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लेख@ जोर जबरदस्ती केवल बलात्कार है,मैरिटल रेप कानून विवाद

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एक लंबे समय से विवाह उपरांत पति द्वारा जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाने को मैरिटल रेप के अंतर्गत कानून संहिता में शामिल करने पर विचार विमर्श किया जा रहा है । इस मुद्दे को लेकर देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। केंद्र सरकार ,राज्य सरकार तथा अनेकों संस्थाओं इत्यादि द्वारा इस पर वाद विवाद बना हुआ है। विश्व में ऐसे बहुत से देश हैं जिसमें मैरिटल रेप को कानून में शामिल किया गया है। परंतु भारतीय कानून व्यवस्था में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि विवाह के पश्चात पति या उसके परिवार द्वारा किए गए मानसिक, शारीरिक उत्पीड़न इत्यादि को लेकर कई तरह के कानून है। इस मुद्दे पर बात करने से पहले हमें यह समझना बहुत जरूरी है कि आखिर बलात्कार क्या है? किसी भी तरह की जोर जबरदस्ती द्वारा शारीरिक संबंध बनाने को बलात्कार कहा जाता है। यह एक अमानवीय घिनौना अपराध है। यदि कोई नारी शारीरिक संबंध बनाने में अपनी सहमति नहीं देती है, ऐसे में उस से की गई जबरदस्ती बलात्कार है। चाहे वह स्त्री विवाहित हो या अविवाहित । भारतीय संस्कृति में विवाह को समाज की व्यवस्था से इस तरह जोड़ा गया है कि इसे पवित्र बंधन की तरह देखा जाता है। यह प्रथा न सिर्फ दो लोगों को विवाह बंधन में बंधती है बल्कि दो परिवारों और समाज की व्यवस्था को सुचारित करती है। यदि हम इस पवित्र रिश्ते पर विचार करें तो यह पवित्र बंधन दो शरीरों का मिलन नहीं बल्कि आपसी सामंजस्य और आत्माओं का मिलन है । ऐसे में यदि यह रिश्ता केवल शारीरिक जरूरत की नजर से देखा जाए तो यह कतई न्याय संगत नहीं होगा । विवाह से कतई यह मतलब नहीं है कि कोई व्यक्ति अपने पार्टनर के साथ किसी भी तरह की जबरदस्ती करने के लिए स्वतंत्र है । किसी भी तरह का शारीरिक मानसिक उत्पीड़न यदि अपराध है तो जबरदस्ती से किया गया संभोग भी अपने आप में एक जघन्य अपराध है। विवाह संभोग का लाइसेंस नहीं है। कुछ लोगों का मत है कि यदि इस मुद्दे को मैरिटल रेप की श्रेणी में रखा गया तो इसका दुरुपयोग होगा तथा यह साबित करना मुश्किल हो जाएगा कि यह है रेप है या नहीं। दूसरी तरफ यदि हम इस मुद्दे की गंभीरता को समझे और देखें तो किसी भी तरीके के बलात्कार को साबित करना एक चुनौती है। अक्सर बलात्कारी दावों सबूतों गवाहों इत्यादि की वजह से कानून मुक्त हो आजादी से घूमते नजर आते हैं। यही वजह है कि समाज में बलात्कार के किस्से दिन प्रतिदिन बढ़ते चले जा रहे हैं । बलात्कार को साबित करने के लिए मेडिकल जांच का सहारा लिया जाता है क्योंकि जबरदस्ती से बनाए शारीरिक संबंध और प्रेमलिप्त (मर्जी से किए) संभोग में अन्तर किया जा सकता है । संकीर्ण सोच के वो लोग जो आज भी नारी को केवल संभोग की वस्तु समझते हैं या उसे पर अपना आधिपत्य समझते हैं, अपने पुरुषोत्व को साबित करने के लिए बलात्कार का सहारा लेते हैं । ऐसे बहुत से किस्से सामने आते है जिनमें वैवाहिक पुरुष अपनी पत्नियों को दबाने या उन्हें दंडित करने के लिए भी उनके साथ बिना उनकी सहमति के संभोग करते हैं ।जो बलात्कार का ही रूप है। फिर क्यों इस मुद्दे पर इतना सोच विचार किया जा रहा है? कोई भी विवाहित स्त्री यदि अपने परिवार अपने पति से खुश है तो वह मैरिटल रेप जैसे कानून का सहारा कतई नहीं लगी। यह कहना गलत नहीं होगा कि एक तरफ जहां नारी को सशक्त करने की बातें होती हैं वही दूसरी तरफ उसके व्यक्तित्व को उभरने नहीं दिया जाता है। चाहे समय कितना भी बदल गया हो आज हम कितने भी आधुनिक हो गए हो, नारी पढ़ी लिखी, कामकाजी बन गई हो मगर समाज आज भी एक दोहरे रूप में सांस ले रहा है। जहां मानवीय मूल्यों का हनन हो रहा है । देश में आए दिन बलात्कार की केस बढ़ते चले जा रहे हैं। आज हमें यह समझने की जरूरत है कि कानून इतना लचीला नहीं होना चाहिए की अपराधी को अपराध का खौफ न हो और वह उसके साथ खेल सके, उसका गलत फायदा उठा सके। समाज की नींव को मजबूत करने के लिए समाज में पनप रही कुरीतियों का हनन बेहद जरूरी है । आदमी और औरत दोनों ही सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलने के लिए आवश्यक है तथा उन में सामंजस्य होना जरूरी है ।
केशी गुप्ता
द्वारका दिल्ली


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