- जिन्हें पाना है सम्मान वह दे मोटी रकम…हम करेंगे कार्यक्रम आप होंगे सम्मानित…क्या अब मीडिया जगत का यही है प्रचलन?
- चौथा स्तंभ कमियां दिखाने व आलोचना के अलावा पैसा वसूल कर कार्यक्रम आयोजित कर अब सम्मानित करने के लिए रह गए हैं?
- 30-50 हजार में मिल रहे निजी चैनलो के इवेंट में पुरुस्कार, निजी चैनलों के पुरुस्कार पर सरकार जारी कर रही विज्ञप्ति…


-भूपेन्द्र सिंह-
अम्बिकापुर,01 जनवरी 2025(घटती-घटना)। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अब अपनी अलग ही स्थिति बयां कर रहा है, कहीं ना कहीं लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का बोझ ढो रहे लोग अब सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अब अपने कार्यप्रणाली से भटक कर चापलूसी प्रणाली में आ गया है? अब आप सोच रहे होंगे कि यह बात क्यों हो रही है तो यह बात इसलिए हो रही है क्योंकि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ का काम आइना दिखाना हुआ करता था, अखबार यह मीडिया सरकार को उनकी कमियों का आईना दिखाया करती थी, उनकी आलोचना किया करती थी और उन्हें सही मार्ग के लिए मार्गदर्शक बनती थी, जिस मार्ग पर चल के सरकारे लोगों का भला कर सके, वही जिस समय कोई संसाधन नहीं थे उसे समय सिर्फ अखबार ही आजादी के आंदोलन का हिस्सा था और आजादी की लड़ाई में उसकी अहम भूमिका थी उसे समय की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता में अंतर तो आ ही गया है,पर उसे समय की पत्रकारिता कभी भी चापलूसी के लिए नहीं हुई,जब भी हुई तो वह देश हित के लिए हुई,राज्यहित के लिए हुई,जिलेहित के लिए हुई, पर अभी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका एकदम से अलग हो गई है अभी अलग ही रूप ले लिया है,कुछ वर्षों से इंवेट के नाम पर निजी चैनलो द्वारा पुरुस्कृत करने की प्रथा शुरू हुई है, इसमे बिना काम के आंकलन किए स्टेटस जाने बिना निजी चैनल वाले एक दिन में अपनी कमाई की पूर्ति करने ऐसे अधिकारियों को चुनते है जो उन्हें भरपूर आर्थिक मदद कर सके। अब इसमे ऐसे समूहों को भी पुरुस्कृत किया जाने लगा है जो अपनी वाहवाही लोगो तक पहुंचना चाहते है। और बड़ी बात यह कि सरकार का जनसंपर्क विभाग इस निजी चैनल के पुरुस्कार की खबर प्रकाशित करवा रही है। राज्य में निजी चैनलो के द्वारा किसी विषय को लेकर मंत्रियों और नेताओं को बुलाकर डिबेट के नाम पर इंवेट का आयोजन किया जा रहा है, जिसमे भारीभरकम राशि खर्च होती है,आलीशान होटलों में ऐसे इवेंट के आयोजन होता है, लाइटिंग, कैमरा से लेकर लाइव प्रसारण तक का भुगतान का खर्च कई लाखो में आता है, इस आयोजन में नेताओ की खुद की लाइव तस्वीर दिखाने की बात कही जाती है जिसके कारण कार्यक्रम में जिसे पुरस्कृत किया जाना है सबसे एक फिक्स अमाउंट की मांग होती है, बिना राशि जमा किए उसे कोई पुरस्कार नही दिया जाता है। ऐसा ही इंवेंट निजी चैनलो के साथ कुछ अब एनजीओ भी करने लगे है,और अब कुछ अखबार भी इस तरह के आयोजन में उतरने को तैयार है,तो कुछ उतर चुके है।
कोई काम का नही…पर पुरस्कार…लगे हैं कई आरोप
निजी चैनलो के इंवेंट में ऐसे अधिकारियों कमर्चारियों को पुरस्कृत किया जाता है जो किसी के काम मे नही रहते है कई तो ऐसे रहते है जिन ओर भ्रस्टाचार के आरोप लगे होते है, जिन पर आरोप लग रहे है उनकी सरकार जांच नही करवा रही है और निजी चैनल उन्हें पुरस्कृत कर रहे है, मीडिया की जानकारों की मानें तो इसमे ऐसे अधिकारी को मोमेंटो और पुरस्कार का सर्टिफिकेट देने के लिए 30 से 50 हजार की राशि फिक्स की गई होती है, ऐसे में ऐसे लोगो से बात की जाती है जिसकी कमाई की हर कहीं चर्चा हो रही होती है उसे बाकायदा बोला जाता है देखिये आप का तो बहुत नाम चल रहा है, हमारे इंवेंट में भी हाथ बँटाइये आपका और नाम हो जाएगा, आपको मंत्री जी के हाथों पुरुस्कार दिलवाया जायेगा। यदि आप कुछ कहना चाहते है तो उसका अलग से राशि इतनी राशि का खर्च लगेगा। ऐसे में खर्च को देख पुरस्कार के दीवाने डिमांड तय कर राशि मुहैय्या कराते है और बाकायदा ऐसे इवेंट में भाग लेने सरकारी छुट्टी मिली तो ठीक नही मिली तो ठीक वो पहुंच कर कोर्ट टाई मारकर मंत्री जी के हाथों अवार्ड पा जाते है,और फिर खुद को एकदम ईमानदार और कर्मठ बताते हुए सोशल मीडिया में मंत्री जी के साथ फोटो पोस्ट कर देते है ताकि उनके सुप्रीम बॉस भी देख ले कि हमे मंत्री जी से पुरस्कार मिला है। स्थिति तो यह भी देखी गई है कि एक ही प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल के हाथों कई बार एक ही काम के लिए सम्मानित हो रहे हैं, ऐसा लगता है कि उस न्यूज़ चैनल के लिए वह व्यक्ति आइडल हो गया है और उसे न्यूज़ चैनल अधिग्रहित कर लिया है क्या यही वजह है कि बार-बार उसे अपनी आयोजित कार्यक्रम में बुलाकर सम्मानित किया जाता है या फिर उसे हर बार सम्मानित होने के लिए मोटी रकम चुकानी पड़ती है।
30 से 50 हजार है रेट
ऐसे इंवेंट में छोटे चैनल से लेकर कुछ नामचीन चैनलों में 30 से 50 हजार का रेट तय किया हुआ है। इवेंट होने के पूर्व अधिकारियों कर्मचारियों में चर्चा आम हो जाती है कि फलाने चैनल वाला आया था उसको इतने की व्यवस्था करवानी है, इतने में पुरुस्कार भी देने को बोला है,हालात यह रहती है कि ऐसे निजी चैंनलों में कहीं-कहीं कमिश्नर से लेकर कलेक्टर तक पहुंचते है। कई तरह की व्यवस्था प्रशासन के द्वारा ही व्यवस्था की जाती है।
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