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रायपुर@जैव उर्वरको के उपयोग से और बेहतर हो रही है गौठानो मे उत्पादित वर्मी कम्पोस्ट और सुपर कम्पोस्ट की गुणवत्ता

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वर्मीकम्पोस्ट, गोबर खाद एव अन्य जैविक खादो के जैविक सवर्धन की विधि:
वर्मीकम्पोस्ट या अन्य जैविक खाद निर्माण होने के उपरान्त जब उसमे 25-30 प्रतिशत नमी रहे उस अवस्था मे उसे छन्नी से छान ले।
छन्नी से छानने के बाद प्राप्त जैविक खाद को जैव उर्वरक के घोल से निम्नानुसार उपचारित करे:

  1. वर्मीकम्पोस्ट या अन्य जैविक खाद के 1 म्टिल मात्रा को 1 लीटर तरल जैव उर्वरक या 1 कि.ग्रा. पावडर जैव उर्वरक के द्वारा उपचारित करे।
  2. उपचार हेतु तरल जैव उर्वरक के 1 लीटर या पावडर जैव उर्वरक के 1 कि.ग्रा. मात्रा को 5 लिटर पानी मे घोलकर 1 म्टिल वर्मी कम्पोस्ट या जैविक खाद मे छिड़काव करे एव अच्छी तरह से मिलाए।
  3. जैव उर्वरको के मिलाने के समय इस बात का ध्यान रखे कि इतना पानी जैव उर्वरक के घोल के साथ वर्मीकम्पोस्ट या जैविक खाद मे मिलाये कि उसमे नमी की मात्रा लगभग 40 प्रतिशत पहुॅच जाय।
  4. उपचारित वर्मीकम्पोस्ट को जूट की बोरिया या पैरा से ढककर 7-10 दिनो के लिए ठण्डे एव छाव के नीचे सवर्धन के लिए छोडे।
  5. सवर्धन के पश्चात तैयार सवर्धित वर्मीकम्पोस्ट को प्लास्टिक के बोरी मे भरकर ठण्डे स्थान पर भण्डारित करे।
    रायपुर, 08 अगस्त, 2022। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा जैविक कृषि को बढ़ावा देने एव रासायनिक कृषि को हतोत्साहित करने के लिए सचालित गोधन न्याय योजना के अन्तर्गत पूरे प्रदेश मे गौठानो की स्थापना की जा रही है। इन गौठानो मे गाय के गोबर से वर्मीकम्पोस्ट एव सुपरकम्पोस्ट का निर्माण किया जा रहा है, जिससे कृषि मे रासायनिक उर्वरको पर निर्भरता कम हो रही है, मृदा स्वास्थ्य मे सुधार हो रहा है तथा उर्वरता मे वृद्धि हो रही है। गौठानो मे निर्मित सुपरकम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट मे पोषक तत्वो की मात्रा प्राकृतिक रूप से बढ़ाने हेतु इदिरा गाधी कृषि विश्वविद्यालय एव छत्तीसगढ़ बायोटेक्नोलॉजी प्रमोशन सोसायटी के सयुक्त प्रयास से प्रभावी मित्र सूक्ष्म जीवो युक्त उर्वरा शक्ति नामक तरल जैविक कल्चर तैयार किया गया है, जिसका उपयोग गौठानो मे निर्मित सुपरकम्पोस्ट एव वर्मीकम्पोस्ट के
  6. गुणवत्ता उन्नयन एव उसे समृद्ध बनाने हेतु किया जा रहा है। जैव उर्वरको के उपयोग का प्रशिक्षण देने के लिए प्रदेश के 27 कृषि विज्ञान केन्द्रो के सहयोग से गौठानो मे प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, जिसमे गौठान समितियो के सदस्यो के साथ-साथ महिला स्व-सहायता समूह के सदस्य भी शमिल हो रही है। इस प्रशिक्षण कार्यकम द्वारा प्रदेश के 150 गौठानो के 1500 गौठान समिति के सदस्य, एव स्वसहायता समूहो के सदस्यो को प्रशिक्षित किया गया है। इदिरा गाधी कृषि विश्वविद्यालय एव छत्तीसगढ़ बायोटेक्नोलॉजी प्रमोशन सोसायटी द्वारा निर्मित जैव उर्वरको मे राइजोबियम कल्चर, फास्फोरस सोल्यूबलाईजिग बैक्टीरिया कल्चर, एजोस्पाइरिलम, जिक सोल्यूबलाईजिग बैक्टीरिया कल्चर एव पोटेशियम सोल्यूबलाईजिग बैक्टीरिया कल्चर शामिल है। गौठानो मे निर्मित खाद चूकि प्राकृतिक पदार्थ है अतः यह पर्यावरण के दृष्टिकोण से कृषि हेतु अति उत्तम जैविक खाद है। यह मिट्टी को पोषक तत्वो के साथ-साथ जैविक रूप से समृ¸द्ध बनाने हेतु अति उपयोगी है। इन खादो मे स्थानीय फसल आवश्यकताओ को देखते हुए प्रभावी लाभदायक सूक्ष्मजीवो का समावेश कर दिया जावे तो इनके गुणवत्ता मे वृद्धि होगी। कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिको द्वारा डी.ए.पी. एव म्यूरेट आफॅ पोटाश की आवश्यकताओ एव पूर्ति को दृष्टिगत रखते हुए विभिन्न फसलो मे पी.एस.बी. एव के.एस.बी. जैव उर्वरको का उपयोग करने की सलाह दी जा रही है। गोठानो मे निर्मित जैविक खादो को उपरोक्त जैव उर्वरको से जैव सवर्धित किया जाय तो इनके द्वारा प्रदाय की गई स्फुर एव पोटाश से फसलो को आवश्यक पोषक तत्वो की काफी मात्रा मे पूर्ति की जा सकती है। पी.एस.बी. कल्चर से उपचारित जैविक खादो के प्रयोग से फसल को लगभग 15-20 किलोग्राम/हेक्टेयर स्फुर की आपूर्ति की जा सकती है। इसी तरह के.एस.बी. कल्चर से उपचारित जैविक खाद के प्रयोग से 12-15 किलोग्राम पोटाश की आपूर्ति प्रति हेक्टेयर की जा सकती है। वर्तमान मे प्रदेश के कुछ क्षेत्रो मे धान की खेती मे जस्ते (जिक) की कमी पाई गई है जिससे धान का उत्पादन बुरी तरह से प्रभावित होती है। ऐसे क्षेत्र के लिए जिक घोलक जीवाणु (जेड.एस.बी.) तरल कल्चर का उपयोग किया जा सकता है। बस्तर के काफी क्षेत्र मे मक्के की खेती की जाती है जिसका उत्पादन बढ़ाने मे पोटाश की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
  7. हल्की मृदाओ मे उगायी जाने वाली मक्का फसल हेतु पोटाश घोलक जीवाणु (के.एस.बी.) कल्चर से उपचारित जैविक खाद का प्रयोग निसदेह मक्का की अच्छी पैदावार हेतु उपयोगी सिद्ध होगा।
  8. इदिरा गाधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विभिन्न फसलो के लिए बायो इनरिज्ड जैविक खाद के उपयोग हेतु अनुशसा की गई है जिसके तहत धान फसल मे एजोस्पाइरिलम, पी.एस.बी., जेड.एस.बी. जैविक खाद के उपयोग की अनुशसा की गई है, सोयाबीन, अरहर, मूग, उड़द, चना, तिवड़ा, कुल्थी तथा मसूर फसल मे राइजोबियम, पी.एस.बी. कल्चर जैविक खाद का उपयोग किया जा सकता है। सरसो, तिल एव सुरजमुखी फसल मे एजोस्पाइरिलम, पी.एस.बी. जैविक खाद के उपयोग की अनुसशा की गई है। गेहू, अलसी एव कुसुम फसल मे एजोटोबैक्टर, पी.एस.बी. जैवकि खाद के उपयोग की अनुसशा की गई है। इसी तहर मक्का फसल मे एजोटोबैक्टर, पी.एस.बी., के.एस.बी., कोदो एव कुटकी फसल मे एजोटोबैक्टर, पी.एस.बी., जेड.एस.बी., रागी फसल मे एजोस्पाइरिलम, पी.एस.बी. तथा सबजी, फल, फूल मे एजोटोबैक्टर, पी.एस.बी., जेड, एस.बी., के.एस.बी. जैविक खाद के उपयोग की अनुसशा की गई है।

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