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बैकुंठपुर/कोरिया@ चार साल पहले मिला मध्यस्थीय अवार्ड…आज तक नहीं मिला मुआवजा…अब 21 जुलाई को राष्ट्रीय राजमार्ग पर आंदोलन का ऐलान

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  • जमीन अधिग्रहित कर ली…मुआवजा देने में चार साल की देरी…प्रशासन को 7 दिन का अंतिम अल्टीमेटम…
  • जमीन सरकार ले गई,अब हक के पैसे के लिए दर-दर भटक रहे’…भू-स्वामी ने दी एनएच-43 जाम करने की चेतावनी…
  • मध्यस्थीय अवार्ड के चार साल बाद भी नहीं मिला मुआवजा,कलेक्टर से पीएमओ तक गुहार के बाद अब सड़क पर उतरने की तैयारी…
  • क्या राष्ट्रीय राजमार्ग भूमि अधिग्रहण में दब रहे हैं भू-स्वामियों के अधिकार? जमीन गई,मुआवजा अटका,अब चक्का जाम की चेतावनी…
  • जमीन चली गई,मुआवजा अटका,न्याय भी अधूरा…चार साल से भुगत रहा भू-स्वामी, अब 21 जुलाई को एनएच-43 पर होगा आंदोलन
  • प्रशासन को 7 दिन का अंतिम विधिक नोटिस,सवाल—जब जमीन ले ली तो मुआवजा देने में आखिर इतनी देरी क्यों?

-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया,17 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
किसी भी विकास परियोजना की सबसे बड़ी कीमत अक्सर वह किसान और भू-स्वामी चुकाते हैं,जिनकी जमीन सरकार अधिग्रहित करती है,बदले में उन्हें यह भरोसा दिया जाता है कि कानून के तहत उचित और समयबद्ध मुआवजा मिलेगा,ताकि वे अपने जीवन को दोबारा व्यवस्थित कर सकें,लेकिन कोरिया जिले के ग्राम डुमरिया निवासी सुदीप कुमार गुप्ता का मामला इस पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है, उनकी जमीन राष्ट्रीय राजमार्ग-43 (पुराना एनएच-78) परियोजना के लिए अधिग्रहित कर ली गई,मध्यस्थ ने उनके पक्ष में अवार्ड भी पारित कर दिया, लेकिन चार वर्ष बीत जाने के बाद भी उन्हें मुआवजा नहीं मिला।
आज स्थिति यह है कि अपनी ही जमीन खो चुके एक भू-स्वामी को अपने वैधानिक अधिकार के लिए प्रशासन,न्यायिक प्रक्रिया और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं,कई बार आवेदन, जनदर्शन, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन, प्रधानमंत्री कार्यालय,आरटीआई और जन प्रतिनिधियों से मुलाकात के बाद भी समाधान नहीं निकला तो उन्होंने प्रशासन को 7 दिन का अंतिम विधिक नोटिस जारी करते हुए चेतावनी दी है कि यदि 20 जुलाई 2026 तक भुगतान नहीं हुआ, तो 21 जुलाई 2026 को सुबह 11 बजे राष्ट्रीय राजमार्ग-43 पर चक्का जाम कर शांतिपूर्ण आंदोलन किया जाएगा।
विकास की कीमत किसान ने चुकाई, लेकिन अधिकार के लिए अब भी संघर्ष– ग्राम डुमरिया स्थित खसरा क्रमांक 3983 एवं 3984 की भूमि राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई थी,भूमि अधिग्रहण के बाद मुआवजे को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, जिसके बाद मामला मध्यस्थ के समक्ष पहुंचा, 14 दिसंबर 2021 को मध्यस्थ ने सुदीप कुमार गुप्ता के पक्ष में अवार्ड पारित करते हुए उन्हें निर्धारित मुआवजा देने का आदेश दिया। सामान्यतः ऐसे आदेश के बाद संबंधित विभाग को भुगतान की प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए, लेकिन इस मामले में चार वर्षों के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है,यही कारण है कि अब यह मामला केवल एक व्यक्ति के भुगतान का नहीं,बल्कि सरकारी निर्णयों के क्रियान्वयन और प्रशासनिक जवाबदेही का भी विषय बन गया है।
चार वर्षों से कार्यालयों के चक्कर- अपने विधिक नोटिस में सुदीप कुमार गुप्ता ने विस्तार से उल्लेख किया है कि उन्होंने मुआवजा प्राप्त करने के लिए लगातार वैधानिक एवं प्रशासनिक प्रयास किए,उन्होंने जिला प्रशासन, सक्षम भू-अर्जन अधिकारी,लोक निर्माण विभाग, सूचना का अधिकार अधिनियम,प्रथम अपील, मुख्यमंत्री हेल्पलाइन,प्रधानमंत्री कार्यालय,भारत सरकार के विभिन्न विभागों तथा अन्य सक्षम मंचों पर आवेदन प्रस्तुत किए,इतना ही नहीं, उन्होंने कई बार व्यक्तिगत रूप से अधिकारियों से मुलाकात कर अपने मामले में कार्रवाई की मांग की,लेकिन हर बार आश्वासन मिला,समाधान नहीं।
केवल उनका नहीं,कई भू-स्वामियों का भुगतान लंबित-अपने आवेदन में सुदीप कुमार गुप्ता ने एक और महत्वपूर्ण दावा किया है, उनका कहना है कि राष्ट्रीय राजमार्ग-43 भूमि अधिग्रहण प्रकरण में केवल उनका ही नहीं बल्कि कई अन्य पात्र भू-स्वामियों का मुआवजा भी लंबे समय से लंबित है,यदि यह तथ्य सही है तो यह मामला किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं रह जाता, बल्कि पूरी भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
सात दिन का अंतिम विधिक नोटिस- इसी आधार पर उन्होंने कलेक्टर कोरिया एवं सक्षम भू-अर्जन अधिकारी को अंतिम विधिक नोटिस जारी किया है,इसमें मांग की गई है कि 14 दिसंबर 2021 के मध्यस्थीय अवार्ड के अनुसार संपूर्ण मुआवजा राशि का तत्काल भुगतान किया जाए,यदि भुगतान रोका गया है तो उसका विधिसम्मत आधार उपलब्ध कराया जाए, अन्य पात्र भू-स्वामियों के लंबित भुगतान पर भी शीघ्र निर्णय लिया जाए।
नहीं मिला समाधान तो होगा चक्का जाम-अपने नोटिस में उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि यदि 20 जुलाई 2026 तक कोई वैधानिक कार्रवाई नहीं हुई तो वे 21 जुलाई 2026 को सुबह 11 बजे राष्ट्रीय राजमार्ग-43 (पुराना एनएच-78) स्थित डुमरिया के पास अपनी अधिग्रहित भूमि पर चक्का जाम आंदोलन करेंगे, उन्होंने इसे पूरी तरह शांतिपूर्ण और संवैधानिक आंदोलन बताया है।
पुलिस को पहले ही दे दी सूचना- आंदोलन को लेकर थाना पटना को भी लिखित सूचना दी गई है,सूचना पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया है कि आंदोलन की पूर्व जानकारी इसलिए दी जा रही है ताकि कानून-व्यवस्था बनाए रखने में किसी प्रकार की परेशानी न हो और प्रशासन पहले से आवश्यक व्यवस्था कर सके।
कई दस्तावेजों के साथ रखा अपना पक्ष…
विधिक नोटिस के साथ उन्होंने कई महत्वपूर्ण दस्तावेज संलग्न किए हैं,जिनमें 14 दिसंबर 2021 का मध्यस्थीय अवार्ड,केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय का पत्र,सक्षम भू-अर्जन अधिकारी के पत्र,मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की शिकायतों की प्रतियां,न्यायालय की केस हिस्ट्री,रूशक्रभ्॥ से प्राप्त आरटीआई उत्तर, तथा पूर्व में किए गए विभिन्न पत्राचार शामिल हैं,इन दस्तावेजों के आधार पर उन्होंने दावा किया है कि उन्होंने हर संभव वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया है।
जनदर्शन में मिला भरोसा भी निकला खोखला…
सुदीप कुमार गुप्ता ने अपने आवेदन में उल्लेख किया है कि 9 जून 2026 को आयोजित जनदर्शन कार्यक्रम में उन्होंने कलेक्टर कोरिया के समक्ष अपनी समस्या रखी थी,उनके अनुसार,उस समय उन्हें आश्वासन दिया गया था कि 19 जून 2026 के बाद उनका भुगतान कर दिया जाएगा, लेकिन निर्धारित समय बीत गया और भुगतान नहीं हुआ, इसके बाद 20 जून 2026 को पटना में आयोजित वृहद पंजीकरण समाधान शिविर में भी उन्होंने अपनी समस्या दोबारा उठाई,उनका आरोप है कि वहां न तो उन्हें कोई स्पष्ट जानकारी दी गई और न ही उनका आवेदन स्वीकार किया गया, इससे उनके मन में यह धारणा और मजबूत हुई कि प्रशासन मामले को टालने का प्रयास कर रहा है।
मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर विधायक तक पहुंचे…
लगातार निराशा मिलने के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई, इसके अलावा स्थानीय विधायक भैयालाल राजवाड़े से मुलाकात कर पूरे मामले की जानकारी दी और सभी प्रभावित भू-स्वामियों का लंबित मुआवजा दिलाने का अनुरोध किया, इसके बावजूद आज तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया।
सबसे बड़ा सवाल—भुगतान रोका है तो आदेश कहां है?
अपने विधिक नोटिस में उन्होंने प्रशासन से दो टूक सवाल पूछा है,यदि वास्तव में मुआवजा भुगतान रोक दिया गया है तो किस सक्षम न्यायालय ने भुगतान पर रोक लगाई है? उस आदेश की प्रमाणित प्रति क्यों उपलब्ध नहीं कराई जा रही? यदि कोई रोक नहीं है तो भुगतान आखिर क्यों नहीं किया जा रहा? उन्होंने कहा है कि बिना किसी वैधानिक आदेश के किसी नागरिक के वैधानिक अधिकार को अनिश्चितकाल तक रोके रखना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
धारा-34 का हवाला,लेकिन कानून कुछ और कहता है…
सुदीप कुमार गुप्ता ने अपने नोटिस में मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम,1996 की धाराओं का भी उल्लेख किया है,उनका कहना है कि प्रशासन अनौपचारिक रूप से यह कहता रहा है कि मामला धारा-34 के अंतर्गत लंबित है,लेकिन कानून की धारा-36 स्पष्ट करती है कि केवल धारा-34 के तहत आवेदन लंबित होने मात्र से मध्यस्थीय अवार्ड के क्रियान्वयन या भुगतान पर स्वतः रोक नहीं लगती,यदि न्यायालय ने स्थगन आदेश दिया है तो उसकी प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराना संबंधित प्राधिकरण का दायित्व है।
प्रशासन की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल…
यह पूरा मामला कई गंभीर सवाल छोड़ता है,यदि किसी व्यक्ति की भूमि अधिग्रहित कर ली गई,मध्यस्थीय अवार्ड भी पारित हो गया और उसके बाद भी वर्षों तक भुगतान नहीं हुआ,तो यह केवल एक प्रशासनिक देरी नहीं बल्कि व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर प्रश्न है,भूमि अधिग्रहण अधिनियम का मूल उद्देश्य प्रभावित परिवारों को न्यायसंगत मुआवजा देकर विकास और अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना है, यदि यही प्रक्रिया वर्षों तक अधूरी रहे तो प्रभावित व्यक्ति आर्थिक और मानसिक दोनों प्रकार की कठिनाइयों का सामना करता है।
अब प्रशासन के सामने अग्निपरीक्षा…
21 जुलाई की प्रस्तावित तारीख अब जिला प्रशासन के लिए भी महत्वपूर्ण बन गई है, यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया तो राष्ट्रीय राजमार्ग पर प्रस्तावित आंदोलन से यातायात प्रभावित हो सकता है और कानून-व्यवस्था की चुनौती भी उत्पन्न हो सकती है, हालांकि,यह भी उल्लेखनीय है कि सुदीप कुमार गुप्ता ने आंदोलन से पहले प्रशासन को विधिक नोटिस देकर समाधान का अवसर दिया है और पुलिस को भी पूर्व सूचना देकर शांतिपूर्ण आंदोलन की बात कही है, अब यह देखना होगा कि प्रशासन सात दिनों के भीतर मुआवजा भुगतान करता है, भुगतान रोकने का वैधानिक आधार सार्वजनिक करता है या फिर मामला सड़क पर उतरने तक पहुंचता है।


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