मुरम-पत्थर के कथित अवैध उत्खनन से बदल रहा पहाड़ों का स्वरूप,समतल जमीन पर कब्जे की भी चर्चा,विभागों की चुप्पी सवालों के घेरे में…
-संवाददाता-
अम्बिकापुर,05 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। शहर से महज सात किलोमीटर दूर दरिमा रोड स्थित मानिकप्रकाशपुर और क्रांतिप्रकाशपुर की हरी-भरी पहाडि़यां इन दिनों तेजी से बदलते भू-दृश्य के कारण चर्चा में हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वन अधिकार अधिनियम के तहत जारी व्यक्तिगत वन अधिकार पत्रों की आड़ में जेसीबी मशीनों से पहाड़ों की कटाई कराई जा रही है। पहाड़ों से निकाले जा रहे मुरम और पत्थर का व्यावसायिक उपयोग किए जाने तथा समतल की गई जमीन पर कब्जे दिलाने का खेल भी चलने की बात कही जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि कुछ लोग आदिवासी परिवारों को यह समझाकर सहमत कर रहे हैं कि पहाड़ी समतल होने पर मकान बनाना और खेती करना आसान होगा। इसी तर्क के सहारे बड़े पैमाने पर पहाड़ों की खुदाई की जा रही है। सवाल यह है कि यदि जमीन समतल करना ही उद्देश्य है,तो फिर बड़ी मात्रा में निकलने वाला मुरम और पत्थर आखिर कहां जा रहा है? स्थानीय लोगों का आरोप है कि पहाड़ों से निकाला गया मुरम और पत्थर शहर में निर्माण कार्यों के लिए बेचा जा रहा है। यदि जांच में यह तथ्य सही पाया जाता है तो मामला केवल पर्यावरणीय क्षति तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि खनिज संपदा के अवैध दोहन का गंभीर मामला भी बनेगा। इसके बावजूद अब तक वन विभाग,खनिज विभाग और राजस्व विभाग की ओर से कोई प्रभावी कार्रवाई सामने नहीं आई है।
सवालों के घेरे में विभागीय निगरानी : सबसे बड़ा सवाल यह है कि जेसीबी मशीनों से हो रही कथित कटाई कोई छिपी हुई गतिविधि नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों का नियमित निरीक्षण करने वाले राजस्व अमले, वन विभाग और खनिज विभाग को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई? यदि जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं की गई? और यदि जानकारी नहीं थी तो फिर विभागीय निगरानी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
पहले भी खो चुके हैं कई पहाड़ : स्थानीय लोग याद दिलाते हैं कि महामाया पहाड़,नवागढ़ और बधियाचुआ जैसे क्षेत्रों में भी समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं होने के कारण अतिक्रमण और अवैध दोहन ने प्राकृतिक स्वरूप को काफी नुकसान पहुंचाया। उनका कहना है कि यदि मानिकप्रकाशपुर और क्रांतिप्रकाशपुर में भी अभी सख्ती नहीं बरती गई, तो यहां भी वही स्थिति बन सकती है।
उठ रही प्रमुख मांगें : स्थानीय नागरिकों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की संयुक्त जांच कराई जाए। यदि वन अधिकार अधिनियम की आड़ में पहाड़ों की अवैध कटाई,मुरम-पत्थर का व्यावसायिक उत्खनन अथवा भूमि पर अवैध कब्जे की पुष्टि होती है, तो संबंधित व्यक्तियों के साथ-साथ लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाए।
वन अधिकार पत्र की भी हो जांच…
ग्रामीणों का कहना है कि जिन पहाडि़यों पर वर्षों तक वास्तविक कब्जा नहीं था, वहां वन अधिकार पत्र किस आधार पर जारी किए गए,इसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि अधिकार पत्रों का उपयोग केवल संरक्षण और आजीविका के बजाय व्यावसायिक उत्खनन या अवैध कब्जे के लिए किया जा रहा है,तो यह कानून की मंशा के विपरीत माना जाएगा।
पर्यटन की संभावनाओं पर भी खतरा…
दरिमा रोड से मानिकप्रकाशपुर तक का इलाका प्राकृतिक सौंदर्य, हरियाली और पहाड़ी श्रृंखलाओं के कारण विशेष पहचान रखता है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से जुड़ने के बाद इस क्षेत्र में पर्यटन की भी अच्छी संभावनाएं हैं। लेकिन यदि वर्तमान स्थिति जारी रही तो आने वाले वर्षों में यह प्राकृतिक धरोहर गंभीर संकट में पड़ सकती है।
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