-ओमकार पाण्डेय-
सूरजपुर 19 जुलाई 2022(घटती-घटना)। जिले का परिवहन विभाग अपनी कार्यप्रणाली को लेकर सुçर्ख़यों में है। बताते है कि यह दफ्तर लोकसेवा के लिए कम दुकानदारी के लिए ज्यादा पहचाने जाने लगा है।यहां हर काम के लिए रेट तय कर दिए गए है आप सुविधा शुल्क दीजिए और आपका काम मिंटो में नियम से काम की उम्मीद किये तो फिर घूमते रहिए कोई माई बाप नही है सुनने वाला…? सूत्र जो बताते है उंसके अनुसार हर काम के लिए अलग अलग रेट तय कर रखे गए है।जबकि सरकार इन्हें लोकसेवा के दायरे में रखते हुए अफसर से लेकर कर्मचारियों तक को वेतन देती है फिर भी आम आदमी के लिए कोई राहत नही है।लर्निंग लाइसेंस व परिवहन संबंधित किसी भी प्रकार के दस्तावेज बनवाने के लिए आपको सुविधा शुल्क देने ही होंगे। दफ्तर में दलाल कहे या एजेंट उनका रसूख चलता है। जिससे आरटीओ दफ्तर में किसी भी काम के लिए सीधे पहुंचने वालों का काम नहीं होता। वहां के कर्मचारी सीधे पहुंचने वालों को कई प्रकार के नियमों व दस्तावेज के मामले में उलझा देते हैं। वहीं दलालों के माध्यम से किसी भी काम को कराने वालों का काम तत्काल हो जाता है। क्योकि एजेंटों का सीधे बाबूओं व अधिकारियों से सेटिंग रहता है। आरटीओ दफ्तर के परिसर में एजेंट का जमावड़ा रहता है। लाइसेंस व परिवहन सबंधित काम के लिए दफ्तर पहुंचने वालों से एजेंट सीधे संपर्क करते हैं। काम के लिए रकम तय होने के बाद एजेंट संबंधित बाबू व अधिकारी से मिलने दफ्तर में सीधे पहुंचते हैं और हिस्से का रकम देने के बाद काम तत्काल हो जाता है। ऐसे में सीधे काम के लिए पहुंचने वाले लोगों का काम नहीं होता और उन्हें काम के लिए विभाग का कई चक्क लगाना पड़ता है।
गाçड़ड़यों में झोल-झाल
यही नही दफ्तर के बाहर भी खुले आम नियमो की धज्जियां उड़ रही है।वजह आप समझ सकते है।कई ऐसे वाहन सड़को पर दौड़ रहे है जो सड़क पर चलने लायक नही है।बगैर परमिट की वाहने फर्राटे मार रही है कभी कोई पड़ताल नही,यात्री बसों से लेकर टैक्सी तक मे मनमाना किराया वसूला जा रहा है कोई सुनने देखने वाला नही।ऐसा नही की ये सब अफसरों के संज्ञान में नही है पर उन्हें जो राहत राशि मिल रही तो भलाई खमोशी में है।
ऑटो मतलब कोई नियम नही
शहर में ऑटो की भरमार है।सीएसपी डीके सिंह के कार्यकाल में इन ऑटो चालकों के लिए ड्रेस कोड,वाहन पर मोबाइल नम्बर और किराया आदि तय किये गए थे।उनके तबादले के बाद सब कायदे कागजो में सिमट गए। यह तय है कि ऑटो का संचालन ज्यादातर गरीब तबके के लोग कर रहे है पर यह भी तय है कि ऑटो में बैठने वाले भी गरीब है जिनके जेब ढीली हो रही है।मनमाना किराया से लेकर शहर में आयें बांए जहाँ पाए वही खड़ी कर यातायात की सूरत बिगाड़ रहे है।जितना मन चाहे उतना सवारी बैठा रहे कोई अंकुश नही..?दुर्घटना हो जाये तो फिर लकीर पीटते रहेंगे। इस पर जांच व अंकुश जरूरी है।
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