

- उपन्यास,प्रचार और प्रशंसा के बीच उठते सवाल…
- किताब से ज्यादा चर्चा खरीदारों की! यक्षिणी के बहाने साहित्य और सत्ता पर बहस
- यक्षिणी की उड़ान या प्रशासनिक प्रचार? कोरिया में किताब से ज्यादा तस्वीरों की चर्चा
- पुस्तक समीक्षा एक,खरीदार अनेक! यक्षिणी की लोकप्रियता पर उठ रहे सवाल
- कलम की ताकत या कुर्सी का प्रभाव? यक्षिणी को लेकर कोरिया में छिड़ी नई बहस
- यक्षिणी की गूंज साहित्य जगत तक पहुंचेगी या नहीं? कोरिया से उठे सवाल,जवाब तलाशते पाठक
- जब सीईओ बने उपन्यासकार प्रशंसा,प्रचार और पाठकों के बीच फंसी यक्षिणी
- किताब पढ़ी कम, दिखाई ज्यादा गई? यक्षिणी की बिक्री और समीक्षा पर सवाल
- साहित्य की सफलता या पद की लोकप्रियता? यक्षिणी को लेकर सोशल मीडिया में मचा शोर
-रवि सिंह-
कोरिया,08 जून 2026(घटती-घटना)। साहित्य की दुनिया में किसी लेखक की सबसे बड़ी ताकत उसकी कलम होती है और किसी प्रशासनिक अधिकारी की सबसे बड़ी ताकत उसका पद, लेकिन जब कलम और पद दोनों एक ही व्यक्ति के हाथ में हों, तब प्रशंसा और आलोचना दोनों का दायरा बढ़ जाता है, इन दिनों कोरिया जिले में कुछ ऐसा ही माहौल दिखाई दे रहा है, जिला पंचायत कोरिया के मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी द्वारा लिखित उपन्यास यक्षिणी-मैकल की अनुगूंज साहित्यिक हलकों से ज्यादा प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है, पुस्तक के प्रकाशन के बाद जिस तरह का माहौल निर्मित हुआ है,उसने साहित्य,सत्ता,प्रशंसा और प्रचार के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है,सवाल किसी किताब के लिखे जाने पर नहीं है,सवाल किसी लेखक की प्रतिभा पर भी नहीं है,सवाल यह भी नहीं है कि कोई अधिकारी साहित्य सृजन क्यों कर रहा है,सवाल उस पूरे माहौल पर है जिसमें एक पुस्तक की चर्चा हो रही है और जिस तरह से उसकी बिक्री, प्रचार और प्रशंसा दिखाई दे रही है,वह कई लोगों को सोचने पर मजबूर कर रही है।
तीन साल का कार्यकाल और एक उपन्यास का जन्म
डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी पिछले तीन वर्षों से अधिक समय से कोरिया जिले में जिला पंचायत सीईओ के रूप में पदस्थ हैं, इसी अवधि के दौरान उन्होंने अपना उपन्यास यक्षिणी मैकल की अनुगूंज लिखा,पुस्तक प्रकाशित हुई,बाजार में आई,ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हुई और देखते ही देखते जिले में चर्चा का विषय बन गई, पुस्तक की विषयवस्तु मैकल पर्वत श्रृंखलाओं,अमरकंटक,वनांचल,लोककथाओं,इतिहास और कल्पना के संसार से जुड़ी हुई है,साहित्यिक दृष्टि से यह एक महत्वाकांक्षी प्रयास माना जा सकता है, पुस्तक की समीक्षा भी सामने आई, जिसमें इसकी भाषा, कथानक और सांस्कृतिक प्रस्तुति की सराहना की गई, लेकिन यहीं से दूसरा अध्याय शुरू होता है, जो पुस्तक के भीतर नहीं बल्कि पुस्तक के बाहर लिखा जा रहा है।
समीक्षा आई,लेकिन सिर्फ एक ही क्यों…
पुस्तक के प्रकाशन के बाद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों द्वारा पुस्तक खरीदने की तस्वीरें साझा की गईं,कई कर्मचारियों,अधिकारियों और परिचितों ने पुस्तक हाथ में लेकर फोटो डालीं और लेखक को बधाई दी, लेकिन आश्चर्य की बात यह रही कि पुस्तक की वास्तविक समीक्षा लगभग दिखाई नहीं दी,अब तक जो सबसे चर्चित समीक्षा सामने आई, वह जिला पंचायत में ही पदस्थ कर्मचारी रूद्र मिश्रा द्वारा लिखी गई, उन्होंने पुस्तक का विस्तृत अध्ययन कर उसकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डाला, समीक्षा प्रभावशाली थी और पुस्तक के पक्ष में मजबूत टिप्पणी भी थी,लेकिन आलोचकों का सवाल यह है कि यदि पुस्तक इतनी प्रभावशाली है तो फिर उसे पढ़ने वाले अन्य लोगों की समीक्षाएं कहां हैं? क्या पुस्तक खरीदने वाले पाठकों ने वास्तव में उसे पढ़ा है? क्या साहित्यिक चर्चा की जगह केवल पुस्तक खरीदने की सूचना देना ही उद्देश्य बन गया है? यही वे प्रश्न हैं जो सोशल मीडिया और साहित्यिक हलकों में तैर रहे हैं।
किताब ज्यादा बिकी या तस्वीरें ज्यादा पोस्ट हुईं?
कोरिया जिले में इन दिनों सोशल मीडिया खोलिए तो कई जगह पुस्तक के साथ तस्वीरें दिखाई देती हैं, कोई अधिकारी पुस्तक खरीद रहा है,कोई कर्मचारी उसे हाथ में लेकर फोटो डाल रहा है, कोई लेखक के साथ तस्वीर साझा कर रहा है,लेकिन जब बात पुस्तक की विषयवस्तु,पात्रों,कथानक,भाषा या साहित्यिक गुणवत्ता की आती है तो चर्चा अचानक शांत हो जाती है,यहीं आलोचना शुरू होती है,लोग सवाल उठा रहे हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि पुस्तक को पढ़ने से ज्यादा उसे खरीदकर दिखाने की होड़ लगी हुई है? कुछ लोग इसे लेखक के प्रति सम्मान बता रहे हैं तो कुछ इसे गुड बुक्स में आने की कोशिश मान रहे हैं,हालांकि इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है,लेकिन चर्चा का बाजार गर्म है।
साहित्य का सम्मान या पद का प्रभाव?
यह वह सवाल है जिससे सबसे ज्यादा असहजता पैदा होती है,यदि यही उपन्यास किसी साधारण लेखक ने लिखा होता तो क्या इतनी ही तेजी से उसकी प्रतियां बिकतीं? क्या इतनी ही संख्या में लोग सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करते? क्या इतना ही प्रचार स्वतः निर्मित होता? इन प्रश्नों का उत्तर किसी के पास नहीं है,लेकिन प्रश्न मौजूद हैं, क्योंकि लेखक केवल लेखक नहीं हैं। वह जिले के सबसे प्रभावशाली प्रशासनिक अधिकारियों में से एक भी हैं,यहीं से साहित्य और सत्ता के बीच की रेखा धुंधली होती दिखाई देती है।
किताब को चाहिए पाठक,सिर्फ खरीदार नहीं…
यक्षिणी- मैकल की अनुगूंज के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि पुस्तक को पाठक चाहिए, सिर्फ खरीदार नहीं,किसी भी पुस्तक की सफलता उसकी बिक्री से नहीं, उसके प्रभाव से मापी जाती है,वह कितने लोगों को सोचने पर मजबूर करती है,कितने पाठकों के मन में जगह बनाती है और कितने आलोचकों को बहस के लिए प्रेरित करती है,यही उसकी असली कसौटी होती है,आज यदि पुस्तक चर्चा में है तो यह लेखक की उपलब्धि है,लेकिन यदि चर्चा केवल खरीद तक सीमित रह जाए और पढ़ने तथा समीक्षा तक न पहुंचे तो यह साहित्य के लिए चिंता का विषय भी हो सकता है।
कोरिया की साहित्यिक परंपरा नई नहीं है…
यह भी सच है कि कोरिया जिला साहित्य के क्षेत्र में हमेशा से समृद्ध रहा है,यहां कवि, कहानीकार,उपन्यासकार और गजलकार लंबे समय से सक्रिय रहे हैं,जिले ने अनेक साहित्यकार दिए हैं जिनकी रचनाएं प्रदेश और देश स्तर तक पहुंची हैं,संजय अलंग, नेसार नाज सहित कई नाम ऐसे हैं जिन्होंने साहित्य में अपनी पहचान बनाई,इससे पहले भी प्रशासनिक सेवाओं से जुड़े लोग लेखन करते रहे हैं,इसलिए किसी अधिकारी का लेखक होना कोई नई बात नहीं है,लेकिन पहली बार ऐसा दिखाई दे रहा है कि किसी पुस्तक के इर्द-गिर्द प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर इतना बड़ा वातावरण निर्मित हुआ हो।
प्रकाशक की रणनीति पर भी सवाल…
पुस्तक का प्रकाशन भिलाई स्थित सरस्वती बुक्स द्वारा किया गया है,किसी भी प्रकाशक का उद्देश्य अधिकतम बिक्री और अधिकतम पाठकों तक पहुंचना होता है,लेकिन आलोचकों का कहना है कि यदि पुस्तक वास्तव में महत्वपूर्ण साहित्यिक कृति है तो उसका प्रचार केवल कोरिया जिले तक सीमित क्यों दिखाई दे रहा है? क्यों नहीं प्रदेश के विश्वविद्यालयों,पुस्तक मेलों,साहित्यिक मंचों और पुस्तक प्रेमियों तक इसे व्यवस्थित रूप से पहुंचाया जा रहा? क्यों नहीं बड़े साहित्यिक समीक्षकों से इसकी समीक्षा कराई जा रही? क्यों नहीं स्वतंत्र आलोचक इसकी साहित्यिक गुणवत्ता का मूल्यांकन कर रहे? क्योंकि साहित्य की असली परीक्षा वहीं होती है।
जब लेखक अधिकारी भी हो…
किसी लेखक के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं होती कि उसके अधीनस्थ लोग उसकी पुस्तक खरीद लें,सबसे बड़ी उपलब्धि यह होती है कि जिन लोगों से उसका कोई परिचय नहीं है,वे भी उसकी पुस्तक पढ़ें और उस पर चर्चा करें,किसी अधिकारी के लिए पद अस्थायी होता है लेकिन लेखक की पहचान स्थायी होती है,आज जो लोग पुस्तक खरीद रहे हैं,उनमें से कितने लोग पांच साल बाद भी उस पुस्तक को याद रखेंगे, यह साहित्य तय करेगा,प्रशासन नहीं,यही कारण है कि साहित्य जगत में हमेशा कहा जाता है कि लेखक को प्रशंसकों से ज्यादा आलोचकों की जरूरत होती है।
अंत में यक्ष प्रश्न
डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी ने एक उपन्यास लिखा है,यह स्वागतयोग्य है,एक प्रशासनिक अधिकारी का साहित्य सृजन करना निश्चित रूप से सकारात्मक पहलू है,लेकिन जिस प्रकार पुस्तक को लेकर माहौल बन रहा है,वह अपने साथ कुछ स्वाभाविक प्रश्न भी लेकर आया है, क्या पुस्तक की लोकप्रियता उसकी साहित्यिक गुणवत्ता के कारण है या लेखक के पद की वजह से? क्या पुस्तक को वास्तव में पढ़ा जा रहा है या केवल खरीदा जा रहा है? क्या इसकी चर्चा साहित्यिक विमर्श के रूप में हो रही है या प्रशासनिक प्रभाव के दायरे में? और सबसे बड़ा प्रश्न यह कि क्या यक्षिणी-मैकल की अनुगूंज की गूंज वास्तव में मैकल पर्वतों से निकलकर साहित्य जगत तक पहुंचेगी,या फिर फिलहाल उसकी सबसे मजबूत प्रतिध्वनि कोरिया जिले के प्रशासनिक गलियारों तक ही सीमित रहेगी? इन सवालों का जवाब समय देगा, पाठक देंगे और सबसे बढ़कर स्वयं वह पुस्तक देगी,क्योंकि अंततः किसी भी लेखक का अंतिम मूल्यांकन उसकी कुर्सी नहीं,उसकी कृति करती है।
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