त करने में और युक्तियुक्त करण करने में व्यतीत हुआ। और जिस गंभीरता के साथ इस प्रक्रिया को पूरा किया गया,यदि इस गंभीरता के साथ शिक्षण सत्र को प्रारंभ करने के लिए दिखाई जाती तो स्थिति कुछ और होती। यह सही है कि निजी विद्यालयों में छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम की छपी पुस्तकों के द्वारा अध्यापन कराए जाने से निजी विद्यालयों की मनमानी पर अंकुश लगेगा और अभिभावकों को महंगी किताबें को खरीदने का बोझ का सामना नहीं करना पड़ेगा, परंतु दिन प्रतिदिन समय बीतने पर जहां पढ़ाई प्रभावित हो रही है,वहीं इस सत्र में अभिभावकों को प्रत्यक्ष लाभ मिलता नहीं दिख रहा। क्योंकि सत्र आरंभ होने के पश्चात एक माह का समय बीत चुका है,और लगभग निजी विद्यालयों के सभी छात्र-छात्राओं ने विद्यालय द्वारा संचालित पुस्तकों को खरीद लिया है। अभी भी अव्यवस्था का आलम यह है कि आगे कितने दिनों तक पुस्तकों की आपूर्ति हो पाएगी यह कह पाना संभव नहीं है।
किताबों के बारकोड स्कैनिंग के चलते शिक्षक और स्कूल प्रबंधन परेशान
छत्तीसगढ़ पाठ्य पुस्तक निगम द्वारा छापी गई किताबों के हिसाब-किताब के लिए इस बार प्रत्येक पुस्तक में बारकोड स्कैनिंग की व्यवस्था सरकार द्वारा की गई है। परंतु इसमें भी भारी अनियमितता देखने को मिल रही है। जहां एक ओर सरकार के सही तरीके से ना चलने पर पुस्तकों को स्कैन करने में शिक्षक और कर्मचारियों को बेहद दिक्कत आ रही है, वहीं कई पुस्तकों में बारकोड के सही तरीके से प्रिंट न होने के कारण वह स्कैन नहीं हो पा रहा, जिसका अलग से हिसाब-किताब सरकार को प्रस्तुत करना है। समझ में यह नहीं आता कि यह व्यवस्था सरकार द्वारा क्यों की गई है। जब ऑनलाइन प्रक्रिया के चलते और यू-डाइस के माध्यम से शासकीय विद्यालयों में अध्ययन कर रहे छात्रों की कक्षा वार कुल संख्या सरकार के पास उपलध है तो छात्रों की संख्या अनुसार किताबों की छपाई कर प्रदान कर देना ज्यादा आसान कार्य था, बजाय बारकोड स्कैनिंग कर किताबों के हिसाब किताब रखने से। परंतु शिक्षा विभाग में पदस्थ अधिकारियों को न जाने क्या सूझा की एक और बोझ शिक्षकों के माथे डाल दिया गया।


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