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संपादकीय@ इस्तीफा अंत नहीं,शिक्षा व्यवस्था में भरोसा लौटाने की शुरुआत होना चाहिए

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केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। लगातार छात्र आंदोलनों, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच उनका पद छोड़ना केवल एक व्यक्ति का इस्तीफा नहीं,बल्कि जवाबदेही और लोकतांत्रिक दबाव की शक्ति का प्रतीक बन गया है। पिछले एक दशक में यह उन विरले अवसरों में से एक है,जब व्यापक जनदबाव के बीच केंद्र सरकार के किसी वरिष्ठ मंत्री ने पद छोड़ा है। पिछले कुछ वर्षों में देश ने कई बड़े जनआंदोलन देखे। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ आंदोलन,कृषि कानूनों के विरोध में किसानों का लंबा संघर्ष और अब प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर छात्रों का असंतोष—इन घटनाओं ने बार-बार यह साबित किया कि लोकतंत्र में जनता की आवाज को लंबे समय तक नजरअंदाज करना आसान नहीं होता। इन आंदोलनों के कारण अलग-अलग रहे,लेकिन इनका साझा संदेश एक ही था—सरकार से जवाबदेही की अपेक्षा।
शिक्षा का क्षेत्र किसी भी राष्ट्र के भविष्य की नींव होता है। यदि परीक्षाओं की निष्पक्षता पर ही सवाल खड़े होने लगें,तो केवल लाखों छात्रों का भविष्य ही प्रभावित नहीं होता, बल्कि पूरी व्यवस्था पर जनता का भरोसा भी कमजोर पड़ता है। हाल के महीनों में प्रतियोगी परीक्षाओं,विशेषकर नीट से जुड़ी कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों ने देशभर में छात्रों और अभिभावकों में गहरी चिंता पैदा की। विपक्ष ने इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया, वहीं छात्र संगठनों ने इसे युवाओं के भविष्य से जुड़ा सवाल बताते हुए लगातार आंदोलन किए। बढ़ते दबाव के बीच धर्मेंद्र प्रधान ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने की घोषणा की।
अपने इस्तीफे में धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि उनका निर्णय छात्रों के हित,राष्ट्रीय एकता और शिक्षा व्यवस्था को राजनीतिक व कानूनी विवादों से बचाने की भावना से प्रेरित है। उन्होंने यह भी कहा कि छात्रों का भविष्य किसी भी विवाद से ऊपर है। यह बयान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है,लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि क्या इस्तीफे के बाद उन मूल कारणों का समाधान होगा, जिनकी वजह से यह स्थिति बनी। यही सबसे बड़ा प्रश्न है। क्या केवल मंत्री बदल जाने से परीक्षा प्रणाली में व्याप्त कमियां दूर हो जाएंगी? क्या भविष्य में पेपर लीक,परीक्षा संचालन में गड़बडि़यां और पारदर्शिता से जुड़े सवाल समाप्त हो जाएंगे? यदि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं है,तो स्पष्ट है कि समस्या किसी एक व्यक्ति की नहीं,बल्कि पूरी व्यवस्था की है।
देश को अब ऐसी परीक्षा प्रणाली की आवश्यकता है,जिसमें तकनीकी सुरक्षा मजबूत हो,परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय हो,दोषियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई हो और छात्रों का विश्वास दोबारा स्थापित किया जा सके। शिक्षा व्यवस्था में सुधार केवल प्रशासनिक बदलाव से नहीं, बल्कि संस्थागत सुधारों से संभव होगा।
यह घटनाक्रम राजनीतिक दलों के लिए भी एक संदेश है। सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि युवाओं की अपेक्षाएं पहले से कहीं अधिक हैं, जबकि विपक्ष के लिए भी यह अवसर केवल राजनीतिक लाभ लेने का नहीं,बल्कि शिक्षा सुधार पर ठोस सुझाव देने का होना चाहिए। शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर राजनीति से अधिक नीति की आवश्यकता है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि जनता सवाल पूछ सकती है और सत्ता को जवाब देना पड़ता है। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। लेकिन इतिहास इस घटना को केवल एक इस्तीफे के रूप में नहीं,बल्कि शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की शुरुआत के रूप में तभी याद रखेगा, जब सरकार पारदर्शी,विश्वसनीय और जवाबदेह परीक्षा प्रणाली स्थापित करने की दिशा में ठोस कदम उठाएगी। अन्यथा यह घटनाक्रम भी भारतीय राजनीति के अनेक प्रतीकात्मक इस्तीफों की सूची में दर्ज होकर रह जाएगा।


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